सुप्रीम कोर्ट ने NALSA से कहा- वे परमानेंट लोक अदालत के सदस्यों के लिए बेहतर पे-स्केल की मांग वाली याचिका पर विचार करें

  • सुप्रीम कोर्ट ने NALSA से कहा- वे परमानेंट लोक अदालत के सदस्यों के लिए बेहतर पे-स्केल की मांग वाली याचिका पर विचार करें

    परमानेंट लोक अदालत के सदस्यों के लिए बेहतर पे-स्केल की मांग वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्य कांत ने कहा कि परमानेंट लोक अदालत के सदस्य स्वेच्छा से सेवा देते हैं और वे दूसरों के बराबर वेतन की मांग नहीं कर सकते।

    CJI ने कहा,

    "ये कानूनी सहायता योजना का हिस्सा हैं। अगर आपको लगता है कि यह काम का नहीं है तो कृपया इसे छोड़ दें। यह एक तरह की स्वैच्छिक सेवा है। इसमें रिटायर्ड जज और वकील अपनी सेवाएं देते हैं। ये ऐसी सेवाएं नहीं हैं, जिनमें सेवा की शर्तें, बराबरी या समानता जैसी चीजें लागू होंगी। [कानूनी सेवा] प्राधिकरणों के पास सीमित फंड होता है, उन्हें अपने फंड को सही तरीके से बांटना होता है और देखना होता है कि प्राथमिकताएं क्या हैं... अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग कानूनों के तहत किस तरह की वित्तीय सहायता दी जाती है, यह अलग-अलग होता है।"

    उन्होंने आगे कहा,

    "अगर मैं उनकी मदद करना भी चाहूं तो शायद ऐसी स्थिति में न होऊं क्योंकि फंड के सामान्य आवंटन में संरचनात्मक बदलाव की जरूरत है। प्रशासनिक स्तर पर भी कई चुनौतियां हैं जिन्हें हल करने की जरूरत है।"

    CJI सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच 14 परमानेंट लोक अदालत सदस्यों द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिकाकर्ता व्यवस्थित, उचित और सम्मानजनक पे-स्केल की मांग कर रहे थे - जो बेहतर होगा कि मासिक आधार पर हो - और जो परमानेंट लोक अदालत के चेयरमैन और अन्य न्यायिक मंचों के बराबर हो।

    याचिकाकर्ताओं की ओर से सीनियर एडवोकेट करुणा नंदी ने बताया कि पहले, परमानेंट लोक अदालत के सदस्य केवल सार्वजनिक उपयोगिता से जुड़े मामलों को देखते थे। लेकिन अब, इसका दायरा बैंकिंग, NBFC, हाउसिंग, शिक्षा आदि तक बढ़ गया है। उन्होंने कहा कि आर्थिक और विषय-संबंधी अधिकार क्षेत्र में काफी विस्तार हुआ है।

    नंदी ने जोर देकर कहा,

    "पिछले साल, उन्होंने 660 करोड़ रुपये मूल्य के मामलों का निपटारा किया। वे जो काम कर रहे हैं, वह बहुत महत्वपूर्ण है।"

    उन्होंने आगे कहा कि इस बारे में कई बार बात रखी गई और दो मामले हाईकोर्ट तक भी ले जाए गए, लेकिन मामलों को बार-बार संबंधित प्राधिकरणों के पास ही वापस भेज दिया जाता है।

    कंज्यूमर फोरम के सदस्यों के पे-स्केल और सेवा शर्तों से जुड़े स्वतः संज्ञान (suo motu) वाले मामले का जिक्र करते हुए सीनियर वकील ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता बराबरी की मांग नहीं कर रहे थे। बल्कि, वे अपने लिए कुछ बेहतर चाह रहे थे।

    नंदी ने ज़ोर देकर कहा,

    "इन लोगों को ज़िला स्तर पर लगातार काम करना पड़ता है और वे कोई दूसरा काम नहीं कर सकते। हर बैठक के लिए 2,500 रुपये दिए जाते हैं। उन्हें लगभग 25,000-50,000 रुपये मिलते हैं, जबकि ज़िला फ़ोरम में इसी पद पर काम करने वाले सदस्य को इस कोर्ट के आदेश के बाद 1.6 लाख रुपये मिलते हैं।"

    आखिरकार, बेंच ने निर्देश दिया कि रिट याचिका की एक कॉपी रजिस्ट्री द्वारा NALSA के सदस्य सचिव को भेजी जाए, ताकि NALSA की गवर्निंग काउंसिल उस पर एक आवेदन के तौर पर विचार कर सके। कोर्ट ने अथॉरिटी को 4 महीने का समय देते हुए कहा, "अगर NALSA इस मामले में जल्द से जल्द कोई उचित फ़ैसला ले, तो यह बहुत अच्छा होगा।"

    Case Title : ROONAM KAUSHIK AND ORS. Versus UNION OF INDIA AND ANR.

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