जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की बड़े पैमाने पर वोटिंग का अधिकार छीनने के खिलाफ टिप्पणी में कोई गलत बात नहीं: जस्टिस ओक

  • जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की बड़े पैमाने पर वोटिंग का अधिकार छीनने के खिलाफ टिप्पणी में कोई गलत बात नहीं: जस्टिस ओक

    जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की इस टिप्पणी पर विवाद खड़ा हो गया कि वोटर्स से बड़े पैमाने पर वोटिंग का अधिकार छीनने को कोई भी कोर्ट सही नहीं ठहरा सकता। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस अभय ओक ने जस्टिस भुइयां का बचाव करते हुए कहा कि मौजूदा सुप्रीम कोर्ट जज ने कोई न्यायिक अनुचित काम नहीं किया।

    जस्टिस ओक ने कहा कि किसी दूसरी बेंच या अपनी ही बेंच के सामने चल रहे मामले के गुण-दोष पर मौजूदा जज का टिप्पणी करना शायद सही नहीं होगा। लेकिन जस्टिस भुइयां के भाषण में ऐसा कुछ नहीं हुआ।

    उन्होंने कहा कि जज भी एक नागरिक होता है और राष्ट्रीय मुद्दों के प्रति उदासीन नहीं रह सकता। मौजूदा जज को संयम बरतना चाहिए, यानी वे किसी खास राष्ट्रीय मुद्दे पर अपने विचार लेकर मीडिया के सामने नहीं जा सकते या उस पर लिख नहीं सकते, लेकिन अगर वे किसी लॉ कॉलेज में जाते हैं, जहां किसी कानूनी मुद्दे पर बहस हो रही है, तो जज कानून के छात्र के तौर पर अपने विचार रख सकते हैं, बिना कोर्ट के किसी आदेश या चल रहे मामले पर टिप्पणी किए।

    जस्टिस ओक ने कहा,

    "मुझे नहीं लगता कि उन्होंने सीमा पार की है... बल्कि मुझे लगता है कि उन्होंने युवा छात्रों को वयस्क मताधिकार (Adult Franchise) और लोकतंत्र में इसके महत्व के बारे में बताया है। मुझे नहीं लगता कि इसमें कुछ गलत है। असल में, व्यक्तिगत रूप से मुझे लगता है कि अगर जज एक नागरिक के तौर पर इस प्रक्रिया के बारे में बात करते हैं तो इसमें कुछ गलत नहीं है... मैं एक कदम और आगे बढ़कर कहूंगा - बेशक कोई भी मौजूदा जज अपनी कोर्ट या किसी अन्य संवैधानिक कोर्ट या दूसरी बेंच में चल रहे मामले के गुण-दोष पर टिप्पणी नहीं कर सकता, इसमें कोई शक नहीं है। लेकिन हो सकता है कि लॉ स्टूडेंट के तौर पर छात्रों के साथ कानून पर चर्चा करते हुए वह कहें कि सुप्रीम कोर्ट के किसी खास फैसले पर पुनर्विचार की ज़रूरत हो सकती है। इसका मतलब यह नहीं है कि वे न्यायिक पक्ष में भी वही राय रखेंगे।"

    ये टिप्पणियां लेक्स कॉन्सिलियम फाउंडेशन के संस्थापक-निदेशक और पूर्व जज एडवोकेट जनरल नीलेन्द्र कुमार के साथ बातचीत के दौरान की गईं। बहस की शुरुआत में जस्टिस ओक ने कहा कि उन्होंने जस्टिस भुइयां के भाषण को ध्यान से देखा और उन्हें सुप्रीम कोर्ट में चल रहे किसी मामले के गुण-दोष या SIR के बारे में कोर्ट के किसी आदेश पर कोई टिप्पणी नहीं मिली।

    उन्होंने कहा,

    "आज सुबह मैंने जस्टिस भुइयां के भाषण का पूरा वीडियो सुना, जो उन्होंने भारत के प्रमुख नेशनल लॉ स्कूलों में से एक NALSAR में दिया था। यह मौका NALSAR द्वारा आयोजित मूट कोर्ट प्रतियोगिता के समापन समारोह का था। भाषण से मुझे पता चला कि मूट कोर्ट का विषय वोट देने के अधिकार से जुड़ा था। मैंने पूरा भाषण बहुत ध्यान से सुना। मुझे नहीं लगता कि उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के सामने चल रहे किसी मामले या किसी दूसरी बेंच के सामने चल रहे मामले के गुण-दोष पर कोई टिप्पणी की। मुझे ऐसा कुछ नहीं मिला जिससे लगे कि उन्होंने SIR मामले में सुप्रीम कोर्ट के किसी आदेश की आलोचना की हो।"

