पश्चिम बंगाल में 'फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल' न होने के कारण सुप्रीम कोर्ट ने अवैध प्रवासियों को ज़मानत की शर्तों के लिए मजिस्ट्रेट के पास जाने की इजाज़त दी
Shahadat
1 Sept 2026 10:49 AM IST

सुप्रीम कोर्ट ने 31 अगस्त को मई 2025 के आदेश को स्पष्ट किया। इस आदेश में पश्चिम बंगाल सरकार को निर्देश दिया गया कि वह उन अवैध विदेशी प्रवासियों की पहचान करे और उन्हें ज़मानत पर रिहा करे, जो सज़ा पूरी होने के 3 साल बाद भी राज्य की जेलों में बंद हैं।
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने आदेश में 'फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल' के साथ-साथ 'अधिकार-क्षेत्र वाली ट्रायल कोर्ट' (jurisdictional trial court) शब्द भी जोड़ा। यह बदलाव तब किया गया, जब यह बताया गया कि आदेश में दर्ज ज़मानत की दो शर्तों में 'फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल' शब्द का इस्तेमाल किया गया, जबकि पश्चिम बंगाल में ऐसा कोई ट्रिब्यूनल है ही नहीं।
बेंच ने यह आदेश वकील सौतिक बनर्जी द्वारा स्पष्टीकरण मांगे जाने के बाद जारी किया।
यह मामला 2011 में याचिकाकर्ता द्वारा कलकत्ता हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस को लिखे गए एक पत्र से शुरू हुआ था। इस पत्र में बांग्लादेश से आए अवैध प्रवासियों की दयनीय स्थिति का ज़िक्र किया गया। 'फॉरेनर्स एक्ट' के तहत सज़ा पूरी होने के बावजूद, उन्हें उनके देश वापस भेजने के बजाय सुधार गृहों (Correctional Homes) में बंद रखा जा रहा है। हाईकोर्ट ने इस पत्र पर स्वतः संज्ञान (suo motu cognizance) लिया था, लेकिन 2013 में यह मामला सुप्रीम कोर्ट को ट्रांसफर कर दिया गया।
पिछले साल जस्टिस जेबी पारदीवाला की अध्यक्षता वाली 2-जजों की बेंच ने इस मामले को CJI कांत की बेंच को ट्रांसफर करने का प्रस्ताव दिया, जो रोहिंग्याओं से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी।
जस्टिस पारदीवाला की बेंच ने पश्चिम बंगाल की जेलों में बंद उन अवैध प्रवासियों को भी ज़मानत दी, जिनकी सज़ा पूरी होने के बाद 3 साल बीत चुके हैं।
यह ज़मानत इन शर्तों पर दी गई:
“(1) भारतीय नागरिकों की ओर से 1,00,000 रुपये (एक लाख रुपये) की दो ज़मानतों के साथ बॉन्ड भरना।
(2) रिहाई के बाद रहने का ऐसा पता बताना जिसकी पुष्टि की जा सके।
(3) डिटेंशन सेंटर से रिहाई से पहले उनकी आँखों की पुतली (अगर संभव हो तो) और दसों उंगलियों के निशान और फ़ोटो लेकर एक सुरक्षित डेटाबेस में स्टोर किए जाएँगे। उन्हें फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल द्वारा बताए गए पुलिस स्टेशन में हर हफ़्ते रिपोर्ट करना होगा।
(4) उन्हें अपने पते में किसी भी बदलाव की जानकारी उसी दिन बताए गए पुलिस स्टेशन को देनी होगी।
(5) पुलिस अधीक्षक (बॉर्डर) को फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल को एक तिमाही रिपोर्ट देनी होगी कि ऐसे रिहा किए गए 'घोषित विदेशी' (DFN) संबंधित पुलिस स्टेशन में हाज़िर हुए या नहीं। अगर शर्तों का उल्लंघन होता है, तो DFN को हिरासत में लिया जाएगा और फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल के सामने पेश किया जाएगा।”
CJI कांत की बेंच ने इस आदेश को स्पष्ट करते हुए शर्तों (c) और (e) में "अधिकार-क्षेत्र वाली ट्रायल कोर्ट/फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल" शब्द जोड़ने को कहा।
Case : MS MAJA DARUWALA AND ANR. v. UNION OF INDIA |T.C.(Crl.) No. 1/2013


