न्याय को समझदारी भरा बनाने के लिए कोर्टरूम के अनुभव और एकेडमिक स्कॉलरशिप दोनों की ज़रूरत': CJI सूर्यकांत

  • न्याय को समझदारी भरा बनाने के लिए कोर्टरूम के अनुभव और एकेडमिक स्कॉलरशिप दोनों की ज़रूरत: CJI सूर्यकांत

    चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्य कांत ने कहा कि न्याय को समझदारी भरा बनाने के लिए कोर्टरूम के अनुभव और एकेडमिक स्कॉलरशिप (शैक्षणिक अध्ययन) दोनों की ज़रूरत होती है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि कोर्टरूम फ़ैसले तो सुनाते हैं, लेकिन वे फ़ैसले सिर्फ़ फ़ाइल तक सीमित नहीं रहते। फ़ाइल बंद होने के बाद भी वे लोगों की ज़िंदगी पर असर डालते हैं। यहीं पर एकेडमिक स्कॉलरशिप यह पता लगाती है कि क्या सच में न्याय हुआ है या नहीं।

    उन्होंने कहा,

    "कोर्टरूम केस देखता है, जबकि एकेडेमिया पैटर्न देखता है। और अगर न्याय को समझदारी भरा और सही होना है, तो दोनों की ज़रूरत है।"

    "जजिंग विद कम्पैशन: ह्यूमन अंडरस्टैंडिंग इन द प्रैक्टिस ऑफ़ लॉ" (संवेदना के साथ न्याय: कानून के अभ्यास में मानवीय समझ) विषय पर दूसरे प्रोफ़ेसर (डॉ.) एन.आर. माधव मेनन मेमोरियल लेक्चर को संबोधित करते हुए CJI ने कहा कि अदालतें मुआवज़ा देने का आदेश तो दे सकती हैं, लेकिन स्कॉलरशिप ही इन सब चीज़ों को एक साथ लाती है और यह अध्ययन करती है कि अच्छे इरादे वाले फ़ैसले से कौन पीछे छूट गया है।

    CJI ने कहा,

    "कोई भी एक केस पूरी तस्वीर नहीं दिखाता; यहीं पर स्कॉलरशिप बहुत ज़रूरी हो जाती है। स्कॉलर ही पीड़ित का कोर्टरूम के बाहर भी पीछा करता है और यह देखता है कि क्या दिया गया मुआवज़ा असल में मिला, क्या पीड़ित परिवार को ज़रूरी मदद मिली, और क्या पीड़ितों की बात सच में सुनी गई, जैसा कि प्रोफ़ेसर मेनन हमेशा कहते थे।"

    साथ ही CJI ने कहा कि रिसर्च स्कॉलरशिप को असलियत से अलग नहीं होना चाहिए। इसी बात को आगे बढ़ाते हुए जज ने संवेदना के साथ न्याय करने की ज़रूरत पर भी ज़ोर दिया। उन्होंने कहा कि संवेदना के साथ न्याय करने का मतलब यह नहीं है कि अदालत पार्टियों पर कोई एहसान कर रही है; इसका मतलब बस इतना है कि वह केस के पीछे की पूरी मानवीय स्थिति को समझ रही है, जो शायद सिर्फ़ तथ्यों और कानूनों में उलझा हुआ लग सकता है।

    CJI ने कहा कि संवेदना हमारे न्याय तंत्र के उन "अदृश्य पीड़ितों" तक भी पहुंचनी चाहिए, जैसे जेंडर-बेस्ड हिंसा से बचे लोग, विचाराधीन कैदी का परिवार, या कोई दिव्यांग व्यक्ति। उन्होंने बताया कि उनमें से कई लोगों के लिए न्याय एक लंबी यात्रा जैसा लगता है क्योंकि उन्हें अक्सर मुश्किल प्रक्रियाओं से गुज़रना पड़ता है। उदाहरण के लिए, किसी सर्वाइवर को विटनेस बॉक्स में अपने ट्रॉमा को फिर से जीना पड़ सकता है, या कोई ऐसा मुक़दमा लड़ने वाला व्यक्ति जिसे कार्यवाही की भाषा समझ नहीं आती।

    उन्होंने कहा कि यहीं पर संवेदनशील वकीलों की भूमिका अहम हो जाती है।

    चीफ जस्टिस ने कहा,

    "इस प्रक्रिया का ज़्यादातर हिस्सा जज के फ़ाइल देखने से पहले ही तय हो जाता है, जिससे मैं चौथे सवाल पर आता हूँ: वकालत का काम। संवेदनशील वकील, जो अक्सर किसी व्यक्ति से उसकी ज़िंदगी के सबसे मुश्किल दौर में मिलते हैं, साफ़-साफ़ सलाह देते हैं, कभी भी उस कमज़ोरी का फ़ायदा नहीं उठाते और उन लोगों के लिए भी समय निकालते हैं जो फ़ीस नहीं दे सकते।"

    अपनी बात खत्म करते हुए CJI ने कहा कि सिर्फ़ कोर्टरूम और वकीलों में संवेदना जगाना काफ़ी नहीं होगा, जब तक कि सिस्टम को ही संवेदनशील न बनाया जाए। उदाहरण के लिए, सिस्टम को संवेदनशील बनाया जा सकता है अगर पुलिस स्टेशन में ही लोगों को कानूनी मदद मिले, या ऐसी जगहें हों जहाँ बच्चा या सर्वाइवर आरोपी का सामना किए बिना गवाही दे सके। या मुक़दमा लड़ने वाले लोग अपनी भाषा में कोर्ट और फ़ैसलों तक पहुँच सकें।

    CJI ने अंत में कहा,

    "आख़िरकार, हर फ़ैसला दो बार किया गया अनुवाद होता है: एक इंसानी कहानी जिसे कानून की भाषा में बदला जाता है। साथ ही कानून जिसे वापस इंसानी ज़िंदगी में बदला जाता है। संवेदना बस इस बात का अनुशासन है कि इन दोनों सफ़रों में कोई भी ज़रूरी चीज़ छूट न जाए।"

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