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सार्वजनिक कार्यों का निर्वहन करता है बार एसोसिएशन; अनुच्छेद 226 के तहत रिट याचिका सुनवाई योग्यः कर्नाटक उच्च न्यायालय

LiveLaw News Network
13 Dec 2020 1:31 PM GMT
सार्वजनिक कार्यों का निर्वहन करता है बार एसोसिएशन; अनुच्छेद 226 के तहत रिट याचिका सुनवाई योग्यः कर्नाटक उच्च न्यायालय
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कर्नाटक हाईकोर्ट ने माना है कि अनुच्छेद 226 के तहत एक बार एसोसिएशन के खिलाफ रिट याचिका सुनवाई योग्य है।

जस्टिस जी नरेंदर और जस्टिस एमआई अरुण की खंडपीठ ने, बेलगावी बार एसोसिएशन के उपाध्यक्ष चंद्रकांत मजागी की अपील पर दिए फैसला में कहा कि तीसरे प्रतिवादी, बार एसोसिएशन( सोसायटी पंजीकरण अधिनियम के तहत पंजीकृत एक सोसायटी) के ‌खिलाफ रिट याचिका सुनवाई योग्य है।

याचिकाकर्ता ने बार एसोसिएशन के अध्यक्ष के रूप में चौथे प्रतिवादी, दिनेश एम पाटिल की नियुक्ति के खिलाफ याचिका दायर की ‌थी। हालांकि सिंगल जज की बेंच ने याचिका को सुनवाई योग्य नहीं माना और खारिज कर दिया। फैसले में कहा गया कि बार एसोसिएशन "राज्य" शब्द की परिभाषा का जवाब नहीं देता।

मामला

प्रबंध समिति के विभिन्न पदों के लिए हुए चुनावों में, अपीलकर्ता / याचिकाकर्ता को 2019-2021 की अवधि के लिए उपाध्यक्ष के रूप में चुना गया था। एजी मुलवदमथ को अध्यक्ष पद के लिए चुना गया। उन्होंने चौथे प्रतिवादी को हराया था।

हालांकि मुलवदमथ का नौ अगस्त, 2020 को निधन हो गया। आकस्मिक निधन के कारण, 11 अगस्त 2020 को हुई प्रबंध समिति की बैठक में अपीलकर्ता/याचिकाकर्ता को अध्यक्ष के कार्यालय से जुड़े आधिकारिक कार्यों के निर्वहन और बैंक खातों को संचालित करने के लिए अधिकृत करने का प्रस्ताव पारित किया गया।

बाद में प्रबंध समिति के कुछ सदस्यों ने एसोसिएशन से सह-विकल्प द्वारा रिक्त अध्यक्ष पद को भरने का अनुरोध किया, जिसके लिए 25 सितंबर 2020 को बैठक बुलाई गई। विरोध और आपत्तियों के बावजूद, तीन अक्टूबर, 2020 को आयोजित बैठक में चौथे प्र‌‌तिवादी को अध्यक्ष पद के लिए चयनित करने का प्रस्ताव पारित किया गया।

जिसके बाद, याचिकाकर्ता मजागी ने हाईकोर्टम में याचिका दायर की, जिसमें अंतरिम आदेश के तहत चौथे प्रतिवादी की नियुक्त‌ि पर रोक लगा दी गई। हालांकि, बार एसोसिएशन ने अपनी आपत्तियों दायर की, जिसमें कहा कि रिट याचिका सुनवाई योग्य नहीं है।

दलील दी गई कि एसोसिएशन सोसाइटी और निजी संस्था है, इसलिए रिट याचिका सुनवाई योग्य नहीं है। एसोसिएशन में लोक विधि तत्व शामिल नहीं है, इसलिए, अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट की निहित शक्तियों के प्रयोग से एसोससिएशन के प्रस्ताव की न्यायिक समीक्षा अनुमेय नहीं है।

दलील दी गई कि एसोसिएशन न तो राज्य सरकार द्वारा वित्त पोषित है और ना राज्य के नियंत्रण और पर्यवेक्षण में है।

