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जम्‍मू-कश्मीर में 4G इंटरनेट पर प्रतिबंध श‌िक्षा के अधिकार का हनन, सुप्रीम कोर्ट में प्राइवेट स्कूल्स एसोसिएशन ने दायर की याचिका

LiveLaw News Network
10 April 2020 1:30 PM GMT
Children Of Jammu and Kashmir From Continuing Education
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प्राइवेट स्कूल्स एसोसिएशन, जम्मू और कश्मीर (PSAJK) ने सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की है, जिसमें कहा गया है कि जम्मू और कश्मीर में 4 जी कनेक्टिविटी की अनुपलब्‍धता शिक्षा के मौलिक अधिकार का उल्लंघन कर रही है।

PSAJK में 2,200 से अधिक स्कूल शामिल हैं। एडवोकेट शोएब कुरैशी और चारू अंबवानी की त्वरित याचिका में 18 जनवरी 2020, 24 जनवरी 2020, 26 मार्च 2020 और 03 अप्रैल 2020 के सरकारी आदेशों को चुनौती दी गई है, जिनके तहत जम्‍मू और कश्मीर में इंटरनेट पर प्रतिबंध लगाया गया था।

याचिकाकर्ताओं ने दलील दी है कि अगस्त 2019 में अनुच्छेद 370 के निरस्त होने और उसके बाद इंटरनेट पर लगाए गए प्रतिबंधों के बाद शिक्षा क्षेत्र गंभीर रूप से प्रभावित हुआ है। इंटरनेट की सीमित उपलब्‍धता के कारण ज्ञान के प्रसार और ऑनलाइन शिक्षा प्रदान करने में व्यवधान हो रहा है। COVID 19 के दौर में ये संकट और बढ़ गया है।

याचिका में कहा गया है,

"संविधान प्रदत्त सभी मौलिक अधिकारों में शिक्षा का अधिकार सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। ज्ञानार्जन और प्रसार के माध्यम के रूप में इंटरनेट शिक्षा के अधिकार को अधिक सशक्त बनाता है। श‌िक्षा प्रदान करने के माध्यम के रूप में इटरनेट, ऑनलाइन पाठ्यक्रम और कक्षाएं मौजूदा दौर में ज्यादा जरूरी हो गई हैं, जबकि जम्मू और कश्मीर गंभीर प्रतिबंधों से गुजर रहा है।"

याचिका में उन कथित कानून विरोधी प्रवृत्त‌‌ियों का भी जिक्र है, जो कि सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न निर्णयों के जर‌िए निर्धारित विभिन्न परीक्षणों की विरोधाभासी हैं।

"इंटरनेट पर प्रतिबंध का आदेश सुप्रीम कोर्ट की ओर से अनुराधा भसीन बनाम यूनियन ऑफ इंडिया के मामले में निर्धारित कानून का पालन किए बिना पर‌ित किया गया है। इसके अलावा, प्रतिबंध आदेश, अनुराधा भसीन बनाम यूनियन ऑफ इंडिया, (साथ में पढ़ें) जस्टिस केएस पुट्टुस्वामी बनाम यूनियन ऑफ इंडिया के मामलों में सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित आनुपातिकता परीक्षण में भी असफल रहें।"

प्रतिबंध का आदेश शिक्षा प्राप्त करने के लिए छात्रों के अधिकारों का उल्लंघन करता है और याचिकाकर्ताओं के कारोबार और व्यावसायिक गतिविधियों को संचालित करने के अधिकार का भी उल्‍लंघन करता है।

याचिका के सा‌थ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को कक्षा 5 के छात्र द्वारा लिखे गए एक पत्र को भी संलग्न किया गया है, जिसमें लगातार होने वाले व्यवधानों के कारण छात्रों और शिक्षकों को होने वाली परेशानी का जिक्र किया गया है। पत्र इस प्रकार है-

प्रिय मोदी जी,

मैं दुखी, निराश, क्रोधित और तनावग्रस्त हूं क्योंकि मैं 2G के कारण अपने स्कूल (PCHSS) द्वारा दी जा रही ऑनलाइन कक्षाओं में शामिल नहीं हो सका। 2 जी पर ऑनलाइन कक्षाएं काम नहीं करती है।

मैं अगस्त 2019 से अपने स्कूल से दूर था (आप जानते हैं कि क्यों) और जब मैं दोबारा अपने स्कूल से जुड़ा तो कोरोनेवायरस के कारण स्कूल फिर से बंद हो गए। हमारे शिक्षकों ने हमें ऑनलाइन कक्षाओं के जर‌िए पढ़ाने का फैसला किया लेकिन ये हो नहीं पाया। मैं आपसे अनुरोध करता हूं कि हमें 4G वापस दें ताकि हम अपनी पढ़ाई कर सकें।"

उपरोक्त पत्र के आलोक में याचिका में कहा गया है-

"चूंकि छात्रों और स्कूलों का भविष्य दांव पर है और याचिकाकर्ताओं के पास कोई विकल्प नहीं बचा था, इसलिए माननीय कोर्ट से संपर्क किया है।"

सुप्रीम कोर्ट ने दिया नोटिस

एक अन्य मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने गुरुवार को फाउंडेशन ऑफ मीडिया प्रोफेशनल्स द्वारा दायर याचिका में एक नोटिस जारी किया, जिसमें COVID-19 महामारी के मद्देनजर, जम्मू और कश्मीर में 4G मोबाइल इंटरनेट सेवाएं बहाल करने की मांग की गई थी। गुरुवार को जस्टिस एनवी रमना की बेंच के समक्ष वरिष्ठ अधिवक्ता हुजेफा अहमदी ने कहा था कि लॉकडाउन ऑनलाइन कक्षाएं को केवल टेक्नॉलोजी के बेहतर करके ही दी जा सकती हैं।"

उल्लेखनीय है कि केंद्र सरकार ने अनुच्छेद 370 को निरस्त करने के बाद अगस्त 2019 में जम्मू-कश्मीर में संचार पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया ‌था। पांच महीने बाद जनवरी 2020 में, अनुराधा भसीन बनाम यूनियन ऑफ इंडिया के मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद आंशिक रूप से सेवाओं को बहाल किया गया था।

3 अप्रैल, 2020 को, जम्मू-और कश्मीर प्रशासन ने मोबाइल इंटरनेट पर मौजूदा प्रतिबंधों को 15 अप्रैल तक बनाए रखने का आदेश पारित किया था।

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