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एनडीपीएस एक्ट की धारा 37 के तहत जमानत देने की शर्तें संयुक्त हैं, हिरासत की अवधि सारहीनः गुवाहाटी हाईकोर्ट

LiveLaw News Network
15 Sep 2021 1:15 PM GMT
एनडीपीएस एक्ट की धारा 37 के तहत जमानत देने की शर्तें संयुक्त हैं, हिरासत की अवधि सारहीनः गुवाहाटी हाईकोर्ट
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गुवाहाटी हाईकोर्ट ने माना है कि एक आरोपी व्यक्ति को जमानत देने के लिए एनडीपीएस अधिनियम की धारा 37 के तहत निर्धारित तीन शर्तें संयुक्त प्रकृति की हैं।

न्यायमूर्ति संजय कुमार मेधी ने फैसला सुनाया कि जमानत देने के लिए सभी तीन शर्तों को एक साथ पूरा करने की आवश्यकता होती है अर्थात, (1) लोक अभियोजक को जमानत का विरोध करने का अवसर देना (2) आरोपी के दोषी नहीं होने पर विश्वास करने के लिए आधार की उपलब्धता के संबंध में प्रथम दृष्टया संतुष्टि और (3) जमानत पर रहते हुए उसके द्वारा कोई अपराध न करने की संभावना।

यह मानते हुए कि इस मामले में तीसरी शर्त पूरी नहीं हुई है, अदालत ने आवेदक को जमानत देने से इनकार कर दिया। आवेदक ने 7 सितंबर को हिरासत में 267 दिन पूरे कर लिए हैं।

कोर्ट ने यह भी कहा कि,

''पहली शर्त पूरी हो गई है और यहां तक कि यह मानते हुए कि दूसरी शर्त भी पूरी हो जाती है, परंतु केस रिकॉर्ड एनडीपीएस अधिनियम से जुड़े एक अन्य मामले में आरोपी की संलिप्तता को प्रदर्शित करता है जिसमें उसे चार्जशीट दायर हो चुकी है और वह ट्रायल का सामना कर रहा है। यह एक प्रासंगिक कारक है, इसलिए इस न्यायालय की राय है कि आवेदक जमानत के विशेषाधिकार का हकदार नहीं है।''

कोर्ट ने आगे कहा,

''जहां तक हिरासत की अवधि का संबंध है, इस तथ्य के अलावा कि इसमें शामिल अपराध एक सामाजिक आर्थिक अपराध है, माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने साहबुद्दीन मामले में माना है कि एक विचाराधीन कैदी के रूप में अवधि की जांच समाज के हित की दृष्टि से की जानी चाहिए।''

पृष्ठभूमि

वर्तमान मामले में सीआरपीसी की धारा 439 के तहत एनडीपीएस अधिनियम 1985 की धारा 17(बी), 18(सी), 20(बी)(ii)(सी), 21(सी), 25, 27(ए) और 29(1) के तहत दर्ज एक मामले में जमानत मांगी गई थी।

आवेदक की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता भट्टाचार्य ने अदालत को सूचित किया कि आवेदक ने 267 दिन हिरासत में पूरे कर लिए हैं। उसे केवल संदेह के आधार पर गिरफ्तार किया गया है क्योंकि वह मुख्य आरोपी, अपने मामा के घर में संयोग से उस समय उपस्थित था।

भट्टाचार्य ने तर्क दिया कि इस मामले की जांच पूरी हो चुकी है और आरोप पत्र दायर किया जा चुका है। अदालत के समक्ष यह भी प्रस्तुत किया गया कि आवेदक के खिलाफ उसकी उपस्थिति के अलावा अन्य कुछ खास आरोप नहीं लगाए गए हैं। आगे यह प्रस्तुत किया गया है कि केस रिकॉर्ड से पता चलता है कि आवेदक के कब्जे से कुछ भी बरामद नहीं हुआ है, और जांच के दौरान भी पुलिस रिमांड केवल मुख्य आरोपी के लिए मांगी गई थी।

वकील ने आगे कहा कि एकमात्र कनेक्शन एक मोबाइल फोन है जो कथित तौर पर आवेदक का है। हालांकि, रिकॉर्ड पर ऐसा कुछ भी नहीं है कि आवेदक को अपराध से जोड़ने के लिए कॉल रिकॉर्ड की जांच या कोई अन्य फोरेंसिक विश्लेषण किया गया है।

