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मरने से पहले दिया गया सिलसिलेवार और भरोसेमंद बयान आरोपी का दोष साबित करने के लिए पर्याप्त: केरल उच्च न्यायालय

LiveLaw News Network
2 Sep 2021 10:07 AM GMT
मरने से पहले दिया गया सिलसिलेवार और भरोसेमंद बयान आरोपी का दोष साबित करने के लिए पर्याप्त: केरल उच्च न्यायालय
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केरल हाईकोर्ट ने बुधवार को मरने से पहले दिए गए बयान की स्वीकार्यता पर विचार किया और कहा कि अगर मरने से ‌दिए गए ‌स‌िलस‌िलेवार बयान विश्वसनीय पाए जाते हैं तो एक-दूसरे को विश्वसनीयता प्रदान करते हैं और अभियुक्तों के अपराध को साबित करते हैं।

जस्टिस विनोद के चंद्रन और जस्टिस ज़ियाद रहमान की खंडपीठ ने मामले में एक अपील को खारिज कर दिया, जहां एक मरती हुई महिला ने लगातार चार बयान द‌िए थे, जिसमें यह संकेत था कि उसकी हत्या उसके बहनोई ने की है। कोर्ट ने फैसले की शुरुआत में कहा, "एक आदमी अपने बनाने वाले से मिलने पर झूठ नहीं बोलेगा।"

कोर्ट ने कहा मरने से पहले दिए बयान के विश्वसनीय होने का कारण यह है कि 'आसन्न मृत्यु मनुष्य के मन में वही भावना पैदा करती है जो एक कर्तव्यनिष्ठ और सदाचारी व्यक्ति के मन में शपथ के बाद पैदा होती है।"

पृष्ठभूमि

कोर्ट ने यह टिप्पणियां छोटे भाई की पत्नी की हत्या के एक आरोपी की अपील पर की। उसे मामले में दोषी पाया गया था और सत्र न्यायालय ने आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। जबकि उसकी ओर से दायर अपील में कहा गया था कि यह स्पष्ट रूप से अपने शरीर पर मिट्टी का तेल डालने के बाद आत्मदाह करके आत्महत्या का मामला था, क्योंकि उस समय में मृतक विभिन्न कारणों से परेशान थी।

हालांकि, मृतक ने कथित तौर पर मरने से पहले चार बयान दिए, जिसमें स्पष्ट रूप से अपीलकर्ता को अपनी चोटों के लिए जिम्मेदार ठहराया। परिवार के सभी सदस्य इस बात पर विश्वास करने के इच्छुक थे क्योंकि उन्होंने स्वीकार किया कि मृतक और अपीलकर्ता के बीच अक्सर मतभेद होते थे।

आरोपी मृतक के परिवार के साथ उसी मकान में रहता था। उन्होंने बयान दिया कि घटना से एक दिन पहले बिजली बिल में अचानक उछाल का हवाला देकर दोनों के बीच हाथापाई हुई थी। अगले दिन, वह दरवाजे पर आग की लपटों में घिरी मिली। उसे बचाने के सभी प्रयास व्यर्थ रहे और कुछ दिनों बाद उसने दम तोड़ दिया।

हालांकि, अपनी मृत्यु से पहले, उसने अपने बेटे, अपनी बेटी, एक डॉक्टर और न्यायिक मजिस्ट्रेट को चार बयान दिए, जिसमें अपीलकर्ता को आरोपी के रूप ठहराया गया था। सत्र न्यायालय ने इन बयानों पर भरोसा करते हुए अपीलकर्ता को हत्या का दोषा पाया।

अपीलकर्ता ने यह साबित करने का प्रयास किया कि मरने से पहले दिए गए बयान कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं ‌थे, उसके प्रयास विफल रहे। प्रस्तुतियां और रिकॉर्ड पर रखी गई सामग्री को देखने के बाद बेंच इस निष्कर्ष पर पहुंची कि महिला की मौत एक हत्या थी और अपीलकर्ता ने उक्त क्रूर कृत्य को अंजाम दिया था।

कोर्ट ने देखा,

"... आत्महत्या के वैकल्पिक सिद्धांत की पुष्टि नहीं हुई है क्योंकि इस संबंध में हमारे मन में संदेह पैदा करने के लिए कोई सामग्री नहीं है।"

अन्य महत्वपूर्ण अवलोकन

(ए) मरने से पहले बयान इच्छुक व्यक्तियों को नहीं दिया गया

अपीलकर्ता ने जोरदार तर्क दिया कि मरने से पहले से दिया गया कथित बयान अन्य लोगों के बजाय मृतक के बेटे और बेटी को दिया गया। उसने घोषणा की विश्वसनीयता को इस आधार पर नकारने की कोशिश की ये सभी इच्छुक व्यक्ति थे।

हालांकि कोर्ट ने कहा, "करीबी रिश्तेदार होने के बावजूद पीड़ित के बेटे और बेटी के को इच्छुक गवाह नहीं कहा जा सकता है, खासकर जब उनकी दिलचस्पी केवल अपनी मां के हमलावर के खिलाफ मामला दर्ज कराने में हो।"

इसके अलावा खंडपीठ ने देखा कि मृत्यु से पहले की घोषणा एक डॉक्टर और न्यायिक मजिस्ट्रेट को भी दी गई थी, जो दोनों स्वतंत्र हैं।

(बी) विश्वसनीय बयान देने के लिए मृतक उचित मानसिक स्थिति में था

अपीलकर्ता ने न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी द्वारा मृत्युपूर्व घोषणापत्र को रिकॉर्ड करने के तरीके में कुछ कमियों की ओर इशारा करते हुए तर्क दिया कि मृतक मरने से पहले बयान देने के लिए उचित शारीरिक या मानसिक स्थिति में नहीं था।

हालांकि, कोर्ट ने नोट किया कि मरने से पहले बयान प्रक्रिया का पालन करने के बाद दर्ज किया गया, यानी डॉक्टर द्वारा प्रमाणित किए जाने के बाद कि वह इस तरह का बयान देने के लिए फिट थी और उक्त डॉक्टर की उपस्थिति में दर्ज की गई थी।

(सी) घटना के तत्काल बाद दिया गया बयान

अदालत ने देखा कि मृतक द्वारा दिया गया पहला बयान घटना के लगभग 15 मिनट बाद दिया गया था, जिससे उसे अपीलकर्ता को फंसाने के लिए कहानी गढ़ने के लिए बहुत कम जगह मिलती है।

"... पहला बयान घटना के तुरंत बाद यानी सिर्फ 15 मिनट के भीतर दिया गया है। इससे अभियोजन पक्ष के मामले को और अधिक मजबूती मिलती है, क्योंकि यह अपराध के आसपास दिया गया है और इसलिए, बाद में विचार, हेरफेर , ट्यूशन आदि की संभावना को खारिज किया जा सकता है।"

खंडपीठ ने पाया कि सत्र न्यायालय के निष्कर्षों में हस्तक्षेप करने का कोई कारण नहीं था और इस प्रकार अपील को खारिज कर दिया गया।

केस शीर्षक: थैंकप्पन बनाम केरल राज्य और अन्य।

आदेश पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

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