Sabarimala Reference | सामाजिक सुधार के नाम पर धर्म को खोखला नहीं किया जा सकता: सुनवाई के दौरान बोला सुप्रीम कोर्ट
Shahadat
15 April 2026 7:00 PM IST

सबरीमाला मामले की सुनवाई के दौरान, सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को मौखिक रूप से टिप्पणी की कि सामाजिक कल्याण और सुधार के नाम पर किसी धर्म को खोखला नहीं किया जा सकता।
इस मामले की सुनवाई कर रही 9 जजों की बेंच की सदस्य जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने यह टिप्पणी तब की, जब वह सीनियर एडवोकेट डॉ. अभिषेक मनु सिंघवी की दलीलें सुन रही थीं। ये दलीलें अनुच्छेद 25(2)(b) और अनुच्छेद 26(b) के तहत किसी धार्मिक संप्रदाय को अपने मामलों का प्रबंधन करने के अधिकार के बीच के आपसी संबंध से जुड़ी थीं।
अनुच्छेद 25(2)(b) राज्य को सामाजिक कल्याण और सुधार के लिए कानून बनाने, या सार्वजनिक प्रकृति वाले हिंदू धार्मिक संस्थानों को हिंदुओं के सभी वर्गों और संप्रदायों के लिए खोलने की अनुमति देता है।
त्रावणकोर देवस्वम बोर्ड (TDB) की ओर से पेश होते हुए सिंघवी ने तर्क दिया कि, जहां एक ओर, अनुच्छेद 25(2)(b) के तहत हिंदुओं के सभी संप्रदाय सार्वजनिक प्रकृति वाले किसी हिंदू धार्मिक संस्थान में प्रवेश की मांग कर सकते हैं, वहीं दूसरी ओर, अनुच्छेद 26(b) के तहत उस धार्मिक संप्रदाय को यह अधिकार होगा कि वह यह तय करे कि आंतरिक अनुष्ठान किस प्रकार किए जाएंगे। उन्होंने अनुच्छेद 25(2)(b) और अनुच्छेद 26(b) की सामंजस्यपूर्ण व्याख्या किए जाने की वकालत की।
सिंघवी ने 'सरदार सैयदना' फैसले (जिसमें 'बॉम्बे प्रिवेंशन ऑफ़ एक्स-कम्युनिकेशन एक्ट' रद्द किया गया) में की गई उस टिप्पणी का हवाला दिया, जिसमें कहा गया कि अनुच्छेद 25(2)(b) का उद्देश्य "किसी धर्म को सुधार के नाम पर पूरी तरह से समाप्त कर देना या उसकी पहचान मिटा देना" नहीं था।
इसके बाद जस्टिस बागची ने पूछा कि क्या सिंघवी यह तर्क दे रहे हैं कि अनुच्छेद 25(2)(b) के तहत बनाए गए किसी कानून द्वारा धर्म की 'आवश्यक प्रथाओं' (Essential Practices) को नहीं छुआ जाना चाहिए। सिंघवी ने जवाब दिया कि मौजूदा 9 जजों की बेंच को इस मामले की पेचीदगियों को सुलझाना होगा, लेकिन ऐसा करते समय उन्हें 'आवश्यकता के सिद्धांत' (Essentiality Doctrine) को इसमें हावी नहीं होने देना चाहिए।
बता दें, TDB की ओर से सिंघवी 'आवश्यक धार्मिक प्रथाओं के सिद्धांत' का भी विरोध कर रहे हैं। उनका तर्क है कि संवैधानिक सुरक्षा केवल 'आवश्यक धार्मिक प्रथाओं' तक ही सीमित नहीं हो सकती, और यह तय करना अदालतों का काम नहीं है कि कोई धार्मिक प्रथा आवश्यक है या नहीं।
जस्टिस सुंदरेश ने पूछा कि आर्टिकल 25(2)(b) में "सामाजिक सुधार" शब्द का इस्तेमाल क्यों किया गया, जबकि आर्टिकल 25 की शुरुआत में "सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता या स्वास्थ्य" शब्दों का इस्तेमाल किया गया।
सिंघवी ने जवाब दिया कि ऐसा शायद कुछ ऐसी प्रथाओं से निपटने के लिए किया गया हो, जिन्हें किसी भी निष्पक्ष मापदंड पर सही नहीं ठहराया जा सकता। उन्होंने सुझाव दिया कि पर्सनल लॉ को नियंत्रित करने वाले कानूनों को आर्टिकल 25(2)(b) के दायरे में सामाजिक सुधार माना जा सकता है।
