झारखंड हाईकोर्ट में आपराधिक अपीलों का 'चौंकाने वाला पेंडिंग मामला': सुप्रीम कोर्ट ने हत्या के मामले में 44 साल की देरी पर चिंता जताई
Shahadat
22 Aug 2026 9:49 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड हाईकोर्ट के सामने आपराधिक अपीलों के "चौंकाने वाले पेंडिंग मामलों" की ओर ध्यान दिलाया, क्योंकि 1981 की घटना से जुड़े हत्या के एक मामले में न्यायिक प्रक्रिया लगभग 44 साल तक चलती रही।
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के विनोद चंद्रन की बेंच ने साइमन सोरेन की अपील पर सुनवाई करते हुए यह बात कही। सोरेन को झारखंड हाईकोर्ट ने 2024 के फैसले में 1981 के दोहरे हत्याकांड मामले में दोषी ठहराया था। बेंच ने गौर किया कि ट्रायल में ही 22 साल लग गए, जबकि सजा के खिलाफ अपील हाई कोर्ट में अगले 22 साल तक पेंडिंग रही। बेंच ने कहा कि यह मामला "न्यायिक प्रणाली की विफलता" को दिखाता है।
कोर्ट ने पहले भी इस देरी को "बहुत परेशान करने वाला" बताया।
यह मामला 1981 में हुए दोहरे हत्याकांड से जुड़ा था। 1991 में आरोप तय किए गए और ट्रायल कोर्ट ने आखिरकार 2002 में आरोपी को दोषी ठहराया। सजा को चुनौती देने वाली आपराधिक अपील पर झारखंड हाईकोर्ट ने 2024 में फैसला सुनाया।
सुप्रीम कोर्ट ने गौर किया कि इस बहुत ज़्यादा देरी के कारण आपराधिक कार्यवाही दशकों तक चलती रही। मामले में शुरू में छह आरोपी थे, जिनमें से दो की मौत आरोप तय होने से पहले ही हो गई और दोषी ठहराए गए चार आरोपियों में से तीन की मौत अपील पेंडिंग रहने के दौरान हो गई। साइमन सोरेन, जो अब लगभग 70 साल के हैं, अकेले जीवित आरोपी बचे हैं।
झारखंड हाईकोर्ट में पेंडिंग मामलों की चौंकाने वाली संख्या
पिछली सुनवाई में कोर्ट ने झारखंड हाईकोर्ट से विस्तृत रिपोर्ट दाखिल करने को कहा कि ट्रायल और आपराधिक अपील में लगभग 45 साल क्यों लगे। इसके जवाब में झारखंड हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार ने एक हलफनामा दाखिल किया।
हलफनामे को देखने के बाद कोर्ट ने कहा कि इससे "आपराधिक अपीलों के चौंकाने वाले पेंडिंग मामलों" का पता चलता है। हलफनामे के अनुसार, ट्रायल में देरी की वजह यह बताई गई कि आरोपी 6 साल तक फरार थे। हालांकि, कोर्ट ने सवाल उठाया कि जब 1991 में ही आरोप तय हो गए तो ट्रायल पूरा होने में लगे 12 सालों के बारे में कोई स्पष्टीकरण क्यों नहीं दिया गया। डिस्ट्रिक्ट और सेशन जज की रिपोर्ट से यह भी पता चला है कि 1991 के बाद से 11 सालों में यह केस एक ट्रायल कोर्ट से दूसरे कोर्ट में पांच बार ट्रांसफर किया गया।
क्रिमिनल अपील के पेंडिंग होने पर चिंता जताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता को भारत सरकार (यूनियन ऑफ़ इंडिया) को एक पक्ष के तौर पर शामिल करने की इजाज़त दी।
आगे कहा गया,
