CBI ने मणिपुर हिंसा मामले में दो आरोपियों की ज़मानत रद्द करने के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया
Shahadat
24 March 2026 7:45 PM IST

सेंट्रल ब्यूरो ऑफ़ इन्वेस्टिगेशन (CBI) ने सुप्रीम कोर्ट में अर्ज़ी दाख़िल कर उन दो लोगों की ज़मानत रद्द करने की मांग की, जिन पर 2023 में मणिपुर में हुए जातीय संघर्ष के दौरान गैंगरेप और महिलाओं को नग्न अवस्था में घुमाने का आरोप है।
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की बेंच ने इस मामले की सुनवाई की और CBI की अर्ज़ी पर नोटिस जारी करते हुए आरोपियों से जवाब मांगा। बेंच ने पीड़ितों को मुफ़्त कानूनी सहायता उपलब्ध कराने का भी निर्देश दिया।
इस मामले की सुनवाई एक तीसरे आरोपी द्वारा ज़मानत के लिए दायर अन्य अर्ज़ी के साथ की गई; इस आरोपी की ज़मानत की अर्ज़ी को हाईकोर्ट ने पहले ही ख़ारिज किया था। इस मामले में पहले ही नोटिस जारी किया जा चुका था।
सुनवाई के दौरान, CBI के SPP DP सिंह ने कोर्ट को बताया कि इस मामले में लगाए गए आरोप गैंगरेप, हत्या और महिलाओं को नग्न अवस्था में घुमाने से जुड़े हैं। इसके बावजूद, 2 साल की प्री-ट्रायल हिरासत (मुकदमे से पहले की हिरासत) को आधार बनाकर ज़मानत दी गई। उन्होंने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि हाई कोर्ट ने खुद यह माना था कि ये आरोप बेहद गंभीर और चौंकाने वाले हैं। दूसरी ओर, तीसरे मामले (जिसमें पहले ही नोटिस जारी किया जा चुका था) में पीड़ितों की ओर से पेश हुए वकील निज़ाम पाशा ने पीड़ितों के लिए कानूनी सहायता वकील नियुक्त न किए जाने का मुद्दा उठाया।
संक्षेप में मामला
2023 में 4 मई का एक दिल दहला देने वाला वीडियो सामने आया था, जिसमें मणिपुर में चल रहे जातीय संघर्ष के बीच दो महिलाओं को नग्न अवस्था में घुमाते हुए और उनके साथ यौन हिंसा करते हुए दिखाया गया। 20 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले का स्वतः संज्ञान (Suo Motu Cognizance) लिया और केंद्र तथा राज्य सरकारों से उन कदमों के बारे में जानकारी मांगी, जो दोषियों को सज़ा दिलाने के लिए उठाए गए।
तत्कालीन CJI ने स्वतः संज्ञान लेते हुए कहा,
"कल जो वीडियो सामने आए, जिनमें मणिपुर में दो महिलाओं को नग्न अवस्था में घुमाते हुए दिखाया गया, उन्हें देखकर हम बेहद विचलित हैं। हम अपनी गहरी चिंता व्यक्त करते हैं। अब समय आ गया है कि सरकार इस मामले में हस्तक्षेप करे और ठोस कार्रवाई करे। यह बिल्कुल भी स्वीकार्य नहीं है।"
अगस्त 2023 में, तत्कालीन CJI DY चंद्रचूड़, जस्टिस JB पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की बेंच ने जस्टिस गीता मित्तल (जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट की पूर्व चीफ जस्टिस) की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय एक समिति का गठन किया। इस समिति को जातीय संघर्ष के दौरान महिलाओं के ख़िलाफ़ हुई हिंसा की जांच करने का ज़िम्मा सौंपा गया। कमेटी से मेडिकल और मनोवैज्ञानिक देखभाल, राहत कैंपों में गरिमा और मुआवज़े के लिए उपाय सुझाने को कहा गया; इसमें NALSA और SALSA के ज़रिए आर्थिक मुआवज़ा भी शामिल था। उसे पीड़ितों को मुआवज़ा बांटने का काम भी सौंपा गया था और उसे 2 महीने में कोर्ट को अपनी रिपोर्ट सौंपनी थी।
इसके अलावा, कोर्ट ने महाराष्ट्र के पूर्व DGP दत्तात्रेय पडसलगीकर को CBI और राज्य पुलिस द्वारा की जा रही जांच की निगरानी के लिए नियुक्त किया। उन्हें SIT बनाने के लिए डेपुटेशन पर अधिकारियों को लेने, राहत कैंपों का दौरा करने और यौन अपराध के मामलों में सुरक्षा उपायों को लागू करने का अधिकार दिया गया।
खास बात यह है कि झड़पों के दौरान महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा से जुड़ी 11 FIRs CBI को सौंप दी गईं और असम में मुकदमा चल रहा है। सितंबर, 2025 में दो आरोपियों (प्रतिवादियों) को गुवाहाटी हाईकोर्ट ने ज़मानत दी; ज़ाहिर तौर पर उनके 2 साल के ट्रायल से पहले के हिरासत में रहने को ध्यान में रखते हुए यह फैसला लिया गया।
ज़मानत के इस आदेश को चुनौती देते हुए CBI ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया।
Case Title: CENTRAL BUREAU OF INVESTIGATION Versus ARUN KHUNDONGBAM @NANAO, Diary No. 7602-2026; THE CENTRAL BUREAU OF INVESTIGATION Versus NAMEIRAKPAM KIRAN MEITEI, Diary No. 7619-2026

