'वकालत एक नेक पेशा': वकील ने रची ज़मीन धोखाधड़ी की साज़िश, हाईकोर्ट ने खारिज की ज़मानत याचिका
Shahadat
30 Jun 2026 7:45 PM IST

गुजरात हाईकोर्ट ने एक वकील की ज़मानत याचिका खारिज की। उस पर धोखाधड़ी (forgery) में शामिल होने का आरोप है, जिसमें शिकायतकर्ता की ज़मीन को उसकी जानकारी के बिना सह-आरोपी को बेच दिया गया। [2026 LiveLaw (Guj) 181]
ऐसा करते हुए कोर्ट ने कहा कि प्रथम दृष्टया (prima facie) ऐसा लगता है कि आवेदक ने ही जाली दस्तावेज़ तैयार करके पूरी साज़िश रची और बिक्री की रकम हासिल की।
कोर्ट एक वकील की ज़मानत याचिका पर सुनवाई कर रहा था। यह याचिका BNS की धाराओं 336(2) (धोखाधड़ी), 338 (कीमती सिक्योरिटी, वसीयत आदि की धोखाधड़ी), 339 (जाली दस्तावेज़ रखना), 340(2) (जाली दस्तावेज़ों या इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड का असली के तौर पर इस्तेमाल करना), 242 (मुकदमे या कानूनी कार्यवाही में गलत पहचान बताना) र 61(2)(a) (आपराधिक साज़िश) के तहत दर्ज FIR से संबंधित है।
अभियोजन पक्ष के अनुसार, शिकायतकर्ता (जो एक विदेशी नागरिक है) अप्रैल 2024 में भारत आया था। उसे पता चला कि उसकी मालिकाना हक और कब्ज़े वाली ज़मीन को नकली सेल डीड (बिक्री विलेख) के ज़रिए उसकी पहचान का गलत इस्तेमाल करके 49 लाख रुपये में बेच दिया गया।
जस्टिस हसमुख डी. सुथार ने कहा कि जांच के दौरान यह पाया गया कि आवेदक ने एक वकील के तौर पर जाली दस्तावेज़ तैयार किए।
कोर्ट ने कहा,
"प्रथम दृष्टया ऐसा लगता है कि आवेदक ने जाली दस्तावेज़ तैयार करके पूरी साज़िश रची, बिक्री की रकम हासिल की और उसे सह-आरोपियों में बांट दिया... आवेदक की भूमिका को देखते हुए कोर्ट का मानना है कि अगर उसे ज़मानत पर रिहा किया जाता है तो पूरी संभावना है कि वह अभियोजन पक्ष के सबूतों के साथ छेड़छाड़ करेगा। यह ऐसा मामला नहीं है, जिसमें उसने अपनी पेशेवर सेवा दी हो। वकालत एक नेक पेशा है और आवेदक ने अपनी जानकारी का गलत फायदा उठाकर आपराधिक गतिविधि में हिस्सा लिया। इसलिए कोर्ट इस याचिका को मंज़ूरी देने के पक्ष में नहीं है, क्योंकि इससे अभियोजन पक्ष के मामले पर बुरा असर पड़ेगा।"
आवेदक के वकील ने कहा कि वह पिछले 22 वर्षों से वकालत कर रहा है और उसे इस अपराध में झूठा फंसाया गया। यह तर्क दिया गया कि पेशेवर सेवाएँ देने के अलावा, आवेदक की कोई भूमिका नहीं है।
राज्य के वकील ने तर्क दिया कि जाँच पूरी नहीं हुई। इसके अलावा, यह तर्क दिया गया कि आवेदक ने कोई पेशेवर सेवा नहीं दी, क्योंकि वह अपराध का मुख्य सूत्रधार और मास्टरमाइंड है। यह आरोप लगाया गया कि इस अपराध के लिए आजीवन कारावास की सज़ा हो सकती है और पूरी संभावना है कि अगर आवेदक को ज़मानत पर रिहा किया जाता है तो वह सबूतों के साथ छेड़छाड़ करने की कोशिश करेगा।
Case title: JITENDRASINH NARANSINH RATHOD v/s STATE OF GUJARAT

