50% से ज़्यादा आरक्षण वाली सीटों को 'ओपन कैटेगरी' की सीटें मानने की बात:सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र में स्थानीय निकाय चुनाव की मांग वाली याचिका पर जारी किया नोटिस

Shahadat

19 July 2026 7:33 PM IST

  • 50% से ज़्यादा आरक्षण वाली सीटों को ओपन कैटेगरी की सीटें मानने की बात:सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र में स्थानीय निकाय चुनाव की मांग वाली याचिका पर जारी किया नोटिस

    सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में महाराष्ट्र सरकार और महाराष्ट्र राज्य चुनाव आयोग को याचिका पर नोटिस जारी किया। इस याचिका में महाराष्ट्र में स्थानीय निकायों के चुनाव तुरंत कराने के निर्देश देने की मांग की गई। संबंधित स्थानीय निकायों का कार्यकाल खत्म हुए 506 दिन बीत जाने के बाद भी ये चुनाव नहीं हुए।

    याचिका में मांग की गई कि संबंधित ज़िला परिषदों और पंचायत समितियों के चुनाव तुरंत कराए जाएं। साथ ही यह घोषित किया जाए कि 50% की सीमा से ज़्यादा आरक्षण वाली सीटों को 'ओपन कैटेगरी' की सीटें माना जाए। यह भी निर्देश दिया जाए कि संविधान के भाग IX के तहत होने वाले चुनावों को संविधान के अनुसार अमान्य आरक्षण ढांचे के कारण टाला न जाए। इसके अलावा, भविष्य में संवैधानिक सीमाओं का पालन करते हुए समय पर स्थानीय निकाय चुनाव सुनिश्चित करने के लिए गाइडलाइंस बनाई जाएं।

    याचिका में महाराष्ट्र राज्य में ज़िला परिषदों और पंचायत समितियों के चुनाव न कराए जाने को चुनौती दी गई। आरोप है कि ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि आरक्षण 50% की उस सीमा से ज़्यादा है, जिसे कोर्ट ने 'के. कृष्णा मूर्ति बनाम भारत संघ' और 'विकास किशनराव गवली बनाम महाराष्ट्र राज्य' मामलों में तय किया था।

    चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने संग्राम गोविंदराव पाटिल की याचिका पर नोटिस जारी किया। पाटिल धुले ज़िला परिषद के कुसुम्बे गट के पूर्व निर्वाचित सदस्य हैं।

    यह याचिका संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दायर की गई। इसमें कहा गया कि निर्वाचित स्थानीय निकायों का कार्यकाल 16 जनवरी, 2025 को खत्म होने के बावजूद चुनाव नहीं कराए गए। याचिका में धुले ज़िला परिषद प्रशासन द्वारा 3 अक्टूबर, 2025 को तैयार किए गए आरक्षण विवरण का ज़िक्र है, जिसमें 56 में से 41 सीटें आरक्षित की गई थीं। इसमें यह भी बताया गया कि कई पंचायत समितियों में 85.71% तक सीटें आरक्षित पाई गईं।

    याचिकाकर्ता का तर्क है कि महाराष्ट्र में स्थानीय निकाय चुनाव लगातार न कराना संविधान के भाग IX में दिए गए समय-समय पर लोकतांत्रिक शासन के संवैधानिक आदेश का उल्लंघन है।

    'गवली' मामले के फैसले का हवाला देते हुए याचिकाकर्ता का कहना है कि आरक्षण से जुड़े विवादों के कारण चुनावों को अनिश्चित काल के लिए नहीं टाला जा सकता। समय पर चुनाव सुनिश्चित करने के लिए 50% से ज़्यादा आरक्षित सीटों को 'ओपन कैटेगरी' की सीटें माना जा सकता है। याचिकाकर्ता का यह भी कहना है कि जो राहत मांगी गई, वह कानून की किसी नई घोषणा से संबंधित नहीं है, बल्कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा पहले ही घोषित बाध्यकारी कानून को लागू करने से जुड़ी है।

    बता दें, गवली मामले (2021) में सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र जिला परिषद और पंचायत समिति अधिनियम, 1961 के तहत दिए गए 27% OBC आरक्षण को इस आधार पर रद्द कर दिया था कि इससे 50% की सीमा का उल्लंघन हो रहा है।

    2022 में, कोर्ट ने महाराष्ट्र के स्थानीय चुनावों में OBC (अन्य पिछड़ा वर्ग) आरक्षण के संबंध में यथास्थिति बनाए रखने का निर्देश दिया। इसका मतलब यह था कि जिन 367 स्थानीय निकायों में चुनाव प्रक्रिया की अधिसूचना पहले ही जारी हो चुकी थी, वहां फिलहाल OBC कोटा लागू नहीं किया जा सकता।

    मई 2025 में कोर्ट ने राज्य में स्थानीय निकाय चुनाव (जो 2022 से टले हुए थे) कराने का अंतरिम आदेश दिया। निर्देश दिया गया कि चुनाव जुलाई 2022 में बंथिया आयोग की रिपोर्ट सौंपे जाने से पहले मौजूद OBC आरक्षण के अनुसार कराए जाएं।

    जस्टिस सूर्यकांत (अब CJI) की अध्यक्षता वाली बेंच ने राज्य चुनाव आयोग को चार सप्ताह के भीतर स्थानीय निकाय चुनावों की अधिसूचना जारी करने का निर्देश दिया।

    आदेश दिया गया कि चुनाव प्रक्रिया को चार महीने की अवधि के भीतर पूरा करने का प्रयास किया जाए। चुनाव आयोग को जरूरत पड़ने पर समय बढ़ाने की मांग करने की छूट दी गई।

    नवंबर 2025 में कोर्ट के सामने ऐसी अर्जियां आईं, जिनमें दावा किया गया कि कुछ स्थानीय निकायों में आरक्षण 50% की सीमा से अधिक हो रहा था। कोर्ट ने कहा कि कुल आरक्षण 50% की अधिकतम सीमा से अधिक नहीं हो सकता और राज्य अधिकारियों ने संभवतः उसके मई के आदेश का गलत अर्थ निकाला था। अधिकारियों से कहा गया कि वे 50% से अधिक आरक्षण लागू न करें। उनसे यह भी कहा गया कि वे उन नगर पालिकाओं की संख्या के बारे में जानकारी दें जहां 50% की सीमा पार हो गई।

    बाद में राज्य में कुछ स्थानीय निकायों के चुनाव कराए गए।

    Case Title: SANGRAM GOVINDRAO PATIL v. STATE OF MAHARASHTRA AND ORS., W.P.(C) No. 806/2026

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