RJD सांसद मनोज झा ने CEC और चुनाव आयुक्तों को मिली आजीवन छूट को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, इसे 'संविधान के साथ धोखाधड़ी' बताया
Shahadat
15 Oct 2026 6:48 PM IST

RJD सांसद मनोज कुमार झा ने 'मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023' की धारा 16 की संवैधानिक वैधता को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। उन्होंने इसे संविधान के साथ एक "धोखाधड़ी" करार दिया।
धारा 16 देश की किसी भी अदालत को ऐसे किसी भी व्यक्ति के खिलाफ कोई दीवानी (Civil) या आपराधिक (Criminal) कार्यवाही शुरू करने या जारी रखने से रोकती है, जो मुख्य चुनाव आयुक्त या चुनाव आयुक्त रहा हो या है। यह रोक उन कार्यों पर लागू होती है, जो आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन के दौरान किए गए हों, या जिनके बारे में ऐसा दावा किया गया हो कि वे आधिकारिक कर्तव्यों के तहत किए गए।
झा का कहना है कि धारा 16 गैर-निर्वाचित अधिकारियों को एक ऐसी सुरक्षा या छूट (Immunity) देती है, जो राष्ट्रपति, राज्यपाल, सांसद, विधायक, या सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जजों को भी नहीं मिलती है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि यह छूट जीवन भर के लिए बनी रहती है।
इसे 2023 में एक संशोधन के जरिए जोड़ा गया। इस संशोधन ने 'अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ (2023)' मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय की गई उस अस्थायी व्यवस्था को भी हटा दिया, जिसके तहत CEC की नियुक्ति एक समिति द्वारा की जानी थी। इस समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता (या सबसे बड़े विपक्षी दल के नेता) और चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) शामिल थे। 2023 के अधिनियम से CJI को हटा दिया गया और उनकी जगह प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय कैबिनेट मंत्री को शामिल कर लिया गया।
झा की याचिका में तर्क दिया गया:
"संसद ने एक सामान्य विधेयक में अंतिम समय में आधिकारिक संशोधन करके मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों को ऐसी सुरक्षा दे दी है, जो अन्य सभी पदों पर बैठे लोगों को मिलने वाली सुरक्षा से कहीं अधिक व्यापक है। इसमें पद पर रहते हुए और पद छोड़ने के बाद जीवन भर के लिए दीवानी और आपराधिक मामलों से सुरक्षा दी गई। इसमें भ्रष्टाचार, दुर्भावनापूर्ण इरादे या अपराध के लिए कोई अपवाद नहीं रखा गया। ऐसी कोई अथॉरिटी भी नहीं है जो इस सुरक्षा को हटा सके।"
संविधान के साथ धोखाधड़ी
झा का कहना है कि संशोधन के जरिए जोड़ी गई धारा 16 संविधान के साथ एक धोखाधड़ी है, क्योंकि मूल अधिनियम में इसका कोई प्रावधान नहीं था। उन्होंने कहा है कि संविधान बनाने वालों ने जहाँ भी कार्यात्मक छूट (Functional Immunity) देना उचित समझा, वहां उन्होंने ऐसा किया, और वह भी केवल तब तक, जब तक वह व्यक्ति अपने पद पर बना रहता है। इसके विपरीत, संविधान की धारा 324 के तहत चुनाव आयोग की सुरक्षा के लिए ऐसी कोई छूट नहीं दी गई।
आगे कहा गया,
