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जनता की असहिष्‍णुता के कारण करवा चौथ का विज्ञापन वापस लेना पड़ाः ज‌स्टिस डीवाई चंद्रचूड़

LiveLaw News Network
1 Nov 2021 7:49 AM GMT
जनता की असहिष्‍णुता के कारण करवा चौथ का विज्ञापन वापस लेना पड़ाः ज‌स्टिस डीवाई चंद्रचूड़
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जटिस डीवाई ने शनिवार को एक कार्यक्रम में डाबर के एक विज्ञापन पर हुए हालिया विवाद पर टिप्पणी की। एक समारोह में उन्होंने कहा कि "जनता की असहिष्‍णुता" के कारण विज्ञापन को हटाना पड़ा। उल्लेखनीय है कि डाबर के विज्ञापन में लेस्‍बियन जोड़े को करवा चौथ मनाते दिखाया गया था।

राष्ट्रीय महिला आयोग के सहयोग से नालसा द्वारा कानूनी जागरूकता कार्यक्रमों के राष्ट्रव्यापी शुभारंभ के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम, जिसका विषय 'कानूनी जागरूकता के माध्यम से महिलाओं का सशक्तिकरण' था, में जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा, "आप सभी को उस विज्ञापन के बारे में पता होगा, सिर्फ दो दिन पहले जिसे एक कंपनी को हटाना था। यह एक समलैंगिक जोड़े के करवा चौथ मनाने का विज्ञापन था। इसे जनता के रोष के आधार पर वापस लेना पड़ा !"



डाबर इंडिया ने अपने प्रोडक्ट 'फेम' ब्लीच क्रीम के लिए विज्ञापन जारी किया था। लॉन्च के तुरंत बाद ही सोशल मीडिया पर एक वर्ग ने विज्ञापन का विरोध किया। मध्य प्रदेश के गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा ने डाबर इंडिया को "आपत्तिजनक" विज्ञापन वापस लेने या कानूनी कार्रवाई का सामना करने की चेतावनी दी ‌थी।

मिश्रा ने कहा था, "मैं इसे एक गंभीर मामला मानता हूं क्योंकि ऐसे विज्ञापन और क्लिपिंग केवल हिंदू त्योहारों के लिए ही बनाए जाते हैं। उन्होंने (विज्ञापन में) समलैंगिकों को करवा चौथ मनाते हुए ‌दिखाया है...भविष्य में वे दिखाएंगे दो आदमी "फेरे" ले रहे हैं (हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार एक-दूसरे से शादी कर रहे हैं)। यह आपत्तिजनक है।"

विवाद के बाद डाबर इंडिया ने विज्ञापन वापस ले लिया था और "अनजाने में लोगों की भावनाओं को आहत करने" के लिए बिना शर्त माफी मांगी थी।



जस्टिस चंद्रचूड़ ने अपने भाषण में युवाओं को लैंगिक अधिकारों के प्रति जागरूक करने की जरूरत को रेखांकित किया।

उन्होंने जोर देकर कहा कि महिलाओं के अधिकारों के बारे में कानूनी जागरूकता केवल महिलाओं के लिए एक मामला नहीं है- "जागरूकता केवल एक महिला का मुद्दा नहीं है। महिलाओं के अधिकारों के बारे में जागरूकता वास्तव में तभी सार्थक हो सकती है, जब हमारे देश में पुरुषों की युवा पीढ़ी के बीच जागरूकता पैदा की जाए। क्योंकि मेरा मानना ​​है कि महिलाओं के अधिकारों से वंचित रखे जाने का अगर हमें जवाब हल खोजना है तो पुरुषों और महिलाओं दोनों की मानसिकता में बदलाव करना होगा।"

संविधान एक परिवर्तनकारी दस्तावेज है, जो पितृसत्ता में निहित संरचनात्मक असमानताओं को दूर करने का प्रयास करता है

जस्टिस चंद्रचूड ने कहा, "हमारा संविधान एक परिवर्तनकारी दस्तावेज है, जो पितृसत्ता में निहित संरचनात्मक असमानताओं को दूर करने का प्रयास करता है। यह महिलाओं के भौतिक अधिकारों को सुरक्षित करने, उनकी गरिमा और समानता की सार्वजनिक पुष्टि करने का एक शक्तिशाली उपकरण बन गया है। महिलाओं के संवैधानिक अधिकारों को पूरा करने के लक्ष्य को पाने के लिए घरेलू हिंसा अधिनियम, कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न की रोकथाम अधिनियम जैसे कानून बनाए गए हैं। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों के रूप में अपने जीवन में हम हर दिन महिलाओं के खिलाफ अन्याय को देखते हैं। वास्तविक जीवन की स्थितियां दिखाती हैं कि कानून के आदर्शों और समाज की वास्तविक स्थिति के बीच विशाल अंतर है।"

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