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मराठा कोटाः सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ ने फरवरी तक के लिए सुनवाई स्‍थग‌ित की, स्टे का आदेश जारी रहेगा

LiveLaw News Network
20 Jan 2021 6:13 AM GMT
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Supreme Court of India

सुप्रीम कोर्ट की संव‌िधान पीठ ने महाराष्ट्र सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्ग (एसईबीसी) अधिनियम, 2018, जिसके तहत नौकरियों और शिक्षा में मराठों को कोटा प्रदान किया गया है, की संवैधानिकता के खिलाफ दायर चुनौती पर सुनवाई को 5 फरवरी तक के लिए स्थगित कर दिया है।

जस्टिस अशोक भूषण की अध्यक्षता में खंडपीठ ने वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी की प्रस्तुतियों पर विचार किया, जिन्होंने COVID-19 महामारी के कारण मामले की तैयारी की अक्षमता के बारे में अदालत को सूचित किया।

अदालत में जिरह

महाराष्ट्रा राज्य की ओर से पेश हुए रोहतगी ने खंडपीठ को सूचित किया कि मुवक्किलों से उचित निर्देश लिए गए थे और चूंकि सभी वकीलों को विभिन्न स्थानों से आना था, इसलिए इस मामले की तैयारी करना मुश्किल था।

उन्होंने कहा, "हम वकील अलग-अलग जगहों पर बिखरे हुए हैं और रिकॉर्ड बहुत बड़े हैं। वर्चुअल सुनवाई पर बहस करना मुश्किल है। हम मेरिट पर बात नहीं कर रहे हैं। टीकाकरण प्रक्रिया शुरू हो गई है और बुजुर्गों के लिए 6-8 सप्ताह की प्रतीक्षा है। हमें पता है कि हमारे खिलाफ एक अंतरिम आदेश चल रहा है।"

वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने रोहतगी की प्रस्तुतियों पर सहमति व्यक्त की और कहा कि स्थगन आदेश के कारण कोई पक्षपात नहीं होगा। तदनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को 5 फरवरी को सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया।

पृष्ठभूमि

पिछली सुनवाई में बेंच ने मराठा कोटे के तहत नियुक्तियों और प्रवेश पर सितंबर 2020 में तीन-जजों पीठ द्वारा लगाए गए स्टे पर कोई भी आदेश पारित करने से इनकार कर दिया था। तीन जजों की बेंच द्वारा स्टे ऑर्डर जस्टिस एल नागेश्वर राव की अध्यक्षता में पारित किया गया था, जिसने मामले को बड़ी बेंच को भेज दिया था।

वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने महाराष्ट्र राज्य की ओर से पेश होकर कहा कि आदेश के संशोधन के लिए एक आवेदन दायर किया गया है ताकि नियुक्ति प्रक्रिया आगे बढ़ सके। उन्होंने कहा कि जब कोई मामला संदर्भित होता है, तो संदर्भ पीठ अंतरिम आदेश पारित नहीं कर सकती है और पूरे मामले को संविधान पीठ को छोड़ देना चाहिए। उन्होंने कहा कि यह व्यवस्थित कानून और व्यवहार है।

जस्टिस अशोक भूषण, एल नागेश्वर राव, एस अब्दुल नाजिर, हेमंत गुप्ता और एस रविंद्र भट की खंडपीठ अवकाश के कारण अंतरिम प्रार्थना पर विचार करने की इच्छुक नहीं थी और कहा कि इस मामले को अंततः जनवरी में सुना जा सकता है।

जब रोहतगी ने कहा कि स्थगन आदेश के कारण लगभग 2185 नियुक्तियां ठप पड़ी हैं, तो पीठ ने कहा कि न्यायालय ने महाराष्ट्र सरकार को नियुक्तियां करने से नहीं रोका है और कहा है कि जो कुछ रोका गया है वह केवल कोटा के तहत नियुक्तियां हैं।

पांच-जजों की बेंच ने अटॉर्नी जनरल ऑफ इंडिया को भी नोटिस जारी किया, क्योंकि इस मामले में संविधान में 102 वें संशोधन की व्याख्या शामिल है।

बेंच ने कहा, "हमारा विचार है कि इन सिविल अपीलों में उठाए गए मुद्दे, और इनके प्रभाव और परिणाम, के कारण, यह आवश्यक है कि सिविल अपीलों को सुना जाए और अंतिम सुनवाई जल्द से जल्द समाप्त की जाए। अदालत है 18 दिसंबर को शीतकालीन अवकाश के लिए बंद हो रही है। 25 जनवरी से शुरू होने वाले सप्ताह में इन अपील को सूचीबद्ध किया जाए।"

खंडपीठ ने जनवरी के दूसरे सप्ताह तक काउंसल को लिखित प्रस्तुतियां देने करने की अनुमति दी।

नौ सितंबर के आदेश में कहा गया था कि वर्ष 2020-2021 के लिए उक्त अधिनियम के तहत कोई भी नियुक्ति या प्रवेश नहीं किया जाएगा। हालांकि, जो भी पोस्ट-ग्रेजुएट एडमिशन हुए हैं, उनमें बदलाव नहीं होगा।

तीन-जजों की बेंच के समक्ष दायर याचिका में जून 2019 में पारित बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती दी गई थी, और प्रस्तुत किया गया था कि सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ा वर्ग (एसईबीसी) अधिनियम, 2018, जिसके तहत शिक्षा और नौकरी में मराठा समुदाय को क्रमशः 12% और 13% कोटा प्रदान किया गया है, इंदिरा साहनी बनाम भारत संघ (1992) के मामले में निर्धारित सिद्धांतों का उल्लंघन करता है, जिसके अनुसार सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण की सीमा को 50% पर सीमित कर दिया है।

बॉम्बे हाईकोर्ट ने मराठा कोटे को बरकरार रखते हुए कहा कि 16% आरक्षण न्यायसंगत नहीं है और रोजगार में आरक्षण 12% से अधिक नहीं होना चाहिए और शिक्षा में 13% से अध‌िक नहीं होना चाहिए, जैसा कि राज्य पिछड़ा आयोग द्वारा अनुशंसित है।

क्या राज्य सरकार के पास संविधान (102 वें) संशोधन के बाद किसी वर्ग को सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़ा घोषित करने की शक्ति है? इस सवाल को 9 सितंबर, 2020 को, तीन-जजों की बेंच ने बड़ी बेंच को संदर्भ‌ित कर दिया।

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