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नागरिकों के स्वतंत्र भाषण को आपराधिक मामलों में फंसाकर दबाया नहीं जा सकता : सुप्रीम कोर्ट

LiveLaw News Network
26 March 2021 5:12 AM GMT
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Supreme Court of India

इस देश के नागरिकों के स्वतंत्र भाषण को आपराधिक मामलों में फंसाकर दबाया नहीं जा सकता है, जब तक कि इस तरह के भाषण में सार्वजनिक व्यवस्था को प्रभावित करने की प्रवृत्ति न हो, सर्वोच्च न्यायालय ने शिलांग टाइम्स की संपादक पेट्री़शिया मुखीम द्वारा मेघालय में गैर-आदिवासी लोगों पर हिंसा के खिलाफ फेसबुक पोस्ट पर दर्ज एफआईआर को खारिज करते हुए टिप्पणी की।

जस्टिस एल नागेश्वर और जस्टिस एस रवींद्र भट की पीठ ने कहा कि फेसबुक पोस्ट मेघालय के मुख्यमंत्री, पुलिस महानिदेशक और क्षेत्र के डोरबोर शनॉन्ग द्वारा उन दोषियों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं करने के लिए दिखाई गई उदासीनता के खिलाफ थी जिन्होंने गैर-आदिवासी युवाओं पर हमला किया।

अदालत ने कहा कि सरकारी निष्क्रियता की अस्वीकृति को विभिन्न समुदायों के बीच नफरत को बढ़ावा देने के प्रयास के रूप में नहीं लिया जा सकता है।

अदालत ने मुखीम द्वारा दायर अपील को मेघालय उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौती देने की वाली याचिका को अनुमति दी जिसने प्राथमिकी को रद्द करने की उनकी याचिका खारिज कर दी थी। भारतीय दंड संहिता की धारा 153 ए और 505 (1) (सी) का उल्लेख करते हुए, पीठ ने कहा कि केवल जहां लिखित या बोले गए शब्दों में सार्वजनिक अव्यवस्था या कानून और व्यवस्था की गड़बड़ी या सार्वजनिक शांति को प्रभावित करने की प्रवृत्ति है, कानून द्वारा इस तरह की गतिविधि को रोकने के लिए कदम उठाने की जरूरत है। पीठ ने यह कहा:

अव्यवस्था या लोगों को हिंसा के लिए उकसाने का इरादा धारा 153 ए आईपीसी के तहत अपराध की योग्यता है और अभियोजन को सफल होने के लिए मन: स्थिति के अस्तित्व को साबित करना होगा।

धारा 153 ए आईपीसी के तहत अपराध का सार विभिन्न वर्गों के लोगों के बीच दुश्मनी या घृणा की भावनाओं को बढ़ावा देना है। इस आशय को मुख्य रूप से लेखन के हिस्से की भाषा और उन परिस्थितियों से जाना जाता है जिनमें यह लिखा और प्रकाशित किया गया था।

धारा 153 ए के दायरे में शिकायत में सारी बात को समग्र रूप से पढ़ा जाना चाहिए। कोई भी आरोप साबित करने के लिए शब्द की कठोरता और अलग मार्ग पर भरोसा नहीं कर सकता है और न ही वास्तव में एक वाक्य यहां से और एक वाक्य वहां से लिया जा सकता है और उन्हें अनुमानात्मक तर्क की एक सावधानीपूर्वक प्रक्रिया द्वारा जोड़ा कर सकता है।

मुखीम द्वारा की गई फेसबुक पोस्ट का हवाला देते हुए, पीठ ने कहा कि मेघालय राज्य में रहने वाले गैर-आदिवासियों की सुरक्षा और उनकी समानता के लिए उनकी प्रबल दलील को, किसी भी तरह की कल्पना से, हेट स्पीच के रूप में वर्गीकृत नहीं किया जा सकता है।

