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केरल में गर्भवती हथिनी की मौत का मामला : वन्यजीवों के खिलाफ प्रयोग न किए जाएं जाल और बर्बरता के सामान, सुप्रीम कोर्ट में याचिका

LiveLaw News Network
14 Jun 2020 5:00 AM GMT
केरल में गर्भवती हथिनी की मौत का मामला : वन्यजीवों के खिलाफ प्रयोग न किए जाएं जाल और बर्बरता के सामान, सुप्रीम कोर्ट में याचिका
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केरल में गर्भवती हथिनी की दुखद मौत के मामले में सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की गई है,जिसमें जंगली जानवरों से बचने के लिए जाल में बिछी धातु की छड़ या स्नेर और अन्य बर्बर साधनों का उपयोग करने की प्रथा को चुनौती दी गई है।

याचिका में कहा गया है कि यह प्रथाएं गैरकानूनी और असंवैधानिक हैं, इसलिए, ऐसी घटनाओं से निपटने और देश के सभी राज्यों में फाॅरेस्ट फोर्स में खाली पड़े पदों को भरने के लिए एक मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) का निर्माण करने के लिए दिशानिर्देश जारी किए जाएं।

27 मई को एक गर्भवती हथिनी की मौत हो गई थी। इस हथिनी को पटाखों से भरा अनानास खिलाया गया था, जिस कारण वह घायल हो गई थी। इस अनानास को स्थानीय लोगों ने जंगली सूअरों को भगाने के लिए रखा था,जो हमेशा उनकी संपत्ति/ खेतों में घुस जाते हैं। इन पटाखों के कारण हथिनी के जबड़े और जीभ बुरी तरह से क्षतिग्रस्त हो गए थे। इस वजह से वह कोई भी खाना निगल पाने में असमर्थ हो गई और भूखा रहने के कारण उसकी मौत हो गई।

उपरोक्त घटना के चलते एडवोकेट शुभम अवस्थी की ओर से एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड विवेक नारायण शर्मा ने यह याचिका दायर की है, जिसमें में कहा गया है, ''जानवरों के प्रति किए जाने वाले डी ज्यूर (औपचारिक) और डी फैक्टो (मूल) अपमानजनक उपचार को खत्म न कर पाना प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से ,न केवल जानवरों के सबसे बुनियादी अधिकारों का उल्लंघन करता है, बल्कि हमारे संविधान के अनुसार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक जीवित प्रणाी के लिए परिकल्पित उनकी बुनियादी गरिमा का भी उल्लंघन है।''

इस याचिका में भारत में हाथियों के प्रति होने वाले क्रूर व्यवहार पर प्रकाश डाला गया है, जो प्राचीन भारत में उन पर किए जाने वाले गर्व के बिल्कुल विपरीत है।

याचिका मेंं कहा गया,

''उस समय हाथियों के बिना किसी सेना की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। भारतीय दार्शनिक और शाही सलाहकार चाणक्य, जिन्होंने अर्थशास्त्र लिखा था,जो प्राचीन भारतीय राजनीतिक ग्रंथ है, जिसमें राजा के लिए वह नियम साफ तौर पर लिखे गए थे,जो हाथियों की रक्षा के लिए जरूरी थे।

उन्होंने कहा था कि जो भी हाथी को मारता है ,उसे मौत के घाट उतार दिया जाए। अर्थशास्त्र में कहा गया है कि उन हाथियों को भी खाना खिलाया जाता था,जो युद्ध के लायक नहीं रहते थे या वृद्धावस्था या बीमारी से पीड़ित थे।''

इसके बाद याचिका में जंगली जानवरों को डराने के लिए पटाखों से भरे भोजन का उपयोग करने की प्रथा पर भी रोक लगाने की मांग की गई है। वहीं याचिका में पूरे भारत में वन्यजीवों की रक्षा न कर पाने का दोष वन विभाग पर लगाया गया है। जिसकी मुख्य वजह कर्मचारियों की कम संख्या व वैज्ञानिक उपायों की कमी है।

''भारत के लगभग हर राज्य में फाॅरेस्ट फोर्स की संख्या काफी कम है और इस तरह की कमी के कारण कर्मियों को लंबे समय तक ड्यूटी पर खड़े रहना पड़ता है। इसके परिणामस्वरूप उन जोन की इतनी प्रभावी निगरानी नहीं हो पाती है,जिनकी जिम्मेदारी उनको सौंपी जाती है। इसलिए भर्ती प्रक्रिया और निगरानी उपायों के मामले में विभिन्न राज्यों को कदम उठाने की जरूरत है ताकि वन्यजीव संरक्षण अधिनियम को पूर्ण रूप से लागू किया जा सकें।''

