सुप्रीम कोर्ट का राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से सवाल: RTE Act के तहत प्राइवेट स्कूलों में गरीब छात्रों के लिए सीटें आरक्षित हुईं या नहीं?

Shahadat

10 May 2026 8:03 PM IST

  • सुप्रीम कोर्ट का राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से सवाल: RTE Act के तहत प्राइवेट स्कूलों में गरीब छात्रों के लिए सीटें आरक्षित हुईं या नहीं?

    सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में दस राज्यों और तीन केंद्र शासित प्रदेशों से पूछा कि क्या उन्होंने 'बच्चों के मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE Act), 2009' की धारा 12(1)(c) को लागू किया। अगर वे धारा 12(1)(c) को ईमानदारी से लागू करने का सबूत नहीं दे पाते हैं तो कोर्ट को इन राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों के शिक्षा विभाग के प्रधान सचिवों को तलब करना पड़ेगा।

    यह याचिका 2023 में मोहम्मद इमरान अहमद नाम के व्यक्ति ने दायर की, जिसमें इस प्रावधान को लागू करने की मांग की गई। धारा 12(1)(c) के तहत गैर-अल्पसंख्यक प्राइवेट गैर-सहायता प्राप्त स्कूलों के लिए यह ज़रूरी है कि वे अपनी एंट्री-लेवल की कम से कम 25% सीटें समाज के वंचित वर्गों के बच्चों के लिए आरक्षित रखें।

    जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस विजय बिश्नोई की बेंच इस मामले की सुनवाई कर रही है। 7 मई को हुई हालिया सुनवाई में सीनियर एडवोकेट सलमान खुर्शीद (याचिकाकर्ता की ओर से) ने उन सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की एक लिस्ट पेश की, जिन्होंने धारा 12(1)(c) को लागू नहीं किया।

    इस लिस्ट के अनुसार, राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को पांच श्रेणियों में बांटा गया:

    1. वे राज्य/केंद्र शासित प्रदेश जिन्होंने धारा 12(1)(c) को लागू करने से मना कर दिया है: पंजाब, पश्चिम बंगाल और पुडुचेरी।

    2. वे राज्य/केंद्र शासित प्रदेश जिन्होंने धारा 12(1)(c) से बचने के लिए नियम बनाए हैं: केरल, मिजोरम, सिक्किम और पंजाब।

    3. वे राज्य/केंद्र शासित प्रदेश जो इस मामले पर चुप हैं या जिन्होंने धारा 12(1)(c) को लागू करने के लिए कोई नियम नहीं बनाया है: अरुणाचल प्रदेश, लद्दाख और जम्मू-कश्मीर।

    4. वे राज्य/केंद्र शासित प्रदेश जिन्होंने इस धारा को आंशिक रूप से लागू किया है: अंडमान और निकोबार, और मेघालय।

    5. वे राज्य/केंद्र शासित प्रदेश जिन्होंने इस धारा को लागू करने का दावा तो किया है, लेकिन कोई सबूत पेश नहीं किया है: गोवा और नागालैंड।

    बेंच ने इन सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को चार हफ़्ते का समय दिया ताकि वे इस धारा को सही और ईमानदारी से लागू करने के संबंध में ज़रूरी निर्देश प्राप्त कर सकें और उचित हलफ़नामा (Affidavit) दायर कर सकें।

    कोर्ट ने कहा:

    "अगर वे ऐसा करने में नाकाम रहते हैं तो कोर्ट को इन राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों के शिक्षा विभाग के प्रधान सचिवों को तलब करना पड़ेगा।"

    लद्दाख, जम्मू-कश्मीर, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के केंद्र शासित प्रदेशों (UTs), और मिजोरम तथा सिक्किम राज्यों के लिए, जिनका प्रतिनिधित्व किसी वकील द्वारा नहीं किया गया, अदालत ने रजिस्ट्री से कहा था कि वह एक सप्ताह के भीतर इस आदेश को मुख्य सचिवों और स्थायी वकीलों (Standing Counsels) को भेज दे। अदालत ने यह भी निर्देश दिया था कि वे भी उपरोक्त निर्देशों का पूरी तरह से पालन करें।

    उल्लेखनीय है कि उन्होंने पहले भी इसी तरह की याचिका दायर की थी, जिसमें उन्होंने अल्पसंख्यक छात्रों के लाभ के लिए धारा 12(1)(c) को लागू करने की मांग की थी। हालांकि, अदालत ने कहा कि इस प्रावधान का उपयोग केवल अल्पसंख्यक समुदायों तक ही सीमित नहीं होना चाहिए।

    इसके बाद इमरान ने अपनी पिछली याचिका वापस ली और नई याचिका दायर की, जो प्रस्तुत याचिका है। इस याचिका में उन्होंने उन सभी समुदायों के लिए इस कल्याणकारी प्रावधान को लागू करने की मांग की, जिन्हें इसकी आवश्यकता है।

    याचिका AOR आयुष नेगी द्वारा दायर की गई।

    Case Details: MD IMRAN AHMAD v. UNION OF INDIA & ORS.|WRIT PETITION (CIVIL) NO. 141/2023

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