फैसला

दो जजों की बेंच ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट और अन्य हाईकोर्टों के फैसलों पर भरोसा किया।

बेंच ने कहा "बार एसोसिएशन के खिलाफ रिट याचिका सुनवाई योग्य है या नहीं, इस पर विशेष रूप से चुनौत‌ियां रही हैं, और अदालातों ने लगातार यह माना है कि बार एसोसिएशन रिट क्षेत्राधिकार के प्रति उत्तरदायी है और अनुच्छेद 226 के तहत रिट याचिका सुनवाई योग्य है। विशेषकर, जब चुनाव की पवित्रता का मुद्दा हो। हम विभिन्न उच्च न्यायालयों द्वारा व्यक्त किए गए विचारों से पूर्ण सहमत हैं।"

बेंच ने बार एसोसिएशन के बाई-लॉज के प्रावधानों और उद्देश्यों का विशेष रूप से उल्लेख किया और कहा, "तीसरे प्रतिवादी ने कुछ दायित्वों को खुद पर डाला है...."

सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन बनाम बीडी कौशिक (2011) 13 SCC 774 में सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर भरोसा किया गया, जिसमें कहा गया था कि बार एसोसिएशन सार्वजनिक कार्यो का निर्वहन करता।

बेंच ने जोड़ा, "वकील केवल मध्यस्थ नहीं होते बल्कि न्यायालय के अधिकारी होते हैं, जो न्याय वितरण प्रणाली को चलाने में अदालत की सहायता करते हैं और यह अदालत के ऐसे अधिकारी होते हैं जो तीसरे प्रतिवादी का गठन करते हैं। तीसरी प्रतिवादी, सोसाइटी के घटक अदालत के प्रति जवाबदेह हैं,और व्यावसायिक कर्तव्यों के निर्वहन और आचरण के संबंध में पहले प्रतिवादी के प्रति जवाबदेह हैं..."

यह माना गया, "अगर तीसरी प्रतिवादी, सोसाइटी के उद्देश्यों को द्वारका नाथ मामले और एससीबीए मामले में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों के विपरीत रखा जाता है तो यह स्पष्ट है कि तीसरी प्रतिवादी सार्वजनिक चरित्र के दायित्वों का निर्वहन करती है।"

कोर्ट ने यह भी कहा कि बार एसोसिएशन अनुदान की प्राप्ति के तहत है। न्यायालय की सीमाओं में स्थित है और कर्नाटक राज्य बार काउंसिल के व्यापक नियंत्रण में है।

कोर्ट ने कहा, "सिंगल जज अनुच्छेद 226 के परिक्षेत्र और दायरे पर विचार करने में विफल रहे, जिसके तहत स्पष्ट रूप से हाईकोर्ट को निजी संस्थाओं के लिए विशेषाध‌िकार रिट जारी करने का अधिकार है...। मौजूदा मामला एसोसिएशन के अध्यक्ष पद पर एक हारे हुए उम्मीदवार को चय‌नित करने का है, यह ऐसी स्थिति है, जो न केवल, बाई-लॉज के खिलाफ है, बल्‍कि लोकतांत्रिक सिद्धांतों के खिलाफ है और ऐसी स्थिति हाईकोर्ट के लिए विचारणीय है।"

अदालत ने चौथे प्रतिवादी को अध्‍यक्ष पद के लाभों का उपभोग करने से रोक दिया।

केस टाइटिल

टाइटिलः श्री चंद्रकांत बनाम कर्नाटक स्टेट बार काउंसिल

बेंच: जस्टिस जी नरेंदर और एमआई अरुण

प्रत‌िनिधित्व: याचिकाकर्ता के लिए एडवोकेट मदनमोहन एम खन्नूर; बार काउंसिल के लिए केएल पाटिल; बेलगावी बार एसोसिएशन के लिए राजशेखर बुर्जी; चौथे प्रतिवादी के लिए संजय एस कटागेरी।

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