सुप्रीम कोर्ट ने 2002 के हरियाणा सिविल सर्विस भर्ती में जालसाजी के आरोपों पर चार्जशीट रद्द करने वाले आदेश पर उठाया सवाल

Shahadat

22 May 2026 9:36 AM IST

  • सुप्रीम कोर्ट ने 2002 के हरियाणा सिविल सर्विस भर्ती में जालसाजी के आरोपों पर चार्जशीट रद्द करने वाले आदेश पर उठाया सवाल

    2002 में भर्ती को लेकर हरियाणा सिविल सेवा के 8 अधिकारियों के खिलाफ धोखाधड़ी और जालसाजी के मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट के उस आदेश की आलोचना की, जिसमें आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट रद्द कर दी गई थी।

    कोर्ट ने हाईकोर्ट के जांच एजेंसियों की भूमिका निभाने पर सवाल उठाया, क्योंकि उसने राज्य के अतिरिक्त एडवोकेट जनरल द्वारा उसके सामने रखे गए एक हलफनामे की सच्चाई परखने के लिए उत्तर पुस्तिकाओं की जांच की थी। कोर्ट ने आगे यह भी कहा कि हाईकोर्ट ने उत्तर पुस्तिकाओं को सालों तक अपने पास रखा, जिससे जांच पूरी होने में रुकावट आई।

    जस्टिस विक्रम नाथ और संदीप मेहता की बेंच ने सीनियर एडवोकेट आर. बसंत (याचिकाकर्ता की ओर से) और सीनियर एडवोकेट मुकुल रोहतगी, रंजीत कुमार और गुरमिंदर सिंह (प्रतिवादियों की ओर से) की दलीलें सुनने के बाद अगली सुनवाई की तारीख पर हरियाणा के एडवोकेट जनरल की सहायता और जांच अधिकारी (सभी संबंधित दस्तावेजों के साथ) की उपस्थिति का निर्देश दिया।

    उल्लेखनीय है कि सुनवाई के दौरान एक मौके पर बेंच ने मौखिक रूप से कहा कि यदि दस्तावेजों की जांच करने पर उसे धोखाधड़ी, जालसाजी, ओवरराइटिंग, दोहरी लिखावट आदि के आरोप सही पाए जाते हैं तो वह इस भर्ती को रद्द कर देगी। इसके विकल्प के तौर पर बेंच ने हाईकोर्ट का आदेश रद्द करने और जांच पूरी होने के बाद मामले को आगे बढ़ाने का प्रस्ताव भी दिया।

    जस्टिस नाथ ने प्रतिवादियों से कहा,

    "हम यहां भी कॉपियां मंगवा सकते हैं। हम IO, Addl. AG, या हरियाणा के एडवोकेट जनरल को रिकॉर्ड के साथ यहां बुला सकते हैं। अगर हमें किसी बात की जानकारी मिलती है और हम उसे लिखित रूप में देखते हैं तो हम उचित कदम उठाने और उचित आदेश देने से पीछे नहीं हटेंगे। अगर हम सब कुछ यहां मंगवाते हैं और उसकी जांच करते हैं। हमें पता चलता है कि पूरी चयन प्रक्रिया में कुछ गंभीर गड़बड़ है - जैसे कि हेरफेर, ओवरराइटिंग, कटिंग, दो अलग-अलग लिखावटें, या एक ही आंसर शीट में अलग-अलग लिखावटें - तो हम पूरे चयन को रद्द कर देंगे।

    इसके अलावा, आपके मामले हाईकोर्ट में पहले से ही लंबित हैं; हम इन मामलों को वापस भेज सकते हैं, हाईकोर्ट का आदेश रद्द कर सकते हैं और जांच को जारी रहने दे सकते हैं। सरकार ने अब तक आपके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की। चयन प्रक्रिया को बिल्कुल भी नहीं छेड़ा गया। हर कोई अपना काम कर रहा है। हालांकि, अगर हम अंततः कोई फैसला लेते हैं तो आपकी नौकरी चली जाएगी। अगर हमें पता चलता है कि पूरी तरह से हेरफेर और जालसाजी हुई है, तो हम सब कुछ रद्द कर देंगे।"

    संक्षेप में मामला

    ये 8 अधिकारी उन 64 उम्मीदवारों में शामिल थे, जिन्हें हरियाणा लोक सेवा आयोग ने सितंबर 2002 में HCS और उससे जुड़ी सेवाओं में विभिन्न पदों के लिए चुना था। भर्ती प्रक्रिया में अनियमितताओं का आरोप लगाते हुए मौजूदा याचिकाकर्ता और तत्कालीन विधायक, करण सिंह दलाल ने हाई कोर्ट में एक रिट याचिका दायर की थी।

    2005 में एक ऐसे व्यक्ति की शिकायत पर FIR दर्ज की गई, जिसने सहायक प्रोफेसरों की भर्ती प्रक्रिया के लिए आवेदन किया, लेकिन उसका चयन नहीं हुआ। इस FIR में उन 8 अधिकारियों के नाम शामिल नहीं थे।

