रेप केस में केरल हाईकोर्ट की टिप्पणियां सुप्रीम कोर्ट ने हटाईं, MLA राहुल ममकूटाथिल को मिली अग्रिम जमानत बरकरार
Praveen Mishra
25 March 2026 1:47 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को केरल हाईकोर्ट द्वारा की गई उन टिप्पणियों को हटाने (expunge) का आदेश दिया, जो एक महिला द्वारा लगाए गए बलात्कार के आरोपों के मामले में की गई थीं। हालांकि, कोर्ट ने केरल के विधायक राहुल ममकूटाथिल को दी गई अग्रिम जमानत (anticipatory bail) में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।
जस्टिस एम.एम. सुंदरश और जस्टिस एन.के. सिंह की खंडपीठ ने यह स्पष्ट किया कि वे हाईकोर्ट के अंतिम निष्कर्ष—अग्रिम जमानत देने—में दखल नहीं देंगे, लेकिन याचिकाकर्ता (पीड़िता) के संबंध में की गई कुछ टिप्पणियां आवश्यक नहीं थीं, इसलिए उन्हें रिकॉर्ड से हटा दिया गया।
याचिकाकर्ता की ओर से एडवोकेट सुभाष चंद्रन केआर ने दलील दी कि पीड़िता की मुख्य आपत्ति हाईकोर्ट की उन टिप्पणियों पर है, जिनमें संबंध को सहमति से बना (consensual) बताया गया था। उनका कहना था कि ऐसी टिप्पणियां ट्रायल को प्रभावित कर सकती हैं।
यह मामला पूर्व कांग्रेस विधायक के खिलाफ दर्ज तीन बलात्कार मामलों में से पहला है। यह मामला 28 नवंबर 2025 को नेमोम पुलिस स्टेशन में दर्ज किया गया था, जिसमें भारतीय न्याय संहिता (BNS) की विभिन्न धाराओं—धारा 64(2)(f), 64(2)(h), 64(2)(m) (बलात्कार), धारा 89 (बिना सहमति गर्भपात कराना), धारा 115(2) और 351(3) (आपराधिक धमकी)—साथ ही सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 66E के तहत आरोप लगाए गए हैं।
याचिका में कहा गया कि हाईकोर्ट ने अग्रिम जमानत याचिका पर विचार करते समय अपनी सीमाओं का उल्लंघन करते हुए साक्ष्यों का विस्तृत विश्लेषण किया और ऐसे निष्कर्ष दर्ज किए, जो ट्रायल को प्रभावित कर सकते हैं।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि शिकायतकर्ता घटना के बाद आरोपी के फ्लैट पर गई और दो दिन तक वहां रुकी, जिससे “prima facie सहमति से संबंध” होने का संकेत मिलता है। साथ ही, व्हाट्सएप चैट्स और सह-आरोपी के साथ बातचीत के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला गया कि दोनों के बीच गहरा व्यक्तिगत संबंध था और शिकायतकर्ता ने कथित रूप से स्वेच्छा से गर्भपात की गोलियां लीं।
याचिकाकर्ता का कहना है कि इस तरह की टिप्पणियां उसके चरित्र पर संदेह डालती हैं और जमानत के चरण में इस प्रकार का “मिनी ट्रायल” करना न्यायसंगत नहीं है।
याचिका में सुप्रीम कोर्ट के फैसलों—State of Karnataka v. Sri Darshan (2025) और XYZ v. State of Madhya Pradesh (2021)—का हवाला देते हुए कहा गया कि जमानत के दौरान साक्ष्यों की गहन जांच नहीं की जानी चाहिए और ऐसे तर्कों से बचना चाहिए जो यौन अपराधों की गंभीरता को कम करते हों या पीड़िता के चरित्र पर प्रश्न उठाते हों।
याचिका में यह भी कहा गया कि केवल यह तथ्य कि शिकायतकर्ता आरोपी के संपर्क में थी या उसके साथ व्यक्तिगत संबंध था, सहमति का प्रमाण नहीं माना जा सकता। भारतीय न्याय संहिता के अनुसार सहमति स्पष्ट और स्वैच्छिक होनी चाहिए, और पूर्व संबंध का अर्थ यह नहीं कि हर बार सहमति मौजूद थी।
पीड़िता का आरोप है कि आरोपी ने उसके साथ बार-बार यौन शोषण किया और बाद में गर्भपात के लिए दबाव डाला, जिसमें निजी वीडियो लीक करने की धमकी और भावनात्मक दबाव शामिल था। आरोप है कि उसने धमकियों के तहत गर्भपात की दवाएं लीं।
याचिका में यह भी कहा गया कि आरोपी के खिलाफ यौन अपराधों से जुड़े कई अन्य FIR लंबित हैं, जिन्हें हाईकोर्ट ने जमानत देते समय पर्याप्त महत्व नहीं दिया।
साथ ही, पीड़िता ने आरोप लगाया कि आरोपी से जुड़े लोगों द्वारा सोशल मीडिया पर उसकी पहचान उजागर करने और ऑनलाइन उत्पीड़न की कोशिशें की गईं। याचिका में कहा गया कि आरोपी एक प्रभावशाली राजनेता और मौजूदा विधायक है, जो अपने पद का दुरुपयोग कर सकता है, और ऐसे में उसे अग्रिम जमानत देना जांच को प्रभावित कर सकता है।

