सुप्रीम कोर्ट ने हल्द्वानी दंगों के UAPA मामले में 2 आरोपियों की डिफ़ॉल्ट ज़मानत रद्द की, जांच पर हाईकोर्ट की प्रतिकूल टिप्पणियों को नामंज़ूर किया
Shahadat
6 May 2026 2:45 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में 2024 के हल्द्वानी दंगों से जुड़े मामले में गैर-कानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) के तहत दो आरोपियों को दी गई डिफ़ॉल्ट ज़मानत रद्द की।
उत्तराखंड राज्य द्वारा दायर अपीलों को स्वीकार करते हुए कोर्ट ने आरोपी जावेद सिद्दीकी और अरशद अयूब को दी गई ज़मानत रद्द की और उन्हें दो हफ़्तों के भीतर आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया।
कोर्ट ने पाया कि आरोपी जांच पूरी करने के लिए समय बढ़ाने और ज़मानत अर्जी खारिज करने वाले ट्रायल कोर्ट के आदेशों को चुनौती देने में तत्पर नहीं थे। चूंकि जांच बढ़ाए गए समय के भीतर ही पूरी हो गई, इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने डिफ़ॉल्ट ज़मानत देने के लिए हाई कोर्ट की आलोचना की।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ ने आगे टिप्पणी की कि जांच पूरी करने में लगे समय को लेकर जांच अधिकारी के आचरण पर सवाल उठाना हाईकोर्ट का गलत कदम था।
"रिकॉर्ड का अवलोकन करने के बाद हम पाते हैं कि जांच अधिकारी द्वारा 90 दिनों की अवधि के भीतर जांच पूरी न कर पाने के संबंध में उनके आचरण पर सवाल उठाकर हाईकोर्ट ने पूरी तरह से गलती की... हमारी राय में हाईकोर्ट का यह कहना बिल्कुल ही अनुचित था कि जांच एजेंसी ने उचित गति से जांच आगे नहीं बढ़ाई या उसने सुस्ती से काम किया...
इसके अलावा, हाईकोर्ट इस महत्वपूर्ण तथ्य पर ध्यान देने में विफल रहा कि आरोपी-प्रतिवादियों ने समय बढ़ाने और ज़मानत खारिज करने के आदेशों को चुनौती देने के लिए तुरंत हाईकोर्ट का रुख नहीं किया, बल्कि अपील दायर करने से पहले सितंबर 2024 तक इंतज़ार किया। इस बात पर कोई विवाद नहीं है कि अपील दायर होने से काफी पहले ही जांच पूरी हो चुकी थी और आरोप पत्र (चार्जशीट) दायर किया जा चुका था।"
कोर्ट ने यह भी पाया कि FIR बड़े पैमाने पर आगज़नी, दंगा और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के संबंध में दर्ज की गई, जिसमें पुलिस थाने की इमारत भी शामिल थी; इस मामले में कई आरोपियों पर कथित तौर पर पेट्रोल बम आदि का इस्तेमाल करने का आरोप लगाया गया। अपराध की गंभीरता और आरोपियों व गवाहों की बड़ी संख्या के कारण सामने आई गंभीर चुनौतियों के बावजूद, जांच पूरी तत्परता के साथ आगे बढ़ी।
यह मामला 2024 में हल्द्वानी में हुए दंगों के संबंध में दर्ज की गई FIR से जुड़ा है। यह FIR IPC की धारा 147, 148, 149, 307, 395, 323, 332, 341, 342, 353, 427, 436 और 120-B के तहत, साथ ही सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान से बचाने वाले अधिनियम, 1984 की धारा 3 और 4 के तहत, आपराधिक कानून संशोधन अधिनियम, 1932 की धारा 7 के तहत, शस्त्र अधिनियम, 1959 की धारा 3/25, 4/25 और 7/25 के तहत, और UAPA की धारा 15 और 16 के तहत दर्ज की गई।
आरोपियों को 9 फरवरी, 2024 को गिरफ्तार किया गया। गिरफ्तारी की तारीख से 90 दिन की अवधि समाप्त होने से पहले जांच एजेंसी ने जांच पूरी करने के लिए समय बढ़ाने का आवेदन दिया। 10 मई, 2024 को ट्रायल कोर्ट ने एक विस्तृत आदेश पारित करते हुए जांच पूरी करने की समय सीमा 28 दिनों के लिए बढ़ा दी। इसके बाद आरोपियों ने 90 दिनों के भीतर जांच पूरी न होने के कारण 'डिफॉल्ट बेल' (जमानत) की मांग करते हुए अदालत में अर्जी दी, लेकिन उनकी अर्जी खारिज कर दी गई।
बाद में जांच पूरी करने की समय सीमा 6 जून और 1 जुलाई, 2024 को फिर से बढ़ाई गई। आखिरकार, 7 जुलाई, 2024 को (बढ़ाई गई अवधि समाप्त होने से पहले) चार्जशीट दाखिल की गई।
समय बढ़ाने और जमानत खारिज करने वाले ट्रायल कोर्ट के आदेशों के खिलाफ आरोपियों ने हाईकोर्ट में अपील दायर की। हाईकोर्ट ने उनकी अपील स्वीकार की और जांच अधिकारी की ओर से हुई "लापरवाही" का उल्लेख किया। कोर्ट ने टिप्पणी की कि जांच बहुत धीमी गति से आगे बढ़ी, जबकि आरोपी न्यायिक हिरासत में थे। कोर्ट ने यह भी कहा कि 3 महीने की अवधि में केवल 8 सरकारी गवाहों और 4 आम गवाहों के बयान ही दर्ज किए जा सके।
हाईकोर्ट के फैसले से असंतुष्ट होकर राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में यह अपील दायर की। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि हाईकोर्ट ने कानून और तथ्यों, दोनों ही मामलों में गलती की है; क्योंकि आरोपी की गिरफ्तारी के बाद के 3 महीनों की अवधि में ही 65 गवाहों के बयान दर्ज किए जा चुके थे।
कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा,
"अतः, इसमें कोई संदेह नहीं है कि इस मामले में जांच पूरी तेज़ी से आगे बढ़ रही थी—एक ऐसा मामला जिसमें अपराध की गंभीरता और आरोपियों व गवाहों की बड़ी संख्या को देखते हुए जांच एजेंसी के सामने गंभीर चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं।"
तदनुसार, अपील स्वीकार की गई और हाईकोर्ट का आदेश रद्द किया गया।
Case Title: STATE OF UTTARAKHAND v. JAVED SIDDIQUI & ANR., SLP(Crl.) No(s). 908 of 2026