    जस्टिस ओक ने इस बात पर ज़ोर दिया कि जस्टिस भुइयां का मकसद NALSAR के छात्रों को वयस्क मताधिकार (एडल्ट फ्रैंचाइज़) का महत्व समझाना था, क्योंकि मूट प्रतियोगिता (जिसमें जस्टिस भुइयां ने भाषण दिया) का विषय वोट देने के अधिकार से संबंधित है।

    जस्टिस ओक ने कहा,

    "वे कहते हैं कि - सबसे पहले, वे वयस्क मताधिकार के संदर्भ और अर्थ पर चर्चा करते हैं। वे अपनी चर्चा 1895 के स्वराज बिल से शुरू करते हैं, जिसमें पहली बार वयस्क मताधिकार के लिए कुछ प्रावधान किया गया था। फिर वे आगे बढ़ते हैं। वे भारत सरकार के दोनों कानूनों पर चर्चा करते हैं। वे भारत के संविधान के मसौदे पर चर्चा करते हैं। फिर कहते हैं कि अनूप के मामले (जो संविधान पीठ का फैसला है) को देखते हुए और अनुच्छेद 326 को पढ़ने के बाद वोट देने का अधिकार - जो हर वयस्क भारतीय नागरिक को मिला है - उसे संविधान के अनुच्छेद 326 से अलग नहीं किया जा सकता।

    वे अनुच्छेद 326 की ओर इशारा करते हैं, जिसमें कहा गया कि केंद्र और राज्य विधानसभाओं के चुनावों में 18 वर्ष से अधिक उम्र के हर नागरिक को वोट देने का अधिकार दिया गया। अनुच्छेद 326 कहता है कि कोई व्यक्ति किस समय पात्र बनेगा, यह कानून द्वारा तय किया जाएगा। वोटरों की योग्यता और अयोग्यता भी कानून द्वारा तय की जाएगी। लेकिन मूल रूप से जस्टिस भुइयां कहते हैं कि वोट देने का अधिकार इतना महत्वपूर्ण अधिकार है कि इसे अनुच्छेद 326 से अलग नहीं किया जा सकता। इसके बाद वे कहते हैं कि अगर चुनाव आयोग वोटर लिस्ट से लाखों वोटरों के नाम हटा देता है तो यह कदम मनमाना होगा। चूंकि यह मनमाना होगा, इसलिए यह अनुच्छेद 14 का उल्लंघन होगा।"

    जस्टिस ओक ने आगे कहा कि जब जज लॉ कॉलेज में छात्रों को संबोधित करते हैं, तो वे खुद भी लॉ स्टूडेंट की भूमिका में आ जाते हैं, क्योंकि जज खुद भी लगातार सीखने की प्रक्रिया में होते हैं। उन्होंने एक मौजूदा जज के तौर पर अपने भाषणों का उदाहरण देते हुए यह स्पष्ट किया कि जस्टिस भुइयां के भाषण का मतलब सुप्रीम कोर्ट के किसी फैसले की आलोचना करना नहीं था।

    जस्टिस ओक ने कहा,

    "जब हम मौजूदा जज किसी लॉ स्कूल या लॉ कॉलेज में जाते हैं तो हम वहां छात्रों को कानून के छात्र के तौर पर ही संबोधित करते हैं, क्योंकि हम खुद भी कानून की पढ़ाई करते रहते हैं। मैं एक मौजूदा जज के तौर पर एक उदाहरण देता हूं: हो सकता है कि मैंने लॉ के छात्रों को आर्टिकल 19(1)(a) के तहत बोलने और अपनी बात रखने की आज़ादी (Freedom of Speech and Expression) के मुद्दे पर संबोधित किया हो और बताया हो कि यह कितना ज़रूरी है। मैंने लॉ स्कूलों या लॉ कॉलेजों में कई भाषणों में कहा है कि यह सबसे बुनियादी अधिकार है, सबसे कीमती मौलिक अधिकार है, जो हमें मिला है। इस अधिकार की रक्षा करना और इसे बनाए रखना संवैधानिक अदालतों का कर्तव्य है। ऐसा कहते हुए हो सकता है कि मैंने यह भी कहा हो कि कुछ मामलों में लोगों का यह कहना सही हो सकता है कि कुछ अदालतों ने इस अधिकार की रक्षा नहीं की है। हो सकता है कि मैंने ऐसा कहा हो। इसका मतलब यह नहीं है कि मैं किसी दूसरी बेंच या किसी अदालत के किसी फैसले की आलोचना कर रहा हूं, या अदालत में चल रहे किसी विवाद की आलोचना कर रहा हूं।

