3-Year Practice Rule का महिलाओं की न्यायिक सेवा में प्रवेश पर असर देखा जाना चाहिए: जस्टिस भुइयां

Praveen Mishra

24 Feb 2026 3:34 PM IST

  • 3-Year Practice Rule का महिलाओं की न्यायिक सेवा में प्रवेश पर असर देखा जाना चाहिए: जस्टिस भुइयां

    सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्जल भुइयां ने कहा है कि न्यायिक सेवा में प्रवेश के लिए तीन वर्ष की वकालत का अनुभव अनिवार्य करने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने लंबे समय से व्यक्त की जा रही चिंताओं को दूर किया है। हालांकि, उन्होंने चेतावनी दी कि इसका दूसरा पहलू भी है — विशेषकर महिला अभ्यर्थियों के लिए, जिन्हें सामाजिक दबावों के कारण करियर में बाधाओं का सामना करना पड़ सकता है।

    जस्टिस भुइयां तेलंगाना जजेस एसोसिएशन और तेलंगाना स्टेट ज्यूडिशियल अकादमी द्वारा आयोजित 'संवैधानिक नैतिकता और जिला न्यायपालिका की भूमिका' विषय पर सेमिनार में बोल रहे थे।

    अनुभव से मिलती है व्यावहारिक समझ

    उन्होंने कहा कि बार में काम करने का अनुभव केवल किताबों से आगे बढ़कर वास्तविक न्यायिक कार्य की समझ देता है।

    “न्यायिक कार्य के लिए परिपक्वता और व्यावहारिक अनुभव आवश्यक है। बार में काम करने से युवा वकील कोर्ट की अनुशासन व्यवस्था, मानवीय व्यवहार और न्यायिक जिम्मेदारी का महत्व समझते हैं। इस दृष्टि से अनुभव की शर्त जिला न्यायपालिका में आने वाले नए अधिकारियों की गुणवत्ता को मजबूत कर सकती है।”

    लेकिन शुरुआती वर्षों में कठिनाई भी

    जस्टिस भुइयां ने कहा कि वकालत के शुरुआती वर्ष बेहद चुनौतीपूर्ण और आर्थिक रूप से अनिश्चित होते हैं, खासकर उन लोगों के लिए जो स्थापित पृष्ठभूमि से नहीं आते या छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों से आते हैं।

    उन्होंने कहा कि यह स्थिति महिला अभ्यर्थियों के लिए और अधिक कठिन हो सकती है।

    महिलाओं पर पड़ सकता है प्रभाव

    उन्होंने कहा कि ग्रामीण या छोटे शहरों की महिला अभ्यर्थियों पर पारिवारिक और सामाजिक दबाव, विशेषकर विवाह के लिए, करियर में व्यवधान पैदा कर सकता है।

    “तीन वर्ष के अनुभव की शर्त का महिला अभ्यर्थियों पर क्या प्रभाव पड़ेगा, इसे सावधानी से देखना होगा। क्या इससे न्यायिक सेवा में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी प्रभावित होगी, इसका जवाब भविष्य ही देगा।”

    पृष्ठभूमि

    हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने निचली न्यायिक सेवा में प्रवेश के लिए न्यूनतम तीन वर्ष की वकालत का अनुभव अनिवार्य करने के निर्णय के खिलाफ दायर पुनर्विचार याचिकाओं पर खुली अदालत में सुनवाई की अनुमति भी दी है।

    Praveen Mishra

    Praveen Mishra

    प्रवीण मिश्रा Law Graduate हैं और लाइव लॉ हिंदी से जुड़े हैं। वे सुप्रीम कोर्ट, उच्च न्यायालयों, उपभोक्ता आयोगों और अन्य न्यायिक मंचों के महत्वपूर्ण फैसलों एवं कानूनी घटनाक्रमों पर लेखन करते हैं। उनका उद्देश्य जटिल कानूनी विषयों और न्यायिक निर्णयों को सरल, सटीक और तथ्यपरक भाषा में हिंदी पाठकों तक पहुंचाना है।

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