'जो समाज परंपराओं पर सवाल उठाने की इजाज़त नहीं देता, वह अन्यायपूर्ण प्रथाओं को नहीं सुधार सकता': जस्टिस उज्ज्वल भुइयां

  • जो समाज परंपराओं पर सवाल उठाने की इजाज़त नहीं देता, वह अन्यायपूर्ण प्रथाओं को नहीं सुधार सकता: जस्टिस उज्ज्वल भुइयां

    सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने कहा कि जो समाज परंपराओं को सवाल-जवाब से परे मानता है, वह अन्यायपूर्ण प्रथाओं को सुधारने में नाकाम रह सकता है। साथ ही, जो समाज सवाल पूछे जाने से डरता है, वहां तानाशाही पनपने का ख़तरा बढ़ जाता है। उन्होंने छात्रों के बीच वैज्ञानिक दृष्टिकोण और तार्किक सोच विकसित करने के महत्व पर ज़ोर दिया।

    मेघालय के 'यूनिवर्सिटी ऑफ़ साइंस एंड टेक्नोलॉजी' के 12वें दीक्षांत समारोह में बोलते हुए जस्टिस भुइयां ने 'कानून के शासन' (Rule of Law) के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण को ज़रूरी बताया। उन्होंने कहा कि मनमानी सत्ता अज्ञानता, डर और बिना परखे गए विश्वासों के सहारे फलती-फूलती है।

    उन्होंने कहा,

    "हाल ही में एक भाषण में,मैंने 'कानून के शासन' के संदर्भ में वैज्ञानिक दृष्टिकोण के महत्व पर बात की थी। मेरा मानना ​​है कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण ही 'कानून के शासन' की नींव रखता है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि मनमानी सत्ता अज्ञानता, डर और बिना परखे गए विश्वासों पर पनपती है। जो समाज बिना सबूत के दावों को मान लेता है, वहां अंधविश्वास और गलत जानकारी (Misinformation) फैलने का ख़तरा रहता है। जो समाज सवाल पूछे जाने से डरता है, वहां तानाशाही का ख़तरा बढ़ जाता है। और जो समाज परंपराओं पर सवाल उठाने की इजाज़त नहीं देता, वह अन्यायपूर्ण प्रथाओं को सुधारने में नाकाम रह सकता है।"

    संविधान के अनुच्छेद 51A का ज़िक्र करते हुए, जो नागरिकों से वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानवतावाद और जिज्ञासा व सुधार की भावना विकसित करने की अपेक्षा करता है, जस्टिस भुइयां ने कहा कि विश्वविद्यालयों को छात्रों में तार्किक रूप से सोचने की क्षमता विकसित करनी चाहिए और उनके युवा दिमागों को पूर्वाग्रहों से बचाना चाहिए।

    'हम' बनाम 'वे' वाली सोच को नकारें

    उन्होंने छात्रों से यह भी अपील की कि वे समाज को बांटने वाली उन धारणाओं को नकार दें, जो 'हम' बनाम 'वे' का बंटवारा पैदा करती हैं। इसके बजाय, उन्हें संविधान में निहित 'एकता' (Oneness) के विचार को अपनाना चाहिए।

    उन्होंने कहा,

    "दोस्तों, एक अधिक न्यायपूर्ण और मानवीय समाज के लिए यह ज़रूरी है कि हम 'हम' और 'वे' के विनाशकारी विभाजन से दूर हटें और एकता के विचार को अपनाएं। इसलिए हमारी सोच 'हम' और 'वे' से बदलकर 'हम' (एकता) की ओर जानी चाहिए। यूं ही नहीं, भारत के संविधान की प्रस्तावना 'हम, भारत के लोग' (We, the People of India) से शुरू होती है। संविधान भारत के किसी एक वर्ग को संबोधित नहीं करता, बल्कि यह भारत के सभी नागरिकों से संवैधानिक व्यवस्था के समान सदस्यों के रूप में बात करता है। इसलिए 'हम' की अवधारणा उन सभी लोगों को संवैधानिक रूप से एक सूत्र में पिरोती है, जिनकी पहचान भले ही अलग-अलग हो, लेकिन वे एक संवैधानिक ढांचे से जुड़े हुए हैं।"

    उन्होंने कहा कि एकता का भाव विविधता को स्वीकार करने से आता है, जो हमें एक अधिक समावेशी और सबको साथ लेकर चलने वाले समाज की ओर बढ़ने में मदद करता है। उन्होंने यह भी कहा कि विविधता हमें सिखाती है कि कोई भी राय बनाने से पहले हमें दूसरों के विचारों को सुनना चाहिए और उनका सम्मान करना चाहिए, भले ही वे हमारे विचारों से अलग हों।

