जो महिलाएं भगवान अयप्पा की सच्ची भक्त हैं, वे 50 साल की उम्र तक सबरीमाला नहीं जाएंगी: सुप्रीम कोर्ट

Shahadat

29 April 2026 8:30 PM IST

  • जो महिलाएं भगवान अयप्पा की सच्ची भक्त हैं, वे 50 साल की उम्र तक सबरीमाला नहीं जाएंगी: सुप्रीम कोर्ट

    सबरीमाला मामले की सुनवाई के दौरान, सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को मौखिक रूप से टिप्पणी की कि जो महिलाएं भगवान अयप्पा की सच्ची भक्त हैं, वे 50 साल की उम्र तक सबरीमाला मंदिर नहीं जाएंगी।

    मामले की सुनवाई के दसवें दिन, 9 जजों की बेंच सीनियर एडवोकेट इंदिरा जयसिंह की दलीलें सुन रही थी। इंदिरा जयसिंह उन दो महिलाओं का प्रतिनिधित्व कर रही थीं, जिन्होंने 2018 के उस फैसले के बाद सबरीमाला मंदिर में प्रवेश किया, जिसमें सभी उम्र की महिलाओं को इस पहाड़ी मंदिर में प्रवेश का अधिकार दिया गया।

    जयसिंह ने दलील दी कि महिलाओं को मंदिर से बाहर रखना एक तरह की 'छुआछूत' है, जिसे संविधान के अनुच्छेद 17 के तहत प्रतिबंधित किया गया। उन्होंने बेंच को बताया कि महिलाओं के मंदिर में प्रवेश करने के बाद वहां एक 'शुद्धिकरण समारोह' किया गया। उन्होंने तर्क दिया कि यह सोच कि महिलाओं के प्रवेश से मंदिर अपवित्र या दूषित हो जाता है, अपने आप में एक तरह की छुआछूत है।

    जयसिंह ने बेंच को बताया कि बिंदु, जो उन महिलाओं में से एक थीं, जिन्होंने मंदिर का दौरा किया, उस समय 40 साल की थीं। उन्होंने आगे बताया कि बिंदु इससे पहले 11 साल की उम्र में भी मंदिर जा चुकी थीं।

    इस पर जस्टिस नागरत्ना ने पूछा,

    "उन्होंने 10 से 50 साल की उम्र के बीच क्या किया?"

    उनका इशारा इस बात की ओर था कि अगर वह सच्ची भक्त थीं, तो उन्होंने इससे पहले कभी मंदिर जाने की कोशिश क्यों नहीं की।

    जयसिंह ने कहा कि वह कानून की पढ़ाई कर रही थीं और एक लॉ टीचर के तौर पर काम कर रही थीं।

    जस्टिस अरविंद कुमार ने पूछा,

    "तो क्या अचानक, एक सुबह आप जागीं और आपने मंदिर जाने का फैसला कर लिया?"

    जयसिंह ने जवाब दिया,

    "हम सभी इस अदालत के फैसलों के साथ ही जागते हैं... इसमें कुछ भी नया नहीं है।"

    बेंच ने पूछा कि अगर इन महिलाओं ने पहले कभी मंदिर जाने की परवाह नहीं की थी तो 2018 के फैसले के तुरंत बाद ही उन्होंने मंदिर जाने का फैसला क्यों किया?

    जस्टिस नागरत्ना ने पूछा,

    "क्या वह एक भक्त हैं?"

    जयसिंह ने जवाब दिया,

    "मैं इस सवाल का जवाब दूंगी।"

    जस्टिस नागरत्ना ने फिर पूछा,

    "क्या यह एक मुश्किल सवाल है?"

    जयसिंह कुछ देर रुकीं और बोलीं,

    "मैं इस सवाल का जवाब दूंगी। अगर मैं कहूं कि वह आत्म-मंथन के लिए गई थीं तो क्या इससे कोर्ट संतुष्ट हो जाएगा?"

    जस्टिस नागरत्ना ने पूछा,

    "क्या कोई ऐसा व्यक्ति भी वहां जाता है, जो भक्त न हो?"

    जयसिंह ने जवाब दिया,

    "आत्म-मंथन ही धर्म का मूल है... हम सभी उस शाश्वत प्रश्न का उत्तर खोजते हैं कि 'मैं कौन हूँ'?"

    जस्टिस नागरत्ना ने कहा,

    "हम आत्म-मंथन का सम्मान करते हैं, लेकिन यह एक दिन में नहीं होता।"

    जयसिंह ने जवाब दिया,

    "अगर मैं कहूं कि वह अपनी अंतरात्मा की आवाज़ पर वहाँ गई थीं तो क्या इससे कोर्ट संतुष्ट हो जाएगा?"

