जम्मू-कश्मीर परिसीमन कार्रवाई को चुनौती: सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को एक सप्ताह में जवाबी हलफनामा नहीं दायर करने जुर्माना लगाने की चेतावनी दी

Avanish Pathak

30 Aug 2022 9:54 PM IST

  • सुप्रीम कोर्ट, दिल्ली

    सुप्रीम कोर्ट

    2020, 2021 और 2022 की अधिसूचनाओं के अनुसार केंद्र शासित प्रदेश जम्मू और कश्मीर में किए गए परिसीमन कार्रवाई के खिलाफ दायर एक याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को केंद्र सरकार को जवाबी हलफनामा दाखिल नहीं करने के लिए फटकार लगाई, जबकि ऐसा करने के लिए कोर्ट पहले ही केंद्र सरकार को 6 सप्ताह का समय दे चुका है।

    सुप्रीम कोर्ट ने 13 मई 2022 को याचिका पर नोटिस जारी करते हुए केंद्र सरकार, केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर और चुनाव आयोग से अपना जवाब दाखिल करने को कहा था।

    जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस एएस ओका ने संकेत दिया कि कोर्ट केवल इसलिए जुर्माना नहीं लगा रहा है क्योंकि केंद्र सरकार की ओर से पेश हुए युवा वकील ने उसे आश्वासन दिया था कि एक सप्ताह के भीतर जवाबी हलफनामा दायर किया जाएगा। हालांकि, यह स्पष्ट किया गया कि यदि मांगे गए समय के भीतर जवाबी हलफनामा दाखिल नहीं किया जाता है, तो इसे रिकॉर्ड में लाने के लिए 25,000 रुपये सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री में जमा करना होगा।

    मंगलवार को शुरू में, याचिकाकर्ता के वकील सीनियर एडवोकेट रविशंकर जंध्याला ने पीठ को अवगत कराया कि हालांकि केंद्र सरकार को पिछली सुनवाई की अंतिम तिथि से 6 सप्ताह के भीतर अपना जवाबी हलफनामा दाखिल करना था, लेकिन उन्होंने अभी तक दायर नहीं किया है। उन्होंने दावा किया कि इस बीच वे परिसीमन के आधार पर चुनाव के लिए आगे बढ़ रहे हैं जो चुनौती के अधीन है।

    जस्टिस कौल ने कहा,

    "आप (केंद्र सरकार) समय पर हलफनामा दाखिल नहीं करते हैं। अगर मैं एक साल भी कहूं, तो भी आप समय पर हलफनामा दाखिल नहीं करेंगे।"

    एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड श्रीराम परकीट के माध्यम से दायर याचिका में दावा किया गया है कि परिसीमन अधिसूचना, जिसने 2011 की जनगणना के आधार पर जम्मू-कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश में परिसीमन की प्रक्रिया को करने का निर्देश दिया था, असंवैधानिक है क्योंकि जम्मू और कश्मीर में 2011 में कोई भी कोई जनगणना नहीं की गई थी।

    याचिका में यह भी तर्क दिया गया कि परिसीमन आयोग के पास जनप्रतिनिधित्व एक्ट, 1950 की धारा 9(1)(बी) और परिसीमन एक्ट 2022 की धारा 11(1)(बी) के तहत कार्रवाई की शक्ति नहीं है।

    तर्क दिया गया है कि परिसीमन एक्ट 2002 की धारा 3 के तहत परिसीमन आयोग की स्थापना नहीं की जा सकती है क्योंकि यह 2007 में अनुपयुक्त हो गया था जब आयोग को बंद कर दिया गया था और जिसके बाद 2008 में संसदीय और विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन आदेश जारी किया गया था। चूंकि परिसीमन पूरा हो गया है और परिसीमन आयोग अनुपयुक्त हो गया है, उत्तरदाता अब इस कार्रवाई को करने के लिए सक्षम नहीं हैं। 2002 में जम्मू और कश्मीर संविधान में 29 वें संशोधन ने 2026 के बाद तक जम्मू-कश्मीर में परिसीमन प्रक्रिया को रोक दिया है। याचिका में कहा गया है कि भले ही भारत के संविधान का अनुच्छेद 170 इंगित करता है कि अगला परिसीमन 2026 के बाद ही किया जाना है। केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर में परिसीमन प्रक्रिया न केवल मनमानी है, बल्कि संविधान के मूल ढांचे का भी उल्लंघन है।

    याचिका में जम्मू और कश्मीर के केंद्र शासित प्रदेश में 107 से 114 (पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में 24 सीटों सहित) सीटों की संख्या में वृद्धि को संविधान के अनुच्छेद 81, 82, 170, 330 और 332 और जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन एक्ट, 2019 की धारा 63 के तहत चुनौती दी गई है।

    इस बात पर जोर दिया गया है कि संबंधित जनसंख्या के अनुपात में परिवर्तन नहीं होना भी यूटी एक्ट की धारा 39 का उल्लंघन है। 2004 को जारी विधानसभा और संसदीय निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन के लिए

    दिशानिर्देशों और कार्यप्रणाली के अनुसार, एनसीआर और पांडिचेरी के केंद्र शासित प्रदेशों सहित सभी राज्यों की विधानसभाओं में मौजूदा सीटों की कुल संख्या 1971 की जनगणना के आधार पर तय की गई थी, जिसे वर्ष 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना तक अपरिवर्तित रहना था।

    अनुच्छेद 370 के निरस्त होने के बाद, 06.03.2020 को केंद्र सरकार, कानून और न्याय मंत्रालय ने परिसीमन अधिनियम, 2002 की धारा 3 के तहत शक्ति का प्रयोग करते हुए, जम्मू-कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश और असम, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर और नागालैंड राज्य में विधानसभा और संसदीय क्षेत्रों के परिसीमन के लिए एक अधिसूचना जारी की।

    03.03.2021 की अधिसूचना द्वारा 2020 की अधिसूचना में संशोधन किया गया है। परिसीमन आयोग को एक और वर्ष के लिए बढ़ा दिया गया था और असम, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर और नागालैंड राज्यों को उक्त अधिसूचना के दायरे से बाहर कर दिया गया था। 21.02.2022 को, एक अन्य अधिसूचना के माध्यम से परिसीमन आयोग की अवधि को 06.03.2022 से आगे 2 महीने के लिए बढ़ा दिया गया था।

    मामले की अगली सुनवाई 29 सितंबर, 2022 को की जानी है।

    केस टाइटल: हाजी अब्दुल गनी खान और अन्य बनाम यूनियन ऑफ इंडिया और अन्य WP(C) No 237 of 2022

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