'सिर्फ़ आर्थिक स्थिति के आधार पर नहीं है आरक्षण': SC/ST/OBC के अंदर आय-आधारित सब-कोटा की मांग का केंद्र ने किया विरोध

Shahadat

6 Aug 2026 9:14 PM IST

  • सिर्फ़ आर्थिक स्थिति के आधार पर नहीं है आरक्षण: SC/ST/OBC के अंदर आय-आधारित सब-कोटा की मांग का केंद्र ने किया विरोध

    केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका का विरोध किया, जिसमें आरक्षित श्रेणियों के भीतर आय-आधारित सब-कोटा (उप-कोटा) लागू करने के निर्देश मांगे गए। सरकार का तर्क है कि अनुसूचित जातियों (SCs), अनुसूचित जनजातियों (STs) और अन्य पिछड़ा वर्गों (OBCs) के लिए आरक्षण ऐतिहासिक और सामाजिक पिछड़ेपन पर आधारित है, न कि केवल आर्थिक स्थिति पर।

    सामाजिक न्याय और अधिकारिता विभाग के माध्यम से दायर एक जवाबी हलफनामे में केंद्र ने तर्क दिया कि याचिका आरक्षण पर नीति बनाने के लिए न्यायिक निर्देश मांगती है, जो कार्यकारी (सरकार) के अधिकार क्षेत्र में आता है और इसे 'रिट ऑफ़ मैंडमस' (न्यायालय के आदेश) के माध्यम से अनिवार्य नहीं किया जा सकता है।

    याचिकाकर्ताओं ने केंद्र सरकार से अधिक न्यायसंगत आरक्षण नीति विकसित करने के निर्देश मांगे हैं। इसके लिए SC, ST, OBC और EWS श्रेणियों के भीतर आय-आधारित प्राथमिकताएं शुरू करने और उप-वर्गीकरण बनाने की मांग की गई, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि प्रत्येक आरक्षित श्रेणी के भीतर आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को आरक्षण के लाभों के वितरण में प्राथमिकता मिले।

    याचिका का विरोध करते हुए केंद्र ने कहा कि अनुच्छेद 341 के तहत अनुसूचित जातियों, अनुच्छेद 342 के तहत अनुसूचित जनजातियों और अनुच्छेद 342A के तहत सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों की पहचान करने वाली संवैधानिक व्यवस्था केवल आर्थिक मानदंडों के आधार पर बदलाव की अनुमति नहीं देती है। इसने स्पष्ट किया कि इन सूचियों में शामिल करना ऐतिहासिक, सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ेपन पर आधारित है, और राष्ट्रपति द्वारा अधिसूचित सूचियों में संशोधन करने का अधिकार केवल संसद के पास है।

    अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्ग की सूचियों में शामिल करने के मानदंड ऐतिहासिक, सामाजिक और आर्थिक पिछड़ेपन पर आधारित हैं। अनुसूचित जातियों को छुआछूत के कारण ऐतिहासिक नुकसान का सामना करना पड़ा है, जबकि अनुसूचित जनजातियों की विशिष्ट संस्कृति, भौगोलिक अलगाव और पिछड़ापन है। सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों की पहचान सामाजिक, शैक्षिक और आर्थिक नुकसान के साथ-साथ सेवाओं में प्रतिनिधित्व की कमी से की जाती है। ये मानदंड संविधान में स्पष्ट रूप से नहीं बताए गए हैं, लेकिन अच्छी तरह से स्थापित हो गए।

    इस प्रकार, अनुसूचित जातियों (SCs), अनुसूचित जनजातियों (STs) और सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों (SEBCs)/अन्य पिछड़ा वर्गों (OBCs) की पहचान जाति, जनजाति और सामाजिक पिछड़ेपन जैसे ऐतिहासिक और सामाजिक मानदंडों पर आधारित है, न कि केवल आर्थिक स्थिति पर। केंद्र सरकार ने ज़ोर देकर कहा कि SC, ST और OBC लिस्ट में शामिल करने के मानदंड संवैधानिक प्रावधानों, कालेलकर और मंडल जैसे आयोगों और संसदीय कानूनों के ज़रिए विकसित हुए हैं। सरकार ने कहा कि इन श्रेणियों की पहचान जाति, जनजाति और सामाजिक पिछड़ेपन जैसे ऐतिहासिक और सामाजिक मानदंडों के आधार पर की जाती है, "न कि केवल आर्थिक स्थिति के आधार पर।"

    SC/ST पर 'क्रीमी लेयर' लागू नहीं होता

    इंद्रा साहनी, ई.वी. चिन्नैया, एम. नागराज और अशोक कुमार ठाकुर मामलों में सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए, केंद्र सरकार ने तर्क दिया कि "क्रीमी लेयर" को बाहर करने का सिद्धांत OBC आरक्षण के संदर्भ में विकसित किया गया और यह अनुसूचित जातियों (SC) और अनुसूचित जनजातियों (ST) पर लागू नहीं होता। हलफनामे में इंद्रा साहनी मामले की टिप्पणियों को दोहराया गया, जिसमें कहा गया कि केवल आर्थिक तरक्की के आधार पर बाहर करने से सामाजिक पिछड़ेपन की अवधारणा कमज़ोर हो जाएगी। यह भी बताया गया कि उस फैसले में चर्चा को स्पष्ट रूप से OBC तक ही सीमित रखा गया।

    हलफनामे में ई.वी. चिन्नैया मामले का भी हवाला दिया गया, जिसमें कहा गया कि SC लिस्ट से किसी को बाहर करने का काम केवल संसद ही अनुच्छेद 341(2) के तहत कर सकती है, न कि न्यायिक निर्देशों या कार्यकारी कार्रवाई के ज़रिए। इसमें यह भी तर्क दिया गया कि एम. नागराज मामले में यह नहीं कहा गया कि क्रीमी लेयर का सिद्धांत SC और ST पर लागू होता है और अशोक कुमार ठाकुर मामले में यह स्पष्ट किया गया था कि यह सिद्धांत OBC आरक्षण तक ही सीमित है।

    केंद्र सरकार ने यह भी कहा कि शिक्षा और सरकारी नौकरियों में आरक्षण के मामलों को छोड़कर SC, ST और OBC के लिए कई कल्याणकारी योजनाओं में पहले से ही 'मीन्स टेस्ट' (आर्थिक स्थिति की जाँच) शामिल है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि लाभ सही लाभार्थियों तक पहुंचे। सरकार ने तर्क दिया कि आरक्षण के भीतर आय-आधारित प्राथमिकताएं लागू करने के किसी भी प्रस्ताव के लिए आरक्षित श्रेणियों के लाभार्थियों से संबंधित सामाजिक-आर्थिक डेटा का व्यापक अनुभवजन्य अध्ययन आवश्यक होगा।

    रिट याचिका को "गलत धारणा पर आधारित" बताते हुए केंद्र सरकार ने तर्क दिया कि यह अनुच्छेद 32 के तहत कोई लागू करने योग्य संवैधानिक मुद्दा नहीं उठाती है और असल में कार्यपालिका से किसी खास तरीके से नीति बनाने के लिए न्यायिक निर्देश की मांग करती है। सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से आग्रह किया कि वह याचिका को जुर्माने के साथ खारिज कर दे।

    Case : Ramashankar Prajapati & Anr. v. Union of India & Ors. | W.P.(C) No. 682/2025

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