सुप्रीम कोर्ट ने ऑटिज़्म, सेरेब्रल पाल्सी और मल्टीपल डिसेबिलिटी वाले लोगों को जारी की गई इंश्योरेंस पॉलिसी का डेटा मांगा

  • सुप्रीम कोर्ट ने ऑटिज़्म, सेरेब्रल पाल्सी और मल्टीपल डिसेबिलिटी वाले लोगों को जारी की गई इंश्योरेंस पॉलिसी का डेटा मांगा

    सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को इंश्योरेंस रेगुलेटरी एंड डेवलपमेंट अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया (IRDAI) को निर्देश दिया कि वह पब्लिक और प्राइवेट सेक्टर की इंश्योरेंस कंपनियों द्वारा ऑटिज़्म, सेरेब्रल पाल्सी, इंटेलेक्चुअल डिसेबिलिटी और मल्टीपल डिसेबिलिटी वाले लोगों को जारी की गई इंश्योरेंस पॉलिसी की संख्या का डेटा रिकॉर्ड पर रखे।

    जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच ने PIL पर यह आदेश दिया। इस PIL में न्यूरो-डेवलपमेंटल और अन्य तरह की डिसेबिलिटी वाले लोगों के अधिकारों की सुरक्षा में कथित सिस्टम की कमियों को दूर करने के उपाय करने की मांग की गई।

    कोर्ट ने आदेश दिया,

    "इंश्योरेंस रेगुलेटरी डेवलपमेंट अथॉरिटी (IRDA) के वकील अगली सुनवाई की तारीख तक निर्देश लें और ऑटिज़्म, सेरेब्रल पाल्सी, मानसिक मंदता और मल्टीपल डिसेबिलिटी वाले लोगों के जीवन का बीमा करने के लिए पब्लिक और प्राइवेट सेक्टर की इंश्योरेंस कंपनियों द्वारा जारी पॉलिसी की संख्या का डेटा पेश करें।"

    याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि रेगुलेटरी फ्रेमवर्क के तहत इंश्योरेंस कंपनियों को डिसेबिलिटी और मानसिक बीमारी वाले लोगों को कवरेज देना ज़रूरी है, इसके बावजूद ऑटिज़्म वाले लोगों के लिए इंश्योरेंस कवरेज या तो है ही नहीं या फिर अपर्याप्त है। सुनवाई के दौरान, IRDAI के वकील ने डिसेबिलिटी और मानसिक बीमारी वाले लोगों के लिए इंश्योरेंस कवरेज पर रेगुलेटर द्वारा जारी सर्कुलर का ज़िक्र किया।

    इसके बाद कोर्ट ने IRDAI से निर्देश लेने और ऑटिज़्म, सेरेब्रल पाल्सी, इंटेलेक्चुअल डिसेबिलिटी और मल्टीपल डिसेबिलिटी वाले लोगों के जीवन का बीमा करने के लिए पब्लिक और प्राइवेट सेक्टर की इंश्योरेंस कंपनियों द्वारा जारी पॉलिसी की संख्या दिखाने वाला डेटा पेश करने को कहा। यह जानकारी 19 नवंबर को अगली सुनवाई की तारीख तक कोर्ट के सामने पेश करनी होगी।

    PIL में ऑटिज़्म, डिस्लेक्सिया और ADHD जैसी न्यूरो-डायवर्जेंट स्थितियों वाले लोगों के प्रति संवैधानिक, कानूनी और अंतरराष्ट्रीय दायित्वों को पूरा करने में "लगातार उपेक्षा, संस्थागत उदासीनता और विफलता" को दूर करने के लिए निर्देश देने की मांग की गई।

    याचिका में नेशनल ट्रस्ट एक्ट, 1999, राइट्स ऑफ़ पर्सन्स विद डिसेबिलिटीज़ एक्ट, 2016, मेंटल हेल्थकेयर एक्ट, 2017 और नेशनल ट्रस्ट (संशोधन) एक्ट, 2018 को लागू करने में सिस्टम की कमियों का आरोप लगाया गया।

    इसमें कहा गया कि इन कानूनों के बावजूद, मानसिक स्वास्थ्य इंफ्रास्ट्रक्चर, फंडिंग, एक्सेसिबिलिटी और जन जागरूकता में काफी कमियां बनी हुई हैं। याचिका में बजट में कम आवंटन, रिहैबिलिटेशन सेंटर्स की कमी और कम्युनिटी-बेस्ड रिहैबिलिटेशन सेवाओं की अपर्याप्तता की ओर इशारा किया गया। इसमें यह भी आरोप लगाया गया कि सामाजिक कलंक और संस्थागत उदासीनता रिहैबिलिटेशन और सामाजिक समावेश में बाधा बनी हुई।

    बीमा के अलावा, याचिका में हवाई यात्रा, रेलवे और मेट्रो में न्यूरोडायवर्जेंट लोगों को शामिल न करने, सेंसरी-फ्रेंडली इंफ्रास्ट्रक्चर और ट्रेंड स्टाफ की कमी, डायग्नोसिस और शुरुआती हस्तक्षेप में कमियों, समावेशी शिक्षा नीतियों को लागू न करने और यूनिक डिसेबिलिटी आईडी (UDID) सर्टिफिकेट प्राप्त करने में समस्याओं के बारे में चिंताएं उठाई गईं।

    याचिका में रोजगार से जुड़ी चिंताओं पर भी प्रकाश डाला गया। इसमें आरोप लगाया गया कि न्यूरोडायवर्जेंट लोगों को अक्सर CSR-फंडेड रोजगार पहलों से बाहर रखा जाता है और उन्हें स्थायी रोजगार के बजाय अस्थायी इंटर्नशिप की पेशकश की जाती है। इसमें आगे आरोप लगाया गया कि प्राइवेट स्कूल कभी-कभी ADHD या ऑटिज्म जैसी स्थितियों वाले छात्रों को उचित सुविधाएँ देने के बजाय स्कूल से निकाल देते हैं या उन्हें नाम वापस लेने के लिए मजबूर करते हैं।

    याचिकाकर्ता ने न्यूरोडायवर्जेंट लोगों की पहचान, मानसिक स्वास्थ्य देखभाल, उपचार, रिहैबिलिटेशन, आवासीय सहायता और बीमा कवरेज को शामिल करते हुए एक व्यापक राष्ट्रीय नीति के लिए निर्देश मांगे हैं।

    इसमें कानून प्रवर्तन, विमानन, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा में कर्मचारियों के लिए अनिवार्य प्रशिक्षण और संवेदीकरण, UDID प्रमाणन प्रक्रिया को सुव्यवस्थित करने, अधिक प्रमाणन केंद्र बनाने, समावेशी शिक्षा के उपाय, कम्युनिटी-बेस्ड मानसिक स्वास्थ्य सुविधाएं, हवाई अड्डों और परिवहन केंद्रों पर सेंसरी इंफ्रास्ट्रक्चर, जिला-स्तरीय निगरानी समितियां, समर्पित मानसिक स्वास्थ्य बजट लाइन और 24/7 हेल्पलाइन की भी मांग की गई।

    अदालत ने इस मामले को 19 नवंबर, 2026 के लिए सूचीबद्ध किया।

    Case Title – Action for Autism v. Union of India & Ors.

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