    2023 में पुलिस ने एक चार्जशीट दायर की, जिसमें उन 8 अधिकारियों के नाम भी शामिल थे। इस साल फरवरी में हाईकोर्ट ने उन 8 अधिकारियों के खिलाफ दायर चार्जशीट रद्द कर दिया; कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि 2005 में दर्ज FIR में इन अधिकारियों के नाम शामिल नहीं थे।

    गुरुवार को हुई सुनवाई के दौरान, सीनियर एडवोकेट रणजीत कुमार ने कोर्ट को बताया कि उन 8 अधिकारियों से जुड़ा यह मामला 2022-23 में तब सामने आया, जब उन्हें राज्य सेवा से IAS में पदोन्नत करने की प्रक्रिया शुरू की गई। उन्होंने यह भी बताया कि आज की तारीख में उन अधिकारियों को अस्थायी तौर पर पदोन्नत तो कर दिया गया, लेकिन वे इस पदोन्नति का लाभ नहीं उठा सकते। ऐसा इसलिए है, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के उस फैसले पर रोक लगा दी, जिसमें उन अधिकारियों के खिलाफ दायर चार्जशीट रद्द की गई थी।

    दलीलों को सुनने के बाद जस्टिस नाथ ने पूछा,

    "हाईकोर्ट इन मामलों पर फैसला क्यों नहीं ले पाया, जो पिछले 15 सालों से लंबित हैं?"

    जज ने यह सवाल भी उठाया कि राज्य सरकार ने पूरी परीक्षा रद्द क्यों नहीं की, या हाईकोर्ट ने इस संबंध में कोई उचित आदेश क्यों नहीं दिया, जबकि एडिशनल एडवोकेट जनरल के हलफनामे में धांधली के बारे में स्पष्ट निष्कर्ष दिए गए।

    जस्टिस मेहता ने हैरानी जताते हुए कहा,

    "इस आदेश को पलटने में हमें 3 मिनट लगेंगे। यह आदेश बेतुका है। धोखाधड़ी की FIR में किसी आरोपी का नाम न होना... कॉपियों की जांच नहीं की गई है... हाई कोर्ट ने कॉपियों को अपने पास रखा हुआ है, तो जांच पूरी कैसे होगी? हाईकोर्ट ने 18 साल लगा दिए! क्या इस वजह से जांच रद्द कर दी जानी चाहिए? माफ़ कीजिए, नहीं। ऐसा नहीं हो सकता। इसे टाला जा सकता था, या कुछ और किया जा सकता था, लेकिन रद्द नहीं! एक बार जब यह रद्द हो जाती है, तो किस प्रावधान के तहत IO (जांच अधिकारी) इसे फिर से आगे बढ़ा सकता है? याचिकाकर्ताओं के संबंध में इसे फिर से कैसे शुरू किया जाएगा?"

    रोहतगी की इस दलील के जवाब में कि हाईकोर्ट ने खुद ही जवाब-शीट की जांच की थी ताकि एडिशनल एडवोकेट जनरल के हलफनामे की सच्चाई परखी जा सके, जज ने टिप्पणी की,

    "क्या हाईकोर्ट का काम IO के जांच/अधिकार क्षेत्र में दखल देना था? जब मामला IO के अधिकार क्षेत्र में था तो हाईकोर्ट ने यह कवायद क्यों की? क्या यह हाईकोर्ट का काम है कि वह यह जांचे कि क्या कॉपी में कोई काट-छांट की गई? हाईकोर्ट ने तो असल में जांच अपने हाथ में ही ले ली! यह बिल्कुल भी हाईकोर्ट के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता! पूरी तरह से अज्ञानता..."

    जस्टिस मेहता ने यह भी टिप्पणी की कि हाई कोर्ट द्वारा राज्य को यह छूट देना कि वह उचित चरण पर मामले की जांच करे—"अगर वह चाहे तो"—तो यह "देखने में ही एक दिखावा" था।

    उन्होंने कहा,

    "यह आदेश देखने में ही पूरी तरह से गलत है।"

    दिलचस्प बात यह है कि जब बसंत ने यह बताया कि राज्य ने हाई कोर्ट के आदेश के खिलाफ कोई अपील दायर नहीं की। आरोप लगाया कि राज्य प्रतिवादी-अधिकारियों के साथ मिलीभगत कर रहा है तो जस्टिस नाथ ने भी टिप्पणी की कि राज्य तो दोनों ही पक्षों के साथ मिलीभगत कर रहा है।

    जज ने टिप्पणी की,

    "राज्य की मिलीभगत आपके साथ भी रही है और उनके साथ भी... राज्य तो शुरू से ही अपना खेल खेलता आ रहा है।"

    इस मामले की अगली सुनवाई मंगलवार को होगी।

    Case Title: Karan Singh Dalal v. State of Haryana and Ors., SLP (Crl) No.5598-5605/2026

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