सुप्रीम कोर्ट में PIL: छात्र प्रदर्शनकारियों पर बल प्रयोग के लिए दिल्ली पुलिस और CAPF अधिकारियों के खिलाफ FIR की मांग
Shahadat
26 July 2026 10:52 PM IST

सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका (PIL) दायर की गई। इसमें दिल्ली पुलिस और केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (CAPF) के जवानों के खिलाफ FIR दर्ज करने की मांग की गई। आरोप है कि इन्होंने 'कॉकरोच जनता पार्टी' (CJP) के बुलावे पर 20 जुलाई से दिल्ली के जंतर-मंतर पर केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे छात्रों पर ज़रूरत से ज़्यादा बल का इस्तेमाल किया।
याचिका में इन घटनाओं की स्वतंत्र जांच, CCTV फुटेज, बॉडी-कैमरा रिकॉर्डिंग और अन्य इलेक्ट्रॉनिक सबूतों को सुरक्षित रखने के साथ-साथ घायल प्रदर्शनकारियों को मुआवज़ा देने की भी मांग की गई।
याचिका में कहा गया कि NEET-UG पेपर लीक के खिलाफ और परीक्षा प्रणाली में व्यापक सुधार की मांग को लेकर शांतिपूर्ण ढंग से प्रदर्शन कर रहे छात्रों पर पुलिस ने ज़रूरत से ज़्यादा सख़्त कार्रवाई की। इसमें लाठीचार्ज, मारपीट, आंसू गैस का इस्तेमाल और गैर-कानूनी हिरासत जैसी बातें शामिल हैं। इसमें यह भी आरोप लगाया गया है कि सादे कपड़ों में आए अज्ञात लोगों ने पुलिस की मौजूदगी में प्रदर्शनकारियों के साथ मारपीट की, जिसकी स्वतंत्र जांच होनी चाहिए।
याचिकाकर्ता ने लगभग 100 वीडियो, तस्वीरों और अन्य इलेक्ट्रॉनिक सामग्री वाली एक पेन ड्राइव रिकॉर्ड पर रखी है। उनका दावा है कि इन सबूतों में कथित पुलिस हिंसा, प्रदर्शनकारियों पर हमले, हिरासत और प्रदर्शन के दौरान हुई अन्य घटनाएं कैद हैं। याचिका में सभी इलेक्ट्रॉनिक सबूतों - जैसे CCTV फुटेज, ड्रोन फुटेज, बॉडी-कैमरा रिकॉर्डिंग, पुलिस वायरलेस लॉग, तैनाती के आदेश और सोशल मीडिया वीडियो - को सुरक्षित रखने के निर्देश देने की मांग की गई है, ताकि सबूतों को नष्ट या उनसे छेड़छाड़ न की जा सके।
याचिका में ज़रूरत से ज़्यादा बल प्रयोग के आरोपों की स्वतंत्र न्यायिक जांच या किसी स्वतंत्र एजेंसी से जांच कराने की मांग की गई। साथ ही इसमें यह भी मांग की गई कि प्रदर्शनकारियों पर हमले में शामिल कथित सादे कपड़ों वाले लोगों की पहचान और जांच की जाए, जहां संज्ञेय अपराध (cognisable offences) का पता चले वहां FIR दर्ज की जाए और गैर-कानूनी या ज़रूरत से ज़्यादा बल प्रयोग के कारण घायल हुए लोगों को मुआवज़ा और चिकित्सा सहायता दी जाए।
यह याचिका 20 जुलाई से 24 जुलाई, 2026 के बीच हुए प्रदर्शनों की मीडिया रिपोर्टों पर आधारित है। साथ ही इसमें पुलिस का पक्ष भी बताया गया है कि कुछ प्रदर्शनकारियों ने पत्थरबाज़ी की और पुलिसकर्मियों पर हमले किए।
याचिका में कहा गया कि इन दोनों पक्षों की बातों की CCTV, बॉडी-कैमरा फुटेज और अन्य इलेक्ट्रॉनिक सबूतों के ज़रिए स्वतंत्र रूप से जांच की जानी चाहिए। याचिकाकर्ता का कहना है कि पुलिस की कार्रवाई ज़रूरत से ज़्यादा और हालात के हिसाब से अनुचित थी। इसके लिए वे 'इन री रामलीला मैदान इंसिडेंट' और 'अनीता ठाकुर बनाम जम्मू-कश्मीर राज्य' मामलों में सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला दे रहे हैं।
याचिकाकर्ता सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के लिए ऐसे नियम (स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर) बनाने और लागू करने का निर्देश भी चाहते हैं, जो शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शनों के दौरान पुलिस की कार्रवाई को सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों के मुताबिक नियंत्रित करें।
याचिकाकर्ता की ओर से वकील नरेंद्र मिश्रा पेश हुए हैं। उन्होंने पिछले हफ़्ते CJI को एक पत्र लिखकर पुलिस की कार्रवाई पर स्वतः संज्ञान (suo motu cognizance) लेने का अनुरोध किया था।
22 जुलाई को मिश्रा ने CJI सूर्यकांत के सामने अपने पत्र का ज़िक्र किया था, लेकिन चीफ जस्टिस ने उसे लिस्ट करने से इनकार किया था। बाद में चीफ जस्टिस ने साफ़ किया कि उन्होंने मामले को लिस्ट करने से इसलिए इनकार किया था क्योंकि उनके सामने कोई ठीक से दायर याचिका नहीं थी।
शुक्रवार को CJI इसी मुद्दे को उठाने वाली दो अन्य याचिकाओं को सोमवार (27 जुलाई) को लिस्ट करने के लिए सहमत हो गए।