    जस्टिस भुइयां ने कहा,

    "इस साझा दायरे में सीखना केवल पाठ्यपुस्तकों तक सीमित नहीं है। हम तब सीखते हैं जब हम एक-दूसरे के दृष्टिकोण का सम्मान करते हैं और उसे समझते हैं, भले ही हमारी राय अलग-अलग हो। विविधता को समझने से हमें अधिक समावेशी और सबको साथ लेकर चलने वाले समाज की ओर बढ़ने में मदद मिलेगी। अक्सर अलग-अलग दावों और सामाजिक टकरावों के कारण, हम आसानी से 'दूसरों को बाहर रखने' (Exclusiveness) के जाल में फंस जाते हैं। अनजाने में या जानबूझकर, हम एक गलत नैरेटिव—'हम' और 'वे' के विभाजन—में उलझ जाते हैं।"

    उन्होंने आगे कहा:

    "'हम' की यह संवैधानिक अवधारणा विविधता को एकता के साथ बनाए रखने में सक्षम बनाती है। इसकी खूबी यह है कि यह मतभेदों को मिटाने की कोशिश नहीं करती; बल्कि, यह एकरूपता थोपे बिना एकता को स्थापित करती है। इसमें यह ज़रूरी नहीं है कि हमारी व्यक्तिगत पहचान एक बड़े समूह में पूरी तरह विलीन हो जाए। इसलिए विविधता संवैधानिक परियोजना के लिए कोई बाधा नहीं है; बल्कि, यह इसमें जान डालती है और इसे अर्थ प्रदान करती है। यह हमें 'हम' और 'वे' के विभाजन से निकलकर 'हम' (एकता) की अवधारणा की ओर बढ़ने में मदद करती है।"

    इसी संदर्भ में, उन्होंने बताया कि विश्वविद्यालय वह जगह है, जहां विविधता का विचार पनपता है। यह एक ऐसी जगह है जहाँ लोग अपनी पृष्ठभूमि, खान-पान की आदतों और बोली जाने वाली भाषाओं से परे एक साथ आते हैं, जिससे यह विविधतापूर्ण स्थान बन जाता है।

    जस्टिस भुइयां ने कहा,

    "विश्वविद्यालय एक ऐसी जगह भी है, जहां आप अपने आस-पास की विविधता को जान सकते हैं। यहां आप अपने उन साथी छात्रों के साथ रहते हैं, जो अलग-अलग पृष्ठभूमियों से आते हैं। वे अलग-अलग भाषाएं बोलते हैं, अलग-अलग धर्मों को मानते हैं, और अलग-अलग क्षेत्रों व जातीय पृष्ठभूमियों से आते हैं। उनका पालन-पोषण, खान-पान की आदतें और सोचने का तरीका आपसे अलग हो सकता है; यहाँ तक कि उनकी सांस्कृतिक पहचान भी अलग हो सकती है। यह विविधता हमें सबसे पहले अपनी पुरानी धारणाओं को छोड़ने और फिर उन साझा मूल्यों को खोजने के लिए प्रेरित करती है जो हम सभी में समान हैं।"

    उन्होंने कहा कि यह 'बंधुत्व' (Fraternity) का सिद्धांत है, जिसे डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने संवैधानिक दृष्टिकोण का 'हृदय और आत्मा' कहा था।

    जस्टिस भुइयां ने अपनी बात समाप्त करते हुए 'सार्वजनिक विचार-विमर्श' (Public Reasoning) के महत्व पर जोर दिया।

    उन्होंने नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन का हवाला देते हुए कहा,

    "सार्वजनिक विचार-विमर्श हमें यह समझने में मदद कर सकता है कि दुनिया भर में बहुत से लोग जिन गंभीर अभावों से जूझ रहे हैं, उन्हें कम करने या पूरी तरह खत्म करने के लिए क्या किया जा सकता है।"

    उन्होंने कहा कि सार्वजनिक विचार-विमर्श की आदत एक स्वस्थ और भागीदारीपूर्ण लोकतंत्र का मूल आधार है। साथ ही, हमारे पास जागरूक नागरिक होने चाहिए, जो तभी संभव है जब सूचना तक पहुँचने का रास्ता पूरी तरह खुला हो और जानकारी का स्वतंत्र प्रवाह हो।

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