कानूनी पहलुओं पर बहस करते हुए, वकील ने तर्क दिया किः (ए) तत्काल मामले में शिकायतकर्ता स्वयं जांच अधिकारी है और इस संबंध में एक कानूनी रोक है, (बी) प्राथमिकी स्वयं स्वीकार्य नहीं है क्योंकि यह जांच समाप्त होने के बाद दर्ज की गई थी, (सी) आवेदक को सबसे अच्छा जब्ती गवाह कहा जा सकता है और (डी) स्वतंत्र गवाहों के बयान में आवेदक पर कोई आरोप नहीं लगाए गए हैं।

अतिरिक्त लोक अभियोजक बी शर्मा ने जमानत का विरोध करते हुए कहा कि कोई नया आधार नहीं बताया गया है, और मामले के सभी पहलुओं पर विचर करते हुए जमानत को पहले दो बार खारिज किया जा चुका है।

उन्होंने तर्क दिया कि जब्त किए गए नशीले पदार्थ/प्रतिबंधित और बरामद नकदी काफी बड़ी मात्रा में है,जो यह इंगित करता है कि यह एक संगठित अपराध है जिसमें कई व्यक्ति शामिल हैं और यह किसी एक व्यक्ति का काम नहीं हो सकता है। आगे यह तर्क दिया गया कि प्राथमिकी में स्पष्ट रूप से आवेदक का नाम शामिल है, और यह सुझाव देने के लिए तथ्य उपलब्ध हैं कि आवेदक के घटना स्थल पर आने के संबंध में पूर्व सूचना थी।

मामले की मैरिट के आधार पर यह तर्क दिया गया किः (ए) यह तथ्यात्मक रूप से गलत है कि सूचना देने वाला और जांच अधिकारी एक ही व्यक्ति है, (बी) एनडीपीएस अधिनियम एक विशेष अधिनियम है जो सामाजिक-आर्थिक अपराध से संबंधित है, जिसमें हिरासत की अवधि महत्वपूर्ण नहीं है, और (सी) यह तर्क कि आवेदक आरोपी केवल संयोग से उपस्थित था, स्वीकार्य नहीं है क्योंकि यह एक विवेकपूर्ण दिमाग को अपील करने वाला उचित अनुरोध नहीं है।

कोर्ट का निष्कर्ष

अदालत ने नोटिस किया कि पहले दो मौकों पर, आवेदक की जमानत अर्जी खारिज कर दी गई थी - एक तकनीकी शर्तों पर और दूसरी योग्यता/मैरिट के आधार पर। दूसरे अस्वीकृति आदेश का उल्लेख करते हुए, न्यायालय ने कहा कि जब मामले पर विस्तृत रूप से चर्चा की जा चुकी है तो नए सिरे से विचार की कोई गुंजाइश नहीं है।

शिकायतकर्ता और अन्वेषक के एक ही व्यक्ति होने के सवाल पर, न्यायालय ने मुकेश सिंह बनाम राज्य (2020) के मामले पर भरोसा किया, जिसमें यह माना गया है कि,

''ऐसे मामले में जहां शिकायतकर्ता स्वयं अन्वेषक है, उन मामलों में भी यह नहीं कहा जा सकता है कि जांच पूर्वाग्रह या इस तरह कारक के आधार पर खराब है। पक्षपात या पूर्वाग्रह का प्रश्न प्रत्येक मामले के तथ्यों और परिस्थितियों पर निर्भर करेगा। इसलिए सूचना देने वाला अन्वेषक है, केवल इस कारण से जांच पर अनुचितता या पक्षपात का दोष नहीं लगाया जा सकता है और इसलिए एकमात्र इस आधार पर कि सूचना देने वाला अन्वेषक है, आरोपी बरी होने का हकदार नहीं है।''

267 दिनों से अधिक की हिरासत की लंबी अवधि के सवाल पर, अदालत ने कहा कि यह तथ्य आवेदक की सहायता के लिए नहीं करेगा क्योंकि इसमें शामिल अपराध एक सामाजिक-आर्थिक अपराध है और साथ ही घटना स्थल से काफी बड़ी मात्रा में नशीला पदार्थ और मुद्रा जब्त की गई है।

चंद्रकेश्वर प्रसाद बनाम बिहार राज्य (2016) में, यह माना गया है कि जमानत का अधिकार पूर्ण नहीं हो सकता है, और उस पर उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। एक विचाराधीन कैदी के रूप में अवधि की जांच समाज के हित के दृष्टिकोण से की जानी चाहिए।

अदालत ने उस दलील को भी खारिज कर दिया कि प्राथमिकी स्वीकार्य नहीं है क्योंकि यह जांच समाप्त होने के बाद दर्ज की गई थी। अदालत ने कहा कि जांच से पहले एक जीडी प्रविष्टि की गई है।

केस का शीर्षक-मोहम्मद मोफिदुल हक बनाम असम राज्य

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