पीठ ने कहा,

"ज्यादा से ज्यादा, फेसबुक पोस्ट को मेघालय राज्य में गैर-आदिवासियों के खिलाफ भेदभाव को उजागर करने के लिए समझा जा सकता है। हालांकि, अपीलकर्ता ने स्पष्ट किया कि आपराधिक तत्वों का कोई समुदाय नहीं है और बास्केटबॉल खेलने वाले गैर-आदिवासी नौजवानों पर हुए क्रूर हमले में जिन व्यक्तियों ने अभद्रता की थी उनके खिलाफ तत्काल कार्रवाई की जानी चाहिए।फेसबुक पोस्ट मेघालय राज्य में गैर-आदिवासियों की समानता के लिए अपनी संपूर्णता में पढ़ा जाना है। हमारी समझ में, वर्ग / समुदाय में सामुदायिक घृणा को बढ़ावा देने के लिए अपीलकर्ता की ओर से कोई इरादा नहीं था। चूंकि अपीलकर्ता द्वारा किसी समुदाय के लोगों को किसी भी हिंसा में शामिल होने के लिए उकसाने का कोई प्रयास नहीं किया गया है, इसलिए धारा 153 ए और 505 (1) (सी) के तहत अपराध के मूल तत्व सामने नहीं आए हैं। एफआईआर या शिकायत में लगाए गए आरोप, भले ही उन्हें उनके अंकित मूल्य पर लिया गया हो और उनकी संपूर्णता में स्वीकार किया गया हो, प्रथम दृष्ट्या किसी अपराध का गठन नहीं करते हैं या आरोपी के खिलाफ मामला नहीं बनाते हैं, एफआईआर रद्द करने के उत्तरदायी है।"

पीठ ने विशेष रूप से कनाडा के सर्वोच्च न्यायालय [सस्केचेवान (मानवाधिकार आयोग) बनाम व्हाटकोट] के एक फैसले का उल्लेख किया, जिसमें "घृणा" की व्याख्या करने में एक व्यावहारिक दृष्टिकोण बताया गया है, जिसका उपयोग हेट स्पीच को प्रतिबंधित करने वाले विधायी प्रावधानों में किया जाता है।

यह नोट किया गया:

"अदालतों के लिए पहला परीक्षण हेट स्पीच के निषेध को निष्पक्ष रूप से लागू करने के लिए था और ऐसा करने में, यह पूछे जाने पर कि क्या एक उचित व्यक्ति, संदर्भ और परिस्थितियों से अवगत है, अभिव्यक्ति को घृणा से संरक्षित समूह को उजागर करने के रूप में देखेगा। दूसरा परीक्षण विधायी शब्द "घृणा" की व्याख्या को "घृणा" और "वशीकरण" शब्दों द्वारा वर्णित भावनाओं की चरम अभिव्यक्तियों तक सीमित करना था।यह बोलने को फ़िल्टर और संरक्षित करेगा जो प्रतिकूल और अपमानजनक हो सकता है, लेकिन प्रतिनिधिकरण और अस्वीकृति घृणा के स्तर को उकसाते नहीं है, जो भेदभाव या चोट का कारण बनती है। तीसरा परीक्षण न्यायालयों के लिए था कि वे इस मुद्दे पर अभिव्यक्ति के प्रभाव पर अपने विश्लेषण पर ध्यान केंद्रित करें, चाहे वह लक्षित व्यक्ति या समूह द्वारा दूसरों से घृणा करने की संभावना हो। केवल व्यक्त किए गए विचारों में दंड को आकर्षित करने वाले अपराध का गठन अपर्याप्त है। "

अपील की अनुमति देते समय, न्यायालय ने कहा:

भारत एक मिश्रित और बहुसांस्कृतिक समाज है। स्वतंत्रता का वादा, प्रस्तावना में अभिनीत, विभिन्न प्रावधानों में खुद को प्रकट करता है जो प्रत्येक नागरिक के अधिकारों को रेखांकित करता है; उन्हें भारत की लंबाई और चौड़ाई में स्वतंत्र रूप से यात्रा करने और स्वतंत्र रूप से बसने (ऐसे वाजिब प्रतिबंधों के अधीन हो सकते हैं, जो वैध हैं ) के अधिकार को शामिल किया गया है। ऐसे समय में, जब इस तरह के अधिकार के वैध अभ्यास में, लोग यात्रा करते हैं, एक जगह से जाकर एक जगह पर बसते हैं या जाते हैं, जहां वे परिस्थितियों को अनुकूल पाते हैं, वहां नाराजगी हो सकती है, खासकर अगर ऐसे नागरिक समृद्ध होते हैं, जिससे शत्रुता या संभवतः हिंसा होती है। ऐसे मामलों में, यदि पीड़ित अपने असंतोष को आवाज़ देते हैं, और बोलते हैं, खासकर अगर राज्य के अधिकारी आंखें मूंद लेते हैं, या अपने पैरों को खींचते हैं, तो असंतोष का ऐसा स्वर वास्तव में पीड़ा के लिए रोता है, न्याय से इनकार करने पर - या देरी। इस मामले में ऐसा ही प्रतीत होता है।

केस: पेट्रिशिया मुखीम बनाम मेघालय राज्य [सीआरए 141 / 2021 ]

पीठ : जस्टिस एल नागेश्वर और जस्टिस एस रवींद्र भट

वकील : अपीलकर्ता के लिए एडवोकेट वृंदा ग्रोवर, राज्य के लिए एडवोकेट अविजित मणि त्रिपाठी

उद्धरण: LL 2021 SC 182

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