दक्षिण भारत में महिलाएं आस्था के तहत मासिक धर्म के दौरान मंदिर जाने से बचती हैं: सीनियर एडवोकेट एम.आर. वेंकटेश
Praveen Mishra
17 April 2026 4:11 PM IST

सुप्रीम कोर्ट में सबरीमाला मामले की सुनवाई के पांचवें दिन महिलाओं के मंदिर प्रवेश और धार्मिक प्रथाओं को लेकर अहम बहस हुई। आत्मन ट्रस्ट की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट एम.आर. वेंकटेश ने दलील दी कि मासिक धर्म के दौरान महिलाओं का मंदिर या पूजा कक्ष में प्रवेश न करना भेदभाव नहीं, बल्कि स्वेच्छा से अपनाया गया धार्मिक अनुशासन और आस्था है।
उन्होंने कहा कि दक्षिण भारत में यह परंपरा लंबे समय से चली आ रही है, जहां महिलाएं स्वयं इस नियम का पालन करती हैं। “यह कोई लिखित नियम नहीं है, बल्कि विश्वास और अनुशासन का हिस्सा है,” उन्होंने कोर्ट से कहा।
सुनवाई के दौरान वेंकटेश ने डॉ. बी.आर. आंबेडकर के संविधान सभा के भाषणों का हवाला देते हुए तर्क दिया कि “अस्पृश्यता” और “अस्थायी धार्मिक अशुद्धि” अलग अवधारणाएं हैं। उनके अनुसार, सबरीमाला फैसले में इन दोनों को एक समान मानना गलत व्याख्या है।
उन्होंने यह भी कहा कि संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के तहत “धार्मिक प्रथा” और “धार्मिक संप्रदाय” की कोई सटीक परिभाषा संभव नहीं है। उनके मुताबिक, Article 25(2)(a) केवल धर्म से जुड़े आर्थिक और प्रशासनिक पहलुओं के नियमन की अनुमति देता है, न कि मूल धार्मिक प्रथाओं में हस्तक्षेप की।
मंदिर प्रवेश और प्रबंधन के अधिकारों में अंतर स्पष्ट करते हुए वेंकटेश ने कहा कि जहां Article 25(2)(b) सभी हिंदुओं को मंदिर में प्रवेश का अधिकार देता है, वहीं Article 26(b) धार्मिक संस्थाओं को अपने आंतरिक मामलों के संचालन का अधिकार प्रदान करता है।
उन्होंने “हिंदुओं के वर्ग” की व्याख्या करते हुए कहा कि तीर्थ यात्राओं में जाति और वर्ग के भेद समाप्त हो जाते हैं और सभी श्रद्धालु एक समान रूप से भाग लेते हैं, जैसे सबरीमाला यात्रा में भगवान अयप्पा के भक्त।
सुनवाई 9-न्यायाधीशों की संविधान पीठ के समक्ष हो रही है, जिसकी अध्यक्षता सीजेआई सूर्यकांत कर रहे हैं।
मामले में बहस जारी है और यह सुनवाई धार्मिक स्वतंत्रता, समानता और संवैधानिक मूल्यों के बीच संतुलन को लेकर महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