    इसी तरह जस्टिस भुइयां ने जो कहा है कि भारत के संविधान के संदर्भ में वयस्क मताधिकार (Adult Franchise) कितना महत्वपूर्ण है - उन्होंने आर्टिकल 326 का ज़िक्र किया और कहा कि चुनाव आयोग द्वारा लाखों मतदाताओं के नाम हटाना मनमाना होगा, जो स्वाभाविक रूप से आर्टिकल 14 का उल्लंघन होगा। मुझे नहीं लगता कि उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के किसी फैसले की आलोचना की या सुप्रीम कोर्ट में चल रहे किसी विवाद के गुण-दोष पर कोई टिप्पणी की। ये कानून के एक छात्र के तौर पर उनके विचार हैं और मुझे लगता है कि उन्हें ऐसा करने का अधिकार है।"

    उल्लेखनीय है कि जस्टिस ओका ने SIR प्रक्रिया के साथ अपने निजी अनुभव को भी साझा किया। उन्होंने बताया कि उन्हें 'फॉर्म 8' भरने के लिए कहा गया, क्योंकि उनके सरनेम की स्पेलिंग में गलती थी, जबकि उन्होंने सही स्पेलिंग वाले पहचान दस्तावेज़ दिए। जज ने कहा कि उन्हें वोटर लिस्ट में अपने पिता के नाम का सीरियल नंबर पता करना था, लेकिन उन्हें इसकी जानकारी नहीं थी। इसलिए उन्होंने एन्यूमरेशन फॉर्म भरा और अपने पहचान दस्तावेज़ों की कॉपी दीं (जिसमें सुप्रीम कोर्ट का आधिकारिक दस्तावेज़ भी शामिल है, जिसमें उन्हें रिटायर्ड जज के तौर पर पहचाना गया)। लेकिन जब एन्यूमरेशन लिस्ट आई तो उनके सरनेम की स्पेलिंग सही नहीं है।

    जस्टिस ओक ने कहा कि संबंधित BLO ने उनसे कहा कि उन्हें 'फॉर्म 8' भरना होगा, क्योंकि BLO के पास खुद सुधार करने का अधिकार नहीं है।

    जस्टिस ओक ने टिप्पणी की,

    "यह कैसी प्रक्रिया है? एन्यूमरेशन फॉर्म भरने का नतीजा यह हुआ कि मेरे सरनेम में गलती हो गई, जबकि मेरे आधिकारिक दस्तावेजों में मेरा सरनेम अंग्रेजी में सही लिखा हुआ था। अब मुझे 'फॉर्म 8' के तहत आवेदन करना होगा। क्या यह सब जरूरी था?"

    इंटरव्यू लेने वाले के एक सवाल का जवाब देते हुए पूर्व जज ने आगे कहा कि भले ही यह मान लिया जाए कि सुप्रीम कोर्ट ने SIR की वैधता को बरकरार रखा है, फिर भी "कानूनी प्रक्रिया" को लागू करते समय मनमानापन आ सकता है, जिससे वह गैर-कानूनी हो जाएगी। ऐसे मामले में, कोई नागरिक, या कोई मौजूदा जज भी, यह कह सकता है कि ऐसा मनमाने ढंग से नहीं किया जा सकता।

    जस्टिस भुयान के भाषण की पूर्व CJI बी.आर. गवई द्वारा की गई आलोचना से जुड़े एक अन्य सवाल पर जस्टिस ओक ने कहा कि रिटायर हो चुके जज मौजूदा जजों की तरह उन्हीं पाबंदियों से बंधे नहीं होते। लेकिन, अगर कोर्ट के किसी खास फैसले के खिलाफ उनकी कोई राय है तो भी उस राय को सम्मानजनक तरीके से व्यक्त किया जाना चाहिए। साथ ही उचित स्पष्टीकरण भी दिया जाना चाहिए कि उस फैसले को गलत क्यों माना जा रहा है।

    अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

    Next Story