राजनीतिक दलों के अनियंत्रित चुनावी खर्च पर रोक की मांग: सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र व चुनाव आयोग को जारी किया नोटिस

Praveen Mishra

26 Feb 2026 6:35 PM IST

  • राजनीतिक दलों के अनियंत्रित चुनावी खर्च पर रोक की मांग: सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र व चुनाव आयोग को जारी किया नोटिस

    सुप्रीम कोर्ट ने आज राजनीतिक दलों द्वारा अनियंत्रित चुनावी खर्च के मुद्दे को उठाने वाली जनहित याचिका (PIL) पर नोटिस जारी किया। यह याचिका कॉमन कॉज और सेंटर फॉर पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन द्वारा दायर की गई है।

    चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की खंडपीठ ने यह आदेश पारित किया।

    याचिकाकर्ताओं की ओर से एडवोकेट प्रशांत भूषण ने प्रारंभ में कहा कि वर्तमान कानून चुनाव के दौरान उम्मीदवारों द्वारा धन के उपयोग पर सीमा निर्धारित करता है, लेकिन इन सीमाओं का प्रभावी पालन नहीं होता। उन्होंने बताया कि यदि कोई व्यक्ति उम्मीदवार की ओर से खर्च करता है तो उसे उम्मीदवार के खर्च में जोड़ा जाता है, लेकिन राजनीतिक दल द्वारा किए गए खर्च को उम्मीदवार के चुनावी खर्च में नहीं गिना जाता।

    उन्होंने यह भी कहा कि राजनीतिक दलों के खर्च पर कोई स्पष्ट सीमा निर्धारित नहीं है।

    अदालत की टिप्पणी

    सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति बागची ने पूछा कि ऐसे खर्च को नियंत्रित करना व्यवहारिक रूप से कितना संभव है, जब उम्मीदवार के मित्र या समर्थक उसके पक्ष में खर्च कर सकते हैं और इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार के तहत उचित ठहरा सकते हैं।

    उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि यदि किसी उम्मीदवार के समर्थन में मित्र या बाहरी समूह धन खर्च करें, तो उस पर सीमा कैसे लागू की जा सकती है। यदि सरकार अधिकतम सीमा तय भी करे, तो इसे अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उल्लंघन बताकर चुनौती दी जा सकती है।

    इस पर प्रशांत भूषण ने चुनावी बांड मामले का हवाला देते हुए कहा कि अनियंत्रित चुनावी खर्च लोकतंत्र के लिए गंभीर समस्या बन चुका है और इसे रोकना आवश्यक है। इसके बाद अदालत ने नोटिस जारी कर दिया।

    याचिका में क्या कहा गया

    याचिका में संविधान के अनुच्छेद 14 और 19(1)(a) के तहत मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन तथा स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने की मांग की गई है। इसमें कहा गया है कि चुनावों में धनबल का बढ़ता प्रभाव चुनावी निष्पक्षता, राजनीतिक समान अवसर और संसदीय लोकतंत्र के प्रतिनिधिक स्वरूप को कमजोर कर रहा है।

    याचिका में जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 77(1) और चुनाव आचरण नियमों के नियम 90 का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि उम्मीदवारों के खर्च पर तो सीमा है, लेकिन राजनीतिक दलों के खर्च पर कोई सीमा नहीं है।

    इसके अतिरिक्त कहा गया है कि विधि आयोग सहित कई विशेषज्ञ संस्थाओं ने इस कानूनी शून्य की ओर ध्यान दिलाया है और राजनीतिक दलों के खर्च को विनियमित करने या उसकी सीमा तय करने की सिफारिश की है, लेकिन अब तक कोई ठोस विधायी या कार्यकारी कदम नहीं उठाया गया।

    अंतरराष्ट्रीय उदाहरण और अन्य तर्क

    याचिका में यह भी कहा गया है कि अन्य देशों में राजनीतिक दलों के चुनावी खर्च को नियंत्रित करना संभव और आवश्यक माना गया है। उदाहरण के लिए, यूनाइटेड किंगडम में राजनीतिक दलों के अभियान खर्च पर कानूनी सीमा तय है और उल्लंघन पर दंडात्मक कार्रवाई का प्रावधान है।

    याचिकाकर्ताओं का यह भी कहना है कि अनियंत्रित खर्च के कारण भारतीय चुनावों में “राष्ट्रपति शैली” (presidentialisation) का प्रभाव बढ़ गया है, जिसमें विशाल धनराशि के जरिए एक ही नेता को केंद्र में रखकर अभियान चलाया जाता है। यह संसदीय लोकतंत्र के संवैधानिक ढांचे के विपरीत है, जो वेस्टमिंस्टर मॉडल पर आधारित है।

    इस प्रकार याचिका में राजनीतिक दलों के चुनावी खर्च को नियंत्रित करने के लिए अदालत के हस्तक्षेप की मांग की गई है।

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