Bhima Koregaon Case: प्रेस क्लब इवेंट में शामिल होने पर सुधा भारद्वाज और 3 अन्य की ज़मानत रद्द करने से कोर्ट का इनकार
Shahadat
30 Aug 2026 10:24 PM IST

शनिवार (29 अगस्त) को स्पेशल कोर्ट ने भीमा कोरेगांव-एल्गार परिषद मामले में आरोपी चार मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की ज़मानत रद्द करने से इनकार किया। हालांकि, स्पेशल कोर्ट ने आरोपियों को ज़मानत देते समय लगाई गई शर्तों का उल्लंघन न करने की 'चेतावनी' दी।
स्पेशल जज चकोर बाविस्कर ने नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (NIA) की उस अर्ज़ी को खारिज किया, जिसमें वरवर राव, सुधा भारद्वाज, अरुण फरेरा और वर्नोन गोंसाल्वेस की ज़मानत रद्द करने की मांग की गई थी।
इन चारों आरोपियों को अलग-अलग समय पर हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट से ज़मानत मिली थी।
ज़मानत की शर्तों में से एक यह थी कि आरोपी एक-दूसरे से बातचीत नहीं करेंगे। हालांकि, इस साल जनवरी में ये चारों आरोपी मुंबई प्रेस क्लब में हुई एक सभा में शामिल हुए थे। NIA का आरोप था कि इस सभा का मकसद मामले की आगे की रणनीति पर चर्चा करना, प्रतिबंधित संगठन CPI (माओवादी) की विचारधारा का प्रचार करना और 'अर्बन नक्सल' आंदोलन को फैलाने के लिए भविष्य की कार्रवाई पर विचार करना था, जो देश की अखंडता, संप्रभुता और सुरक्षा के लिए सीधा खतरा है।
जज ने मुंबई प्रेस क्लब में हुई पूरी बैठक का CCTV फुटेज देखा और पाया कि फुटेज में कोई ऑडियो नहीं था, इसलिए यह पता लगाना मुश्किल था कि असल में क्या बातचीत हुई।
जज ने कहा,
"निश्चित रूप से, 19 जनवरी 2026 को मुंबई प्रेस क्लब की छत पर आरोपी और सह-आरोपी अन्य आमंत्रित लोगों के साथ इकट्ठा हुए। ज़ाहिर है और स्वाभाविक रूप से उन्होंने आपस में बातचीत की होगी। यह मानवीय है कि उन्होंने इस मामले, मामले के तथ्यों, सह-आरोपियों के भविष्य और ऐसे ही संबंधित मुद्दों पर भी बात की होगी। सिर्फ़ इसी आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि उन्होंने उस शर्त का उल्लंघन किया, जिसके तहत कहा गया कि 'आरोपी सह-आरोपियों या ऐसी ही गतिविधियों में शामिल किसी अन्य व्यक्ति के संपर्क में नहीं आएंगे या उनसे बातचीत नहीं करेंगे'।"
जज ने आगे कहा कि इस केस की सुनवाई के दौरान भी आरोपी कोर्ट हॉल के अंदर और बाहर एक-दूसरे से मिले। कोर्ट ने कहा कि वहां भी आरोपी निश्चित रूप से एक-दूसरे से बात कर रहे होंगे और संपर्क या बातचीत कर रहे होंगे।
स्पेशल जज ने कहा,
"उस समय भी आरोपी तथ्यों और अपने व सह-आरोपियों के भविष्य पर चर्चा कर रहे होंगे। इससे यह नहीं कहा जा सकता कि उन्होंने ऊपर बताई गई ज़मानत की किसी खास शर्त का उल्लंघन किया। इसलिए, सिर्फ़ इसलिए कि आरोपियों की मीटिंग या इकट्ठा होने की जगह बदल गई, यह नहीं कहा जा सकता कि उन्होंने ज़मानत की शर्त का उल्लंघन किया है, जैसा कि आरोप लगाया गया।"
जज ने समझाया कि ज़मानत की खास शर्त लगाने के पीछे का मकसद यह था कि आरोपी सह-आरोपियों के साथ संपर्क न करें या बातचीत न करें ताकि वे (फिर से) ऐसी गतिविधियों में शामिल न हों और इस केस में लगाए गए आरोपों की तरह किसी भी समान या अन्य अपराध में शामिल न हों।
जज ने कहा,
"इस बात का कोई सबूत न होने पर सिर्फ़ आरोपियों का इकट्ठा होना यह निष्कर्ष निकालने के लिए काफ़ी नहीं है कि ज़मानत की शर्त का उल्लंघन हुआ।"
इसके अलावा, जज ने इस बात पर ध्यान दिया कि चारों आरोपियों में से किसी ने भी प्रेस क्लब के कार्यक्रम में अपनी मौजूदगी पर कोई विवाद नहीं किया, बल्कि उन्होंने बताया कि उन्होंने जेल की ज़िंदगी, इस केस में आगे की कार्रवाई आदि जैसे मुद्दों पर चर्चा की थी।
स्पेशल कोर्ट ने कहा,
"हालांकि, अगर अभियोजन पक्ष खास तौर पर यह आरोप लगाता है कि इस इकट्ठा होने का मकसद प्रतिबंधित संगठन CPI (माओवादी) की विचारधारा का प्रचार करना और अर्बन नक्सल आंदोलन को फैलाने के लिए आगे की कार्रवाई पर विचार-विमर्श करना था, जो देश की अखंडता, संप्रभुता और सुरक्षा के लिए सीधा खतरा है तो अभियोजन पक्ष को इसे कम-से-कम किसी स्वीकार्य सबूत के साथ साबित करना होगा। ऐसा कोई सबूत नहीं है, जो इस कोर्ट को यह मानने के लिए मजबूर करे कि आरोपी इन्हीं खास इरादों के साथ सह-आरोपियों के साथ वहां इकट्ठा हुए।"
इस प्रकार, जज ने NIA की दलीलों को मानने से इनकार किया और उसकी याचिका खारिज की। हालांकि, जज ने आरोपियों को भविष्य में ऐसा व्यवहार न करने की चेतावनी दी।
जज ने कहा,
"फिर भी, सावधानी के तौर पर, क्योंकि आरोपी को ज़मानत की शर्तों के बारे में अच्छी तरह पता था और उसने देखा कि 19 जनवरी, 2026 को मुंबई प्रेस क्लब की छत पर हुए कार्यक्रम में दूसरे आरोपी भी जमा हुए थे तो आगे की मुश्किलों से बचने के लिए आरोपी को उस कार्यक्रम में शामिल होने के बजाय वहां से हट जाना चाहिए। ऐसा करने से वह ज़मानत रद्द करने की अर्ज़ी जैसी स्थिति से बच सकता था। आरोपी से यह उम्मीद की जाती है कि वह ज़मानत की किसी भी शर्त का उल्लंघन न हो, इसके लिए उचित सावधानी बरतेगा।"
इन बातों को ध्यान में रखते हुए कोर्ट ने चार आरोपियों को मिली ज़मानत रद्द करने की NIA की अर्ज़ी को खारिज किया।
Case Title: National Investigation Agency vs Arun Ferreira (Special Case 414 of 2020)