इस याचिका में कल्याणकारी कानून प्रिवेंशन ऑफ क्रुएलिटी टू एनिमल्स एक्ट का हवाला देते हुए कहा गया है कि अधिनियम को इस तरीक से लागू किया जाना चाहिए ताकि अधिनियम के आशय और उद्देश्य के साथ-साथ राज्य नीति के निर्देशक सिद्धांतों का भी पालन हो पाए। याचिका में अनुच्छेद 51-ए (जी) के तहत बताए गए मौलिक कर्तव्य और वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के साथ-साथ हाथी संरक्षण अधिनियम, 1879 के तहत निर्धारित प्रावधानों को भी इंगित किया गया है। जिनके तहत ग्रामीणों द्वारा ऐसे साधनों का उपयोग नहीं किया जाना चाहिए।

''यह सामान्य कानून है कि कल्याणकारी कानून के मामले में कानून के प्रावधान इस तरह के होने चाहिए कि वह कमजोर और दुर्बल के पक्ष में उदारतापूर्वक लागू हो सकें। न्यायालय को यह भी देखने के लिए सतर्क रहना चाहिए कि ऐसे उपचारात्मक और कल्याणकारी कानूनों द्वारा प्रदान किए गए लाभों को किसी धूर्त उपाय से हरा न दिया जाए।''

यह भी दलील दी गई है कि मामलों की सही स्थिति को देखने व यह जांचने के लिए कि क्या जानवरों के कल्याण की बजाय कुछ अन्य उद्देश्य प्राप्त करने के लिए दिशानिर्देश/विनियम तैयार किए गए हैं, अदालत को इन पर विचार करना चाहिए।

याचिका में कहा गया है कि-

''विनियमन या दिशा-निर्देश, चाहे वैधानिक हो या अन्य, यदि वे कल्याणकारी कानून और संवैधानिक सिद्धातों को कमजोर करने या पराजित करने का उद्देश्य रखते हैं तो अदालत को उन्हें निष्फल करने में संकोच नहीं करना चाहिए ताकि कल्याण कानून के अंतिम आशय और उद्देश्य को प्राप्त कर किया जा सकें। कोर्ट का माता-पिता के सिद्धांत ( doctrine of parents patriae ) के तहत यह भी कर्तव्य है कि वह जानवरों के अधिकारों का ध्यान रखें क्योंकि वे इंसानों के खिलाफ खुद की देखभाल करने में असमर्थ हैं।''

इस प्रकार याचिका में मांग की गई है कि इस प्रथा को गैरकानूनी, असंवैधानिक और अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन करने वाली घोषित किया जाए। यह भी मांग की गई है कि केंद्र और राज्य सरकारों को निर्देश दिया जाए कि वे प्रिवेंशन ऑफ क्रुएलिटी टू एनिमल्स एक्ट 1960 में आवश्यक संशोधन करें ताकि ऐसे मामलों में दी जाने वाली सजा को और सख्त बनाया जा सके।

यह भी मांग की गई है कि फाॅरेस्ट फोर्स में खाली पदों को भरने और ऐसी दुर्घटनाओं से निपटने व किसी ऐसी घटना के कारण जानवर की मौत हो जाने के मामलों से निपटने के लिए राज्यों में एक एसओपी का निर्माण करने के लिए दिशानिर्देश जारी किए जाएं। वहीं राज्य इस तरह के संघर्ष होने पर वैज्ञानिक साधनों का उपयोग करना चाहिए ताकि पशु-मानव संघर्ष को कम करने का लक्ष्य प्राप्त कर सके।

याचिका के अंत में यह भी मांग की गई है कि मीडिया और संबंधित प्राधिकारियों द्वारा इस तरह की खबरों का सावधानीपूर्वक और संवेदनशील तरीके से प्रसार किया जाए, इसके लिए भी दिशानिर्देश जारी किए जाएं ताकि समाज में कोई टकराव या दुर्भावना पैदा न हो। वही उपयुक्त प्राधिकारी द्वारा पशुओं की मौत के वास्तविक आंकड़े तैयार किए जाएं,जिनको समय-समय पर अपडेट किया जाए और प्रेस विज्ञप्ति के माध्यम से जारी किया जाए ताकि फर्जी खबरों के प्रसार पर रोक लग सकें।

याचिका डाउनलोड करने के लिए यहांं क्लिक करेंं



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