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अधिवक्ताओं को भरण-पोषण ‌‌ट्रि‌ब्यूनल्स के समक्ष पेश होने का अधिकार, कानूनी प्रतिनिधित्व पर प्रतिबंध असंवैधानिकः केरल हाईकोर्ट

LiveLaw News Network
9 April 2021 4:34 AM GMT
अधिवक्ताओं को भरण-पोषण ‌‌ट्रि‌ब्यूनल्स के समक्ष पेश होने का अधिकार, कानूनी प्रतिनिधित्व पर प्रतिबंध असंवैधानिकः केरल हाईकोर्ट
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केरल हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में, माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरणपोषण और कल्याण अधिनियम, 2007 (भरण-पोषण कानून) के तहत गठ‌ित भरण-पोषण ट्र‌िब्यूनल्स के समक्ष पक्षकारों का प्रतिनिधित्व करने के लिए वकीलों पर लगे प्रतिबंध को असंवैधानिक घोषित कर दिया है।

चीफ जस्टिस एस मणिकुमार और जस्टिस शाजी पी चली की खंडपीठ ने पिछले हफ्ते एक मामले में फैसला सुनाया था, जिसमें उन्होंने 2011 में दायर एक याचिका को अनुमति दी थी।

अधिवक्ता अधिनियम, 1961 की धारा 30 का हवाला देते हुए खंडपीठ ने कहा, "अधिवक्ता अधिनियम, 1961 की धारा 30 के आधार पर, जो 15.06.2012 से लागू हो रहा है, लागू प्रतिबंध हटा दिया गया है और ऐसी परिस्थितियों में, भारत के संविधान का अनुच्छेद 19, जो किसी भी पेशे का अभ्यास करने की स्वतंत्रता की गारंटी देता है, अधिवक्ताओं को सभी न्यायालयों और अधिकरण में उपस्थित होने में सक्षम बनाता है, जो अधिवक्ता अधिनियम, 1961 की धारा 34 के अधीन हो।"

अधिवक्ता अधिनियम की धारा 30 का प्रावधान 2011 में अधिसूचित किया गया था, यह एक वकील को सभी न्यायालयों, न्यायाधिकरणों में अभ्यास का अधिकार देता है, और किसी अन्य प्राधिकारी या व्यक्ति से साक्ष्य लेने के लिए अधिकृत करता है।

मामले में याचिकाकर्ता, एडवोकेट केजी सुरेश ने वर्ष 2011 में एक जनहित याचिका दायर की थी, जिसमें यह घोषणा करने की मांग की गई थी कि धारा 17 अधिवक्ता अधिनियम की नई-नई शुरू की गई धारा 30 के आलोक में असंवैधानिक है।

प्रस्तुतियों पर विचार करने के बाद, न्यायालय ने कहा कि 2011 में धारा 30 को पेश और अधिसूचित किया गया था, जिसका भरण-पोषण अधिनियम की धारा 17 पर अधिमान्य प्रभाव था।

खंडपीठ ने कहा, "बाद के अधिनियम का 2007 अधिनियम की धारा 17 पर व्यापक प्रभाव है।"

याचिकाकर्ता की ओर से वकील वी सेतुनाथ, वीआर मनोरंजन, प्रकाश केसवन और वी विनय और बार काउंसिल की प्रस्तुतियों को स्वीकार करते हुए कोर्ट ने कहा कि मेंटेनेंस ट्रिब्यूनल के समक्ष पक्ष रखने के लिए पक्षकारों को बारीकियों को जानने की उम्मीद नहीं होगी।

इस आलोक में, न्यायालय ने प्रभावी रूप से कहा कि कानूनी सलाह की अनुमति देना पर्याप्त नहीं होगा।

कानूनी सहायता अधिकार से इसे जोड़ते हुए, न्यायालय ने कहा कि भरण-पोषण के मामलों में कानूनी सहायता "केवल कानूनी सलाह तक ही सीमित नहीं रह सकती है, जो हमारे विचार से, पार्टियों के हित में पर्याप्त नहीं होगी।"

इस संबंध में कहा गया, "कानूनी सहायता संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत संवैधानिक अधिकार की गारंटी है और कानूनी सहायता केवल कानूनी सलाह तक ही सीमित नहीं रह सकती है, जो कि हमारे विचार में, पक्षकरों के हित में पर्याप्त नहीं होगा।"

इस दलील को खारिज करते हुए कि वकीलों को शामिल करने से माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों को एक त्वरित और सस्ता तंत्र उपलब्ध कराने का कानूनी उद्देश्य खतरे में पड़ जाएगा, अदालत ने कहा, ".. एक वकील को शामिल होने से भरण-पोषण न्यायाधिकरण के समक्ष प्रक्रिया में देरी नहीं होग।"

उपरोक्त के मद्देनजर, न्यायालय ने भरण-पोषण अधिनियम की धारा 17 के संबंध में निष्कर्ष निकाला कि "अधिवक्ता अधिनियम, 1961 की धारा 30 को 15.06.2011 से लागू किया गया है, उक्त अधिनियम के तहत नामांकित अधिवक्ताओं को, सभी न्यायालयों और न्यायाधिकरणों के समक्ष अभ्यास का पूर्ण अधिकार दिया गया है।"

उपरोक्त निर्णयों और चर्चा की रोशनी में माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों के भरण पोषण और कल्याण अध‌िनियम की धारा 17, 2007, अधिवक्ता अधिनियम की धारा 30 की अल्ट्रा वायर्स के रूप में घोषित की जाती है और इस प्रकार, याचिकाकर्ता इस घोषणा के लिए हकदार है कि उसे 2007 के अधिनियम 56 के तहत गठित न्यायाधिकरण/ अपीलीय न्यायाधिकरण/ न्यायालय के समक्ष पक्षों का प्रतिनिधित्व करने का अधिकार है।"

इस घोषणा के साथ कि याचिकाकर्ता को भरण-पोषण अधिनियम, 2007 के तहत भरण-पोषण न्यायाधिकरणों/ अन्य के समक्ष अभ्यास करने की अनुमति दी जाती है, याचिका की अनुमति दी गई।

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