    जस्टिस नागरत्ना ने कहा,

    "10 से 50 साल की उम्र के सच्चे भक्त तो घर पर ही रहते हैं और मंदिर नहीं जाते।"

    फिर जस्टिस अमनुल्लाह ने जयसिंह से कहा,

    "आपके पक्ष में एक बात हो सकती है। कोई नहीं जानता कि वह 50 साल तक जीवित रहेगा या नहीं... इसलिए इसे एक स्थायी अक्षमता भी माना जा सकता है।"

    जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि हिंदू धर्म में जन्म और मृत्यु के बाद कुछ समय के लिए 'अशुद्धि' (Defilement) का एक विचार है, जिस दौरान लोग मंदिर जाने से बचते हैं।

    जज ने टिप्पणी की कि कल को कोई व्यक्ति याचिका दायर करके यह दावा कर सकता है कि उसे उस दौरान भी मंदिर जाने का अधिकार है।

    जयसिंह ने तर्क दिया कि सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर रोक लगाने की कोई ऐतिहासिक परंपरा नहीं रही है। उन्होंने कहा कि ऐसे रिकॉर्ड मौजूद हैं, जिनसे पता चलता है कि त्रावणकोर की रानी अपने बच्चे के 'अन्नप्राशन' (चावल खिलाने की रस्म) के लिए मंदिर गई थीं। उस समय उनकी उम्र 50 साल से कम थी। उन्होंने कहा कि केरल हाई कोर्ट में 'तांत्री' द्वारा दायर हलफनामे में इस तथ्य का स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया।

    जयसिंह ने अपने बचपन के दिनों में अपने परिवार में मासिक धर्म को लेकर होने वाले भेदभाव को देखने का अपना निजी अनुभव भी बताया। उन्होंने कहा कि मासिक धर्म के दौरान उन्हें अपनी माँ को छूने की इजाज़त नहीं थी। उन्होंने कहा कि उनके परिवार में महिलाओं को अंतिम संस्कार की चिता के पास जाने की इजाज़त नहीं थी। लेकिन अब, वह प्रथा खत्म हो चुकी है।

    जयसिंह ने पूछा,

    "इस पाबंदी का आधार क्या है? इसका आधार यह है कि इस दौरान मुझे अपवित्र माना जाता है, कि अगर मैं वहाँ जाऊँगी तो मैं उसे दूषित कर दूंगी। यह बात मेरी ज़िंदगी के एक बड़े हिस्से पर लागू होती है। मुझे उस दौरान जीना बंद करने के लिए क्यों कहा जाए?"

    उन्होंने कहा कि जब मासिक धर्म के आधार पर उनके साथ भेदभाव किया जाता था तो उन्हें व्यक्तिगत रूप से छुआछूत का शिकार होने जैसा महसूस होता था।

    जयसिंह ने कहा,

    "मेरी सोच यह है। मुझे पता है कि जब मुझे अंदर जाने की इजाज़त नहीं होती तो मुझे कैसा महसूस होता है। मैं अपनी भावनाओं को जानती हूं। मुझे पता है कि जब मुझे अपनी माँ को छूने की इजाज़त नहीं थी तो मुझे कैसा महसूस हुआ था... मेरे परिवार में मुझे एक हफ़्ते तक अपनी माँ को छूने की इजाज़त नहीं थी। उन्हें हमारे साथ मेज़ पर खाना खाने की भी इजाज़त नहीं थी। खैर, अब वह बात बीत चुकी है, वह इतिहास का हिस्सा बन चुकी है। मैं अब उस पर अफ़सोस नहीं करना चाहती। मेरी ज़िंदगी का वह दौर अब खत्म हो चुका है..."

    जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि इसे छुआछूत के अर्थ में अपवित्रता या दूषित होने के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। पिछली सुनवाई के दौरान भी जस्टिस नागरत्ना ने सबरीमाला मामले में अनुच्छेद 17 को लागू करने को लेकर अपनी आपत्तियां ज़ाहिर की थीं।

    जयसिंह ने आज यह भी तर्क दिया कि अनुच्छेद 25 और 26 के तहत 'नैतिकता' की व्याख्या 'सार्वजनिक नैतिकता' के तौर पर नहीं की जा सकती, क्योंकि सार्वजनिक नैतिकता पूर्वाग्रहों पर आधारित हो सकती है। उन्होंने संवैधानिक नैतिकता के मानदंडों को अपनाने की वकालत की। उन्होंने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि संविधान व्यक्तियों के लिए लिखा गया। किसी व्यक्ति के मौलिक अधिकारों को किसी समूह के अधिकारों के अधीन नहीं किया जा सकता।

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