जस्टिस सुंदरेश भी इससे सहमत हुए और कहा कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम सामाजिक सुधार का एक उदाहरण हो सकता है।
इसी मौके पर जस्टिस नागरत्ना ने टिप्पणी की,
"सामाजिक कल्याण और सुधार के नाम पर आप धर्म को खोखला नहीं कर सकते।"
सिंघवी ने दलील दी कि इसी वजह से सरदार सैयदना मामले में एक्स-कम्युनिकेशन एक्ट रद्द कर दिया गया था।
सिंघवी की दलील थी कि आर्टिकल 25(2)(b) को इस तरह से नहीं पढ़ा जाना चाहिए कि उससे आर्टिकल 25(1) के तहत धर्म की स्वतंत्रता के मूल अधिकार में कोई कमी आए। उनके अनुसार, आर्टिकल 25(2) धर्म की स्वतंत्रता पर कोई रोक नहीं है, जैसा कि आर्टिकल 25(1) में सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के आधारों पर बताया गया।
उन्होंने निम्नलिखित तर्क पेश किए:
(1) आर्टिकल 25(2) उसी अर्थ में कोई अपवाद या कटौती का आधार नहीं है, जिस अर्थ में आर्टिकल 25(1) में आधार दिए गए।
(2) आर्टिकल 25(2) को किसी निषेधात्मक या प्रतिबंधात्मक खंड के रूप में नहीं, बल्कि एक स्पष्टीकरण और सक्षम बनाने वाले खंड के रूप में तैयार किया गया, ताकि राज्य को धार्मिक प्रथाओं के विभिन्न सहायक पहलुओं और/या सामाजिक कल्याण और सुधारों से संबंधित कानून बनाने की अनुमति और शक्ति मिल सके।
(3) हालांकि, आर्टिकल 25(2) के तहत दोनों खंडों (a) और (b) में दी गई शक्तियां निस्संदेह इतनी व्यापक हैं कि वे ऊपर बताए गए सहायक और गौण कार्यों या सामाजिक सुधारों से संबंधित कानून बनाने में सक्षम हैं, लेकिन इसे इस तरह से नहीं पढ़ा जा सकता कि यह आर्टिकल 25(1) के तहत मूल अधिकार को पूरी तरह से खत्म कर दे।
(4) आर्टिकल 25(2)(b) की व्याख्या इस तरह से नहीं की जानी चाहिए (और न ही की जानी चाहिए) कि वह आर्टिकल 25(1) के तहत प्राथमिक अधिकार को पूरी तरह से नष्ट या समाप्त कर दे। अगर इसकी व्याख्या किसी और तरह से की जाए तो इसका मतलब यह होगा कि सामाजिक सुधार के कथित आधार पर, अनुच्छेद 25(1) के तहत मुख्य धार्मिक अधिकार को खत्म कर दिया जाए—बिना किसी ऐसे आदेश के जो "सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य, और इस भाग के अन्य प्रावधानों" जैसे मानकों से उत्पन्न होता हो। सामाजिक कल्याण और सुधार के आधार पर किसी अधिकार में दखल देने और उसे कम करने का ऐसा स्वतंत्र और पूर्ण अधिकार, अनुच्छेद 25(1) को पूरी तरह से ही खत्म कर देगा। शिरूर मठ या देवरू—इनमें से किसी भी बड़े फ़ैसले की व्याख्या इस तरह से नहीं की जा सकती, और न ही की जानी चाहिए, जिससे कोई और ही अर्थ निकलता हो।
ये दलीलें चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस बी.वी. नागरत्ना, जस्टिस एम.एम. सुंदरेश, जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, जस्टिस अरविंद कुमार, जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले, जस्टिस आर. महादेवन और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की पीठ के समक्ष चल रही हैं।
प्रस्तुत मामले की सुनवाई का आज (बुधवार) चौथा दिन है।

