सुप्रीम कोर्ट ने ज़मीन विवादों के लिए प्रशिक्षित पेशेवरों के अलग राजस्व न्यायिक कैडर की मांग वाली PIL पर नोटिस जारी किया
Shahadat
2 May 2026 5:34 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में केंद्र और राज्यों, साथ ही भारत के विधि आयोग से ज़मीन विवादों के निपटारे के लिए एक अलग राजस्व न्यायिक कैडर स्थापित करने की मांग वाली जनहित याचिका (PIL) पर जवाब मांगा।
याचिकाकर्ता के अनुसार, लगभग 66% दीवानी मामले ज़मीन विवादों से संबंधित होते हैं। इनका निपटारा ऐसे राजस्व अधिकारियों द्वारा किया जाता है, जिनके पास कानूनी योग्यता नहीं होती है। इसलिए वह ज़मीन विवादों का निपटारा करने वाले सरकारी कर्मचारियों के लिए कानूनी शिक्षा और न्यायिक प्रशिक्षण मॉड्यूल के समान न्यूनतम मानकों को निर्धारित करने की मांग करता है।
याचिकाकर्ता आगे हाईकोर्ट्स को निर्देश देने की मांग करता है कि वे स्वामित्व, उत्तराधिकार, विरासत, कब्ज़ा और अन्य संपत्ति अधिकारों से संबंधित विवादों के निपटारे की निगरानी और पर्यवेक्षण करें।
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की खंडपीठ ने याचिकाकर्ता-एडवोकेट अश्विनी कुमार उपाध्याय को सुनने के बाद यह आदेश पारित किया।
CJI ने टिप्पणी की,
"यह मुद्दा बहुत दिलचस्प और महत्वपूर्ण भी है..."
CJI ने यह भी टिप्पणी की कि प्रतिवादी इस याचिका का विरोध करते हुए यह तर्क दे सकते हैं कि उठाया गया मुद्दा विधायिका के अधिकार क्षेत्र में आता है। हालांकि, उपाध्याय ने इसका प्रतिवाद करते हुए कहा कि यह मुद्दा अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), 21 (जीवन का अधिकार) और 50 (न्यायपालिका का पृथक्करण) से भी संबंधित है। उन्होंने यह भी बताया कि उन्होंने देश भर के 500 जिलों का दौरा किया और उन्हें सबसे आम प्रतिक्रिया यह मिली है कि ज़मीन विवादों के निपटारे के संबंध में कुछ किया जाना चाहिए।
उन्होंने खंडपीठ से कहा,
"जौनपुर में एक मामला 1985 से चकबंदी अधिकारी (एकत्रीकरण अधिकारी) के समक्ष लंबित है, जिसमें यह तय किया जाना है कि कौन-सा उपहार विलेख (Gift Deed) वैध है। क्यों? क्योंकि एक पक्ष गरीब है, और दूसरा पक्ष एक राजनीतिक रूप से शक्तिशाली व्यक्ति है। [यदि] चकबंदी अधिकारी इस मामले का फैसला करता है तो उसका तबादला कर दिया जाएगा। इसलिए शक्तियों का पृथक्करण भी..."
संक्षेप में मामला
उपाध्याय ने यह PIL इस तर्क के साथ दायर की कि औपचारिक कानूनी शिक्षा और न्यायिक प्रशिक्षण के बिना राजस्व/चकबंदी अधिकारियों द्वारा जटिल ज़मीन विवादों का निपटारा मनमाना, अतार्किक और संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है। उनका दावा है कि कार्यपालिका के नियंत्रण में आने वाले सरकारी कर्मचारियों को न्यायिक कार्य सौंपना अनुच्छेद 50 (न्यायपालिका का पृथक्करण) का उल्लंघन है।
उन्होंने कहा,
"जब राज्य न्याय-निर्णयन का काम राजस्व अधिकारियों को सौंपता है—जैसे कि तहसीलदार—जो प्रशासनिक नियंत्रण, तबादलों और स्थानीय दबावों के अधीन रहते हैं तो इससे निष्पक्षता की धारणा और वास्तविकता, दोनों पर ही बुरा असर पड़ता है। वही अधिकारी जो ज़मीन के रिकॉर्ड्स का काम देखता है, वही उसी मामले में जज भी बन जाता है।"
याचिका में यह ज़ोर देकर कहा गया कि औपचारिक कानूनी शिक्षा और PCS-J जैसी ट्रेनिंग की कमी के कारण ज़मीन-संबंधी विवादों में गलत और एक-जैसी न रहने वाली (असंगत) फ़ैसले आते हैं। बदले में इससे न्यायपालिका पर बार-बार आने वाली चुनौतियों के रूप में काम का बोझ बढ़ जाता है।
उपाध्याय ने आगे 2005 के 'चंद्र भान और अन्य बनाम उप निदेशक, चकबंदी, गोरखपुर और अन्य' मामले का ज़िक्र किया। इस मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को 'मैंडेमस' (आदेश) जारी किया था कि वह ज़मीन-संबंधी विवादों के निपटारे के लिए एक अलग 'राजस्व न्यायिक सेवा कैडर' बनाए।
उल्लेखनीय है कि इस मामले में हाईकोर्ट ने यह भी कहा था कि इस सेवा के सदस्यों की नियुक्ति और योग्यता, न्यायिक सेवा के सदस्यों के बराबर होनी चाहिए। इसके अलावा, उन्हें हाईकोर्ट के नियंत्रण में राज्य न्यायिक सेवा के सदस्यों की ट्रेनिंग के स्तर के अनुरूप ही न्यायिक ट्रेनिंग दी जानी चाहिए।
दावों के अनुसार, 'चंद्र भान मामले' में जारी किया गया यह आदेश (मैंडेमस) अभी तक लागू नहीं किया गया। इसी पृष्ठभूमि में याचिकाकर्ता यह मांग कर रहा है कि राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों के बीच फ़ैसलों में एकरूपता लाने के लिए 'चंद्र भान मामले' के सिद्धांतों को पूरे देश में लागू किया जाए।
यह भी तर्क दिया गया कि सही ढंग से न्याय-निर्णयन करने के लिए फ़ैसलों के साथ-साथ उनके कारणों (तर्कों) का भी उल्लेख होना ज़रूरी है। इसके लिए ज़रूरी कानूनी सूझ-बूझ केवल औपचारिक कानूनी शिक्षा के माध्यम से ही विकसित की जा सकती है।
याचिकाकर्ता ने यह भी बताया कि जो अधिकारी कानूनी पृष्ठभूमि से नहीं आते और जो केवल सीमित समय के लिए ही न्याय-निर्णयन का काम करते हैं, उनके पास बदलते हुए कानूनी सिद्धांतों और बाध्यकारी नज़ीरों (Precedents) के बारे में खुद को अपडेट रखने के लिए न तो पर्याप्त समय होता है और न ही कोई व्यवस्थित तंत्र।
यह दावा भी किया गया कि राजस्व अधिकारियों का 'कार्यपालिका' (Executive) के अधीन होना, उन्हें सत्ताधारी दल या स्थानीय अधिकारियों के विपरीत फ़ैसले देने से रोक सकता है। याचिकाकर्ता ने आगे यह आरोप भी लगाया कि ज़मीन-संबंधी विवादों के मामलों में पूरे देश में 'संस्थागत देरी' (Institutional Delay) की एक व्यवस्था बनी हुई है।
Case Title: ASHWINI KUMAR UPADHYAY Versus UNION OF INDIA AND ORS., W.P.(C) No. 357/2026

