FIR रद्द करने की याचिका को मेरिट पर सुनना जरूरी, पुलिस को निर्देश देकर निपटाना गलत: सुप्रीम कोर्ट
Praveen Mishra
19 March 2026 3:55 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि एफआईआर रद्द करने (quashing) की याचिकाओं को हाईकोर्ट द्वारा मेरिट पर तय किया जाना अनिवार्य है और केवल पुलिस को अर्नेश कुमार बनाम बिहार राज्य (2014) के दिशा-निर्देशों का पालन करने का निर्देश देकर याचिका का निस्तारण करना न्यायसंगत नहीं है।
जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की खंडपीठ ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें बिना मामले के तथ्यों और कानून का परीक्षण किए, केवल पुलिस को गिरफ्तारी संबंधी दिशानिर्देशों का पालन करने को कहकर याचिका निपटा दी गई थी।
खंडपीठ ने कहा कि जब कोई याचिका अनुच्छेद 226, दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 482 या भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 528 के तहत दायर की जाती है, तो हाईकोर्ट का कर्तव्य है कि वह उसे मेरिट के आधार पर स्वीकार या अस्वीकार करे। केवल यह निर्देश देना कि पुलिस अर्नेश कुमार के दिशा-निर्देशों का पालन करे, याचिका के मूल प्रश्न का समाधान नहीं करता।
यह मामला गाजियाबाद के डुंडाहेरा गांव स्थित एक सार्वजनिक कब्रिस्तान (कब्रिस्तान) तक पहुंच को लेकर उत्पन्न विवाद से जुड़ा था, जिसके चलते एक एफआईआर दर्ज की गई थी। आरोपियों ने इस एफआईआर को रद्द कराने के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट का रुख किया था। हालांकि, हाईकोर्ट ने मामले के गुण-दोष पर विचार किए बिना ही याचिका का निस्तारण कर दिया, जिसके खिलाफ आरोपियों ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट को उपलब्ध सामग्री और लागू कानून के आधार पर यह तय करना चाहिए था कि एफआईआर रद्द की जानी चाहिए या नहीं। अदालत ने इस संदर्भ में अपने पूर्व निर्णय प्रदीप कुमार केसारवानी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2025) का हवाला दिया, जिसमें एफआईआर रद्द करने की याचिकाओं पर विचार करते समय अपनाए जाने वाले चार चरणों का परीक्षण निर्धारित किया गया है।
इनमें यह देखा जाना आवश्यक है कि आरोपी द्वारा प्रस्तुत सामग्री विश्वसनीय है या नहीं, क्या वह आरोपों को पूरी तरह खारिज करती है, क्या उसका खंडन संभव है, और क्या मुकदमा जारी रखना न्याय प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।
खंडपीठ ने पाया कि हाईकोर्ट ने इन पहलुओं पर विचार किए बिना याचिका का यांत्रिक तरीके से निस्तारण किया, जो विधिसम्मत नहीं है।
इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए मामले को पुनः सुनवाई के लिए हाईकोर्ट को वापस भेज दिया और निर्देश दिया कि याचिका पर मेरिट के आधार पर नया निर्णय लिया जाए।
इस प्रकार, सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि एफआईआर रद्द करने की याचिकाओं को केवल औपचारिक रूप से नहीं, बल्कि गंभीरता से और कानूनी परीक्षण के आधार पर तय किया जाना चाहिए।

