शिकायतकर्ता के ख़िलाफ़ कथित अपराध को रोकने के लिए अपना घर खाली कर दे आरोपी: हाईकोर्ट की ज़मानत शर्त, सुप्रीम कोर्ट ने की रद्द

Shahadat

4 May 2026 6:08 PM IST

  • शिकायतकर्ता के ख़िलाफ़ कथित अपराध को रोकने के लिए अपना घर खाली कर दे आरोपी: हाईकोर्ट की ज़मानत शर्त, सुप्रीम कोर्ट ने की रद्द

    सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा लगाई गई ज़मानत शर्त रद्द की। इस शर्त के तहत आरोपी को अपना घर सिर्फ़ इसलिए खाली करने को कहा गया था ताकि उसी बिल्डिंग में रहने वाले शिकायतकर्ता के ख़िलाफ़ कोई संभावित अपराध न हो सके।

    जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की बेंच ने आरोपी की अपील पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की। आरोपी ने हाईकोर्ट की उस शर्त को चुनौती दी थी, जिसमें उसे उसी बिल्डिंग से बाहर निकालने का आदेश दिया गया, जहां वह और शिकायतकर्ता दोनों रहते हैं।

    बेंच ने कहा,

    "ज़मानत की रियायत का लाभ उठाने के लिए शर्तें लगाने का उद्देश्य स्पष्ट है। हालांकि, कोई ऐसी शर्त जो असल में किसी व्यक्ति को उसके घर से बेदखल करने जैसी हो, उसे अमान्य ठहराया जा सकता है। ऐसा तभी नहीं होगा, जब यह दिखाने के लिए कोई स्पष्ट और ठोस सबूत हो कि कोई कम प्रतिबंधात्मक उपाय काफ़ी नहीं होगा। अगर ऐसा संतोषजनक आधार न हो तो वह शर्त निवारक (रोकने वाली) के बजाय दंडात्मक (सज़ा देने वाली) बन जाएगी।"

    यह मामला दिल्ली के हौज खास पुलिस स्टेशन में दर्ज FIR से जुड़ा है। यह FIR भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की धारा 110(3) और 3(5) (जो IPC की धारा 308 और 34 के बराबर हैं) के तहत दर्ज की गई। FIR तब दर्ज की गई, जब अपीलकर्ता और शिकायतकर्ता के बीच हिंसक झड़प हुई। ये दोनों रिश्तेदार हैं और एक ही बिल्डिंग में रहते हैं।

    अपीलकर्ता को ज़मानत देते समय दिल्ली हाईकोर्ट ने शर्त लगाई थी कि आरोपी "उसी बिल्डिंग में नहीं रहेगा, जहां शिकायतकर्ता रहता है"। साथ ही उसे अपने रहने की जगह में किसी भी बदलाव के बारे में अधिकारियों को सूचित करना होगा।

    ज़मानत की इस शर्त को चुनौती देते हुए आरोपी सुप्रीम कोर्ट गया।

    विवादित शर्त रद्द करते हुए कोर्ट ने टिप्पणी की कि हाईकोर्ट ने शिकायतकर्ता के ख़िलाफ़ अपराध होने से रोकने की आड़ में आरोपी के अपने घर में रहने के अधिकार को बेवजह सीमित कर दिया था। कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि इस तरह की रोकथाम पुलिस का वैधानिक कर्तव्य है। यह कर्तव्य BNSS (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता) की धारा 168 (जो CrPC की धारा 149 के बराबर है) के तहत आता है। यह धारा कानून लागू करने वाली एजेंसियों पर यह महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी डालती है कि वे संज्ञेय अपराधों (गंभीर अपराधों) को रोकें और इसके लिए ज़रूरी निवारक उपाय करें।

    अदालत ने टिप्पणी की,

    “आरोपी पर ऐसी शर्त थोपकर बोझ डालना उचित नहीं होगा, जो संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत मिले किसी व्यक्ति के रहने के अधिकार को बेवजह सीमित करती हो।…जिस शर्त को चुनौती दी गई, वैसी शर्त संविधान के अनुच्छेद 21 द्वारा गारंटीकृत अधिकारों में गंभीर कटौती करती है। इसलिए उसे औचित्य, आनुपातिकता और आवश्यकता की कसौटी पर खरा उतरना चाहिए।”

    आगे कहा गया,

    “हमारी सुविचारित राय है कि मुकदमे के दौरान अपीलकर्ता के शिकायतकर्ता के साथ उसी इमारत में रहने के अधिकार को सीमित करने वाली शर्त पर रोक लगा दी जानी चाहिए।”

    अदालत ने फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया कि हाईकोर्ट द्वारा लगाई गई अन्य शर्तें यथावत रहेंगी।

    उपर्युक्त के आधार पर अपील स्वीकार की गई।

    Cause Title: SACHIN YADAV VERSUS STATE (NCT of DELHI) & ANR.

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