"धारा 16 एक साधारण बहुमत वाले कानून के ज़रिए ऐसी संवैधानिक स्तर की छूट देती है, जो संविधान द्वारा दी गई या अनुमति प्राप्त किसी भी अन्य छूट से कहीं अधिक व्यापक है। यह छूट 'सेवा की शर्तें' (Conditions of Service) के नाम पर दी गई है, जबकि उस कानून के शीर्षक में केवल 'नियुक्ति, सेवा की शर्तें, कार्यकाल' और 'कामकाज के संचालन' (Transaction of Business) का ही उल्लेख है। जीवन भर के लिए दीवानी और आपराधिक दायित्वों से मुक्ति, 'सेवा की शर्त' नहीं हो सकती। यह कानून से ऊपर का दर्जा है। अनुच्छेद 324(2) और (5) के तहत सेवा की शर्तों पर कानून बनाने की शक्ति का विस्तार इतना नहीं किया जा सकता कि पद पर बैठा व्यक्ति अदालतों की पहुँच से ही बाहर हो जाए।"
उन्होंने मांग की कि इस धारा को असंवैधानिक घोषित किया जाए, क्योंकि यह अनुच्छेद 14, 21 और 324 के साथ-साथ संविधान के मूल ढांचे (Basic Structure) का उल्लंघन करती है। वैकल्पिक रूप से, उन्होंने सुझाव दिया कि इस धारा की व्याख्या इस तरह से की जानी चाहिए कि यह आपराधिक कार्यवाही शुरू करने, या राज्य, सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट द्वारा किसी भी तरह की कार्रवाई करने में बाधा न बने।
सांसद ने उस तरीके पर भी सवाल उठाया है, जिससे धारा 16 को कानून में शामिल किया गया। उन्होंने बताया कि जिस विधेयक (Bill) पर संसद को विचार करना था, उसमें धारा 16 शामिल ही नहीं थी। इसे एक आधिकारिक संशोधन के ज़रिए चुपके से जोड़ दिया गया—राज्यसभा में मतदान से ठीक एक दिन पहले—और लोकसभा में इसे तब पारित कर दिया गया, जब विपक्ष के ज़्यादातर सदस्य निलंबित थे।
उन्होंने यह भी कहा कि इसके लिए कोई 'उद्देश्य और कारण का विवरण' (Statement of Objects and Reasons) नहीं दिया गया, न ही किसी समिति के पास इसे भेजा गया और न ही इस पर कोई सार्वजनिक परामर्श (Public Consultation) ही हुआ।
याचिका में कहा गया,
"यह संशोधन अन्य बदलावों के साथ एक पैकेज के रूप में आया, जिसमें CEC और EC के वेतन और दर्जे को सुप्रीम कोर्ट के जज के बराबर कर दिया गया (मूल बिल में इसके लिए कैबिनेट सचिव का पद प्रस्तावित था)। इन संशोधनों के साथ चालाकी से 'इम्युनिटी क्लॉज़' (सुरक्षा प्रावधान) भी जोड़ दिया गया, जिसका एकमात्र बचाव यह दिया जा सकता है कि यह 'जजों के बराबर का दर्जा' है। लेकिन यह बराबरी नहीं है। इसमें 'जज (सुरक्षा) अधिनियम, 1985' के उस उप-खंड को तो शामिल कर लिया गया जो सुरक्षा देता है, लेकिन उस उप-खंड को चुपचाप हटा दिया गया जो जजों को जवाबदेह बनाता है।"
धारा 16, 'जज (सुरक्षा) अधिनियम' की ही एक प्रति है, लेकिन इसमें 'आजीवन सुरक्षा' (लाइफ-टाइम इम्युनिटी) दी गई।
झा ने आगे बताया कि धारा 16, 'जज (सुरक्षा) अधिनियम, 1985' की धारा 3(1) की लगभग हूबहू नकल है, लेकिन इसमें से कुछ प्रावधान जानबूझकर हटा दिए गए।
उन्होंने बताया कि 1985 का अधिनियम जजों को निजी स्तर पर होने वाली परेशानी से बचाने के लिए एक ढाल है। साथ ही इसमें यह स्पष्ट है कि सरकार, सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के पास किसी मौजूदा या पूर्व जज के खिलाफ सिविल, आपराधिक या विभागीय कार्रवाई करने का पूरा अधिकार है। लेकिन धारा 16 में ऐसी कोई गुंजाइश नहीं रखी गई।
सांसद ने इस ओर इशारा किया है कि जजों पर तो मुकदमा चलाया जा सकता है, लेकिन CEC या EC पर मुकदमा चलाने की अनुमति देने का अधिकार किसी भी अथॉरिटी के पास नहीं है।
अंत में कहा गया,
"संसद ने चुनाव आयुक्तों को ऐसी सुरक्षा (इम्युनिटी) दी, जो आज तक सुप्रीम कोर्ट के किसी जज को भी नहीं मिली। जब धारा के बाकी हिस्से को शब्द-दर-शब्द कॉपी किया गया है, तो उप-खंड (2) का छूट जाना कोई महज इत्तेफाक या ड्राफ्टिंग की गलती नहीं हो सकती।"

