'आप किसी नौकरानी से शादी नहीं कर रहे हैं, पति को भी खाना बनाने में मदद करनी चाहिए': सुप्रीम कोर्ट ने पति से कहा

Shahadat

20 March 2026 7:25 PM IST

  • आप किसी नौकरानी से शादी नहीं कर रहे हैं, पति को भी खाना बनाने में मदद करनी चाहिए: सुप्रीम कोर्ट ने पति से कहा

    एक वैवाहिक मामले में, जहां पति क्रूरता के आधार पर तलाक़ की मांग कर रहा है, सुप्रीम कोर्ट ने मौखिक रूप से टिप्पणी की कि पत्नी द्वारा घर के काम (जैसे खाना बनाना आदि) ठीक से न करने जैसे आरोप क्रूरता नहीं माने जा सकते।

    कोर्ट ने ज़ोर देकर कहा कि अब समय बदल गया और पति को भी ऐसे कामों में मदद करनी चाहिए।

    जस्टिस संदीप मेहता ने टिप्पणी करते हुए कहा,

    "आप किसी नौकरानी से शादी नहीं कर रहे हैं, आप एक जीवनसाथी से शादी कर रहे हैं।"

    जस्टिस विक्रम नाथ ने आगे कहा,

    "आपको भी खाना बनाने, कपड़े धोने आदि कामों में मदद करनी होगी। आज का समय अलग है।"

    अगली सुनवाई की तारीख पर दोनों पक्षों को व्यक्तिगत रूप से पेश होने के लिए कहा गया। इससे पहले, कोर्ट ने दोनों पक्षों को मध्यस्थता (Mediation) के लिए भेजा था, लेकिन वह प्रयास असफल रहा।

    मामले के तथ्यों को संक्षेप में बताएं तो दोनों पक्षों की शादी 2017 में हुई और उनका एक 8 साल का बेटा है। पति एक सरकारी स्कूल में शिक्षक है और पत्नी एक लेक्चरर है। सुनवाई के दौरान दी गई दलीलों के अनुसार, पत्नी की आर्थिक स्थिति पति से बेहतर है और उसने अब तक किसी भी तरह के भरण-पोषण या गुज़ारा भत्ते की मांग नहीं की।

    याचिकाकर्ता-पति ने तलाक़ की कार्यवाही शुरू करते हुए आरोप लगाया कि शादी के सिर्फ़ एक हफ़्ते बाद ही, प्रतिवादी-पत्नी का रवैया बदल गया और उसने उसके साथ बुरा बर्ताव करना शुरू किया। उसके दावों के अनुसार, पत्नी उसके और उसके माता-पिता के लिए अपशब्दों का इस्तेमाल करती थी, उनके लिए खाना बनाने से मना कर देती थी और बच्चे को जन्म देने के बाद भी उसने उसे (पति को) बच्चे के नामकरण समारोह में आमंत्रित नहीं किया।

    दूसरी ओर, पत्नी ने दावा किया कि वह बच्चे के जन्म के लिए अपने माता-पिता के घर पति और उसके परिवार की सहमति से ही गई। हालांकि, वे लोग नामकरण समारोह में शामिल नहीं हुए और उसके माता-पिता से नकद पैसे और सोना मांगा। उसने यह भी दावा किया कि उसे अपनी तनख्वाह (सैलरी) उन्हें देने के लिए मजबूर किया गया।

    फ़ैमिली कोर्ट ने पति की याचिका स्वीकार की और क्रूरता के आधार पर तलाक़ की डिक्री जारी कर दी। पत्नी ने इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ हाईकोर्ट में अपील की, जिसने तलाक़ की डिक्री रद्द की। इस फ़ैसले से असंतुष्ट होकर पति ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया।

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