बच्चों के भरण-पोषण की जिम्मेदारी केवल गणित से तय नहीं हो सकती: सुप्रीम कोर्ट

Praveen Mishra

21 Aug 2026 2:16 PM IST

  • बच्चों के भरण-पोषण की जिम्मेदारी केवल गणित से तय नहीं हो सकती: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि बच्चों के भरण-पोषण की जिम्मेदारी केवल माता-पिता की आय का गणित लगाकर तय नहीं की जा सकती। पत्नी के कमाने मात्र से पति की बच्चों के प्रति भरण-पोषण की जिम्मेदारी कम नहीं हो जाती।

    जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें दो नाबालिग बेटियों के अंतरिम भरण-पोषण की राशि 60,000 रुपये से घटाकर 30,000 रुपये प्रति माह कर दी गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के आदेश को बहाल करते हुए दोनों बेटियों के लिए प्रति माह 30,000 रुपये, यानी कुल 60,000 रुपये अंतरिम भरण-पोषण के रूप में बहाल किए।

    क्या था मामला?

    अपीलकर्ता पत्नी और प्रतिवादी पति दोनों योग्य डॉक्टर हैं और वर्ष 2006 में उनका विवाह हुआ था। दोनों की दो नाबालिग बेटियां हैं। वैवाहिक विवाद के बाद पत्नी ने matrimonial home छोड़ दिया और दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के तहत भरण-पोषण की मांग की।

    फैमिली कोर्ट ने पत्नी की लगभग 1.5 लाख रुपये मासिक आय को देखते हुए उसे अंतरिम भरण-पोषण देने से इनकार किया, लेकिन दोनों बेटियों की शिक्षा, पालन-पोषण और अन्य खर्चों को ध्यान में रखते हुए प्रत्येक बेटी के लिए 30,000 रुपये प्रतिमाह निर्धारित किए।

    बाद में पति की पुनरीक्षण याचिका पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने राशि घटाकर प्रत्येक बेटी के लिए 15,000 रुपये प्रतिमाह कर दी। हाईकोर्ट ने कहा कि बेटियों के भरण-पोषण की जिम्मेदारी दोनों माता-पिता की है और पत्नी स्वयं भी कमाती है।

    सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

    सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के इस तर्क को अस्वीकार करते हुए कहा कि हाईकोर्ट ने राशि कम करने का कोई ठोस कारण नहीं दिया, सिवाय इसके कि पत्नी भी कमाती है।

    पीठ ने कहा कि “पत्नी की आय मात्र से पति की जिम्मेदारी आधी नहीं की जा सकती।” बच्चों के भरण-पोषण की जिम्मेदारी दोनों माता-पिता की होती है, लेकिन इसे केवल गणित के आधार पर बांटा नहीं जा सकता।

    कोर्ट ने यह भी कहा कि दोनों बेटियां अपनी मां के साथ रहती हैं। मां नौकरी करने के साथ-साथ उनकी दैनिक जरूरतों और परवरिश का भी ध्यान रखती हैं। कोर्ट के अनुसार, इस देखभाल को पैसों में नहीं मापा जा सकता, लेकिन यह माता-पिता का वास्तविक और महत्वपूर्ण योगदान है।

    पीठ ने पति की आय को भी ध्यान में रखा। पति के अपने खुलासे के अनुसार उसकी आय लगभग 2 लाख रुपये प्रतिमाह थी। कोर्ट ने कहा कि करीब आठ और नौ वर्ष की दो स्कूली बच्चियों के लिए 60,000 रुपये प्रतिमाह की राशि उनकी शिक्षा और पालन-पोषण को देखते हुए अधिक नहीं है।

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि फैमिली कोर्ट ने दोनों पक्षों की आय, बच्चों की जरूरतों और रिकॉर्ड पर मौजूद खर्चों को उचित रूप से देखते हुए 60,000 रुपये प्रतिमाह की राशि को न्यायसंगत और उचित माना था। इसलिए हाईकोर्ट द्वारा इसमें हस्तक्षेप करने का कोई आधार नहीं था।

    सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसका आदेश केवल अंतरिम भरण-पोषण से संबंधित है। धारा 125 CrPC के तहत मुख्य कार्यवाही अभी फैमिली कोर्ट के समक्ष लंबित है, जिसे उसके गुण-दोष के आधार पर स्वतंत्र रूप से तय किया जाएगा।

    नतीजतन, सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का आदेश रद्द कर फैमिली कोर्ट द्वारा निर्धारित 60,000 रुपये प्रतिमाह के अंतरिम भरण-पोषण को बहाल कर दिया।

    Praveen Mishra

    Praveen Mishra

    प्रवीण मिश्रा Law Graduate हैं और लाइव लॉ हिंदी से जुड़े हैं। वे सुप्रीम कोर्ट, उच्च न्यायालयों, उपभोक्ता आयोगों और अन्य न्यायिक मंचों के महत्वपूर्ण फैसलों एवं कानूनी घटनाक्रमों पर लेखन करते हैं। उनका उद्देश्य जटिल कानूनी विषयों और न्यायिक निर्णयों को सरल, सटीक और तथ्यपरक भाषा में हिंदी पाठकों तक पहुंचाना है।

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