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'स‌िक्योरिटी के रूप में जारी किया गया चेक', अन्य सबूतों के अभाव में बचाव का आधार नहीं हो सकताः सुप्रीम कोर्ट

LiveLaw News Network
15 Feb 2020 6:38 AM GMT
स‌िक्योरिटी के रूप में जारी किया गया चेक, अन्य सबूतों के अभाव में बचाव का आधार नहीं हो सकताः सुप्रीम कोर्ट
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सुप्रीम कोर्ट ने माना है कि यह बचाव कि चेक, सिक्योरिटी के रूप में जारी किया गया था, अन्य सबूतों के अभाव में अनुमान का खंडन करने के लिए विश्वसनीय नहीं है।

जस्टिस अशोक भूषण और ज‌स्टिस एमआर शाह की पीठ ने दोहराया कि जब एक बार चेक का निर्गमन स्वीकार कर लिया गया हो और चेक पर हस्ताक्षर भी स्वीकार कर लिए गया हो, तब शिकायतकर्ता के पक्ष में हमेशा एक अनुमान होता है कि कानूनी रूप से प्रवर्तनीय ऋण या देयता मौजूद है और उसके बाद यह अभियुक्तों पर है कि वह अनुमान को सबूतों के जरिए खंडित करें।

इस मामले में, अभियुक्त ने स्वीकार किया था कि चेक जारी किया गया था, लेकिन वह सिक्योरिटी के लिए जारी किया गया था और शिकायतकर्ता ने चेक का दुरुपयोक कर उससे करोबार के बकाये की वसूली की। ट्रायल कोर्ट और हाई कोर्ट ने आरोपी को बरी कर दिया था।

हालांकि शिकायतकर्ता की अपील पर सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने रिहाई के आदेश के समवर्ती निष्कर्षों को रद्द करते हुए कहा-

‌‌इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कि आरोपी ने चेक जारी करने और चेक पर अपना हस्ताक्षर होने को स्वीकार किया है और प्रश्न 17 में शामिल चेक, पहले चेक के अस्वीकृत होने के बाद, दूसरी बार जारी किया गया था, और यह भी कि आरोपी के अनुसार कुछ राशि बकाया थी और देय थी, एनआई एक्ट की धारा 139 के तहत एक अनुमान है कि यहां कानूनी रूप से प्रवर्तनीय ऋण या देयता मौजूद है। बेशक ऐसे अनुमान अपनी प्रकृति में खंडनीय हैं।

हालांकि, अनुमान के खंडन के लिए अभियुक्त को सबूत पेश करने की आवश्यकता थी कि शिकायतकर्ता को देय राशि का पूरा भुगतान किया जा चुका है। मौजूदा मामले में, अभियुक्तों ने ऐसा कोई भी सबूत पेश नहीं किया। अभियुक्तों की सफाई की कि चेक स‌िक्योरिटी के रूप में दिया गया था, अनुमान के खंडन के लिए अन्य सबूतों के अभाव में भरोसे के योग्य नहीं है और विशेष रूप से विचाराधीन चेक, पहले चेक के अस्वीकृत ‌हो जाने के बाद, दूसरी बार जारी किया गया था, इसलिए, दोनों ‌निचली अदालतों ने अनुमान, कि एनआई एक्‍ट की धारा 139 के अनुसार कानूनी रूप से प्रवर्तनीय ऋण या देयता मौजूद है, को शिकायतकर्ता के पक्ष में ठीक से मूल्यांकन करने और समझने में ठोस रूप से ग़लती की। ऐसा प्रतीत होता है कि दोनों अदालतों ने, ट्रायल कोर्ट के साथ-साथ हाईकोर्ट ने, ऋण या देयता को साबित करने का बोझ शिकायतकर्ता पर डालने की त्रुटि की है, वह भी एनआई एक्ट की धारा 139 के तहत दिए 18 पूर्वानुमानों का मूल्यांकन किए बिना।

एक्ट की धारा 139 रिवर्स ओनस क्लॉज का एक उदाहरण है और इसलिए एक बार, जबकि चेक का निर्गमन और चेक पर हस्ताक्षर स्वीकार कर लिया गया हो, हमेशा शिकायतकर्ता के पक्ष में यह अनुमान होता है कि मामले में कानूनी रूप से प्रवर्तनीय ऋण या देयता मौजूद है और इसके बाद यह अभियुक्तों पर है कि वो ऐसे अनुमान का सबूतों के माध्यम से खंडन करें।

बसालिंगप्पा बनाम मुदीबसप्पा, (2019) 5 एससीसी 418 के मामले पर भरोसा करते हुए, अभियुक्त ने तर्क दिया कि जैसा कि इस अदालत ने उक्त मामले में दिए फैसले में कहा है कि एक बार अभियुक्त की ओर से संभावित बचाव के बाद, वित्तीय क्षमता और अन्य तथ्यों को साबित करने का बोझ शिकायतकर्ता पर आ जाता है।

इस पर, पीठ ने कहा-

"हमारी राय है कि उक्त निर्णय मौजूदा मामले पर लागू नहीं किया जाएगा और/ या इससे आरोपी की किसी भी प्रकार की मदद नहीं होगी। उस मामले में, अभियुक्त ने बचाव किया था कि शिकायतकर्ता ने आरोपी को चेक राशि ऋण के माध्यम से दी थी। जब एनआई एक्ट की धारा 138 के तहत कार्यवाही शुरू की गई ‌थी, तब अभियुक्तों ने ऋण देयता से इनकार कर दिया था और अभियुक्तों ने शिकायतकर्ता की वित्तीय क्षमता पर सवाल उठाया था। इसलिए जब शिकायतकर्ता अपनी वित्तीय क्षमता साबित करने में विफल रहा, अदालत संतुष्ट हुई थी कि अभियुक्त के पास संभावित बचाव है और परिणामस्वरूप, शिकायतकर्ता को अपनी वित्तीय क्षमता साबित करने में विफल रहने पर, अभियुक्त को बरी कर दिया।

वर्तमान मामले में, अभियुक्त ने शिकायतकर्ता की वित्तीय क्षमता पर कभी सवाल नहीं उठाया। हमारा विचार है कि जब भी अभियुक्त ने, अपने संभाव‌ित बचाव में, शिकायतकर्ता की वित्तीय क्षमता पर सवाल उठाया है, एनआई अधिनियम की धारा 139 के तहत कानूनी रूप प्रवर्तनीय ऋण के अनुमान के बावजूद और ऐसे अनुमान खंडनीय हैं, इसके बाद भी अपनी वित्तीय क्षमता साबित करने का दबाव एक बार फिर शिकायतकर्ता पर आ जाता है और उस अवस्था में शिकायतकर्ता को अपनी वित्तीय क्षमता साबित करने के लिए साक्ष्य पेश करने की आवश्यकता होती है, विशेष रूप से तब जब जब यह नकद के जरिए ऋण देने और उसके बाद चेक जारी करने का मामला होता है। यहां वह मामला नहीं है।"

केस टाइटल: एपीएस फॉरेक्स सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड बनाम ‌शक्ति इंटरनेशनल फैशन लिंकर्स

केस नं: CRIMINAL APPEAL NO 271 Of 2020 J

कोरम: जस्टिस अशोक भूषण और जस्टिस एमआर शाह

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