यह सुप्रीम कोर्ट की ज़िम्मेदारी कि वह देश के लिए ज़रूरी मामलों पर जल्द फ़ैसला ले: जस्टिस के.एम. जोसेफ़ ने स्थायी संविधान पीठ बनाने का सुझाव दिया

Shahadat

15 Aug 2026 10:54 AM IST

  • यह सुप्रीम कोर्ट की ज़िम्मेदारी कि वह देश के लिए ज़रूरी मामलों पर जल्द फ़ैसला ले: जस्टिस के.एम. जोसेफ़ ने स्थायी संविधान पीठ बनाने का सुझाव दिया

    सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस के.एम. जोसेफ़ ने सुझाव दिया है कि देश के अहम मुद्दों पर फ़ैसला लेने के लिए शीर्ष अदालत में एक स्थायी और नियमित संविधान पीठ (Constitution Bench) बनाई जानी चाहिए। यह एक संस्थागत सुधार होगा।

    उन्होंने कहा,

    "मेरा हमेशा से यह मानना ​​रहा है कि सुप्रीम कोर्ट की बुनियादी ज़िम्मेदारी और भूमिका - चाहे उसे शीर्ष अदालत, संवैधानिक अदालत, उच्च अदालत या सबसे बड़ी अदालत कहा जाए - देश के लिए सबसे अहम मामलों पर तेज़ी से फ़ैसला लेना है... इसलिए मेरा विनम्र और सम्मानजनक अनुरोध है कि सुप्रीम कोर्ट में स्थायी संविधान पीठ होनी चाहिए... संस्थागत सुधार के तौर पर अदालत एक नियमित संविधान पीठ बनाने पर विचार कर सकती है।"

    जस्टिस जोसेफ़ ने यह सुझाव केरल हाई कोर्ट एडवोकेट्स एसोसिएशन (KHCAA) और कॉन्स्टिट्यूशन डिबेट क्लब द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में बोलते हुए दिया।

    जस्टिस जोसेफ़ ने अमेरिका की आज़ादी की घोषणा की 250वीं वर्षगांठ के मौके पर आयोजित कार्यक्रम में 'महाद्वीपों के पार आज़ादी: अमेरिकी आज़ादी की घोषणा और भारत के संविधान की स्थायी विरासत' विषय पर भाषण दिया।

    स्थायी संविधान पीठ बनाने का सुझाव अहम मामलों के लंबे समय से लंबित रहने की ओर इशारा करते हुए दिया गया। इनमें 2016 का वह मामला भी शामिल है, जिसमें यह सवाल उठाया गया कि क्या अदालतें दलबदल विरोधी याचिकाओं पर फ़ैसला करते समय स्पीकर को समय-सीमा तय करने का निर्देश दे सकती हैं।

    जस्टिस जोसेफ़ ने अलग-अलग राज्यों के कुछ उदाहरण दिए, जहां स्पीकर की तरफ़ से इन याचिकाओं पर फ़ैसला लेने में बहुत ज़्यादा देरी हुई।

    पूर्व जज ने इस संदर्भ में कहा,

    "हमारे देश को देखिए। हमारे देश में हो रहे दलबदल को देखिए। जो हो रहा है, उसे देखकर देश में हर किसी को हैरानी होनी चाहिए। हमें नहीं पता कि सच क्या है - हम 'गाजर और छड़ी' (लालच और दबाव) की बात सुनते हैं, हम ED के इस्तेमाल की बात सुनते हैं, हम भारी मात्रा में पैसे के लेन-देन की बात सुनते हैं। ऐसा महाराष्ट्र में हुआ, ऐसा पहले भी हुआ है। यह हमारी आँखों के सामने हो रहा है। क्या अमेरिकी क्रांतिकारी, जिन्होंने आज़ादी के लिए लड़ाई लड़ी और जीती, चुप रहते? अगर वे अपनी मातृभूमि के साथ ऐसा होते देखते? हम इसे होने देते हैं, कुछ न्यूज़ फ़्लैश या न्यूज़ चर्चाओं में इस पर ध्यान देते हैं।"

    जस्टिस जोसेफ ने इस विषय पर सुप्रीम कोर्ट के दो और फैसलों का ज़िक्र किया - उत्तर प्रदेश में दल-बदल के मामले में 'राजेंद्र सिंह राणा बनाम स्वामी प्रसाद मौर्य' [2007] और हाल ही में 'पाडी कौशिक रेड्डी बनाम तेलंगाना राज्य' का फैसला, जिसमें स्पीकर को कांग्रेस पार्टी में शामिल होने वाले BRS विधायकों की अयोग्यता पर फैसला लेने के लिए 3 महीने का समय दिया गया।

    अपने भाषण में पूर्व जज ने अमेरिकी संवैधानिक इतिहास की भी विस्तार से जानकारी दी, जिसकी शुरुआत देश के उपनिवेश बनने से हुई। उन्होंने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि कैसे अमेरिकियों और भारतीयों ने ब्रिटिश शासन और अन्यायपूर्ण कानूनों का अलग-अलग तरीकों से विरोध किया और आज़ादी पाने के लिए अलग-अलग रास्ते अपनाए।

    जस्टिस जोसेफ ने लोकतांत्रिक देश में अन्याय के खिलाफ विरोध करने के अधिकार और ज़रूरत पर भी बात की:

    "अभी भारत में विरोध-प्रदर्शन हो रहे हैं। मैं जो बातें आपको बताऊंगा, उनसे आपको यह एहसास होगा कि जब आप पर लगातार अन्याय होता रहे और आप बिना कोई प्रतिक्रिया दिए चुपचाप सहते रहें तो इससे देश सच में लोकतांत्रिक नहीं कहलाता। विरोध करना, असहमति जताना और मज़बूती से अपनी राय रखना लोकतंत्र का मूल आधार है और अमेरिकियों ने यही करके दिखाया है।"

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