"हाईकोर्ट की रिपोर्ट में बताई गई क्रिमिनल अपील के पेंडिंग होने की बात से हमें चिंता थी, इसलिए हमने इस मामले में याचिकाकर्ता को भारत सरकार को पक्ष बनाने की इजाज़त देना सही समझा। हाईकोर्ट की ओर से पेश होने वाले एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड, रजिस्ट्रार जनरल द्वारा दाखिल अनुपालन शपथ-पत्र (एफिडेविट ऑफ़ कंप्लायंस) की कॉपी अटॉर्नी जनरल/सॉलिसिटर जनरल के ऑफिस को सौंपेंगे।"
सुप्रीम कोर्ट ने बुजुर्ग दोषी को रिहा करने का आदेश दिया
दोहरे हत्याकांड की गंभीरता के बावजूद, कोर्ट ने कहा कि वह पिछले 45 सालों में आरोपी द्वारा झेली गई मुश्किलों को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता।
सोरेन ने कस्टडी में दो साल, चार महीने और 12 दिन बिताए। कोर्ट ने उनकी उम्र और कई बीमारियों के साथ-साथ राज्य के उस शपथ-पत्र पर भी ध्यान दिया, जिसमें कहा गया कि कस्टडी के दौरान उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया।
इसलिए बेंच ने उनकी सज़ा पर रोक लगाई और उन्हें तुरंत रिहा करने का निर्देश दिया, बशर्ते वे पर्सनल श्योरिटी (व्यक्तिगत ज़मानत) दें और ज़मानत पर रहने के दौरान कोई अपराध न करने का वचन दें।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि मूल केस रिकॉर्ड फिजिकल और डिजिटल दोनों रूपों में मंगाए जाएं। रिकॉर्ड चार हफ़्तों के भीतर भेजे जाने हैं, जिसके बाद संबंधित वकीलों को डिजिटल रिकॉर्ड उपलब्ध कराए जाएंगे।
क्रिमिनल अपील के पेंडिंग होने के मुद्दे को देखते हुए कोर्ट ने याचिकाकर्ता को कार्यवाही में भारत सरकार को पक्ष बनाने की इजाज़त दी और निर्देश दिया कि हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल का शपथ-पत्र अटॉर्नी जनरल/सॉलिसिटर जनरल के ऑफिस को सौंपा जाए।
मामले की अगली सुनवाई 18 सितंबर, 2026 को तय की गई।
इस मामले ने लंबे समय तक चलने वाले क्रिमिनल मुकदमों के नतीजों पर न्यायिक ध्यान आकर्षित किया, जहां 1981 के दोहरे हत्याकांड के मामले को ट्रायल और अपील के चरणों से गुज़रने में लगभग चार दशक लग गए।
कोर्ट ने कहा,
"दोहरे हत्याकांड जैसे भयानक अपराध के बावजूद, हम पिछले 45 सालों में आरोपी द्वारा झेली गई तकलीफ़ों को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते। खासकर उसकी मेडिकल हालत और राज्य के उस हलफ़नामे को ध्यान में रखते हुए कि याचिकाकर्ता अस्पताल में भर्ती है (भले ही वह हिरासत में हो), हम सज़ा पर रोक लगाते हैं और आदेश देते हैं कि याचिकाकर्ता को तुरंत रिहा किया जाए, बशर्ते वह ज़मानत पर रहने के दौरान कोई अपराध न करे और अपनी निजी ज़मानत दे।"
कोर्ट ने हाईकोर्ट और ट्रायल कोर्ट से ओरिजिनल रिकॉर्ड (फिजिकल और डिजिटल दोनों रूपों में) मँगवाए। रिकॉर्ड मिलने के बाद कोर्ट ने निर्देश दिया कि उनकी सॉफ्ट कॉपी संबंधित पक्षों को उपलब्ध कराई जाए।
अब इस मामले की सुनवाई 18 सितंबर को होगी।
Case Details: SIMON SOREN v THE STATE OF JHARKHAND|SPECIAL LEAVE PETITION (CRIMINAL) Diary No(s).9856/2026


