सरकारी दस्तावेजों पर भरोसा करने वाले फ्लैट खरीदारों को दंडित नहीं किया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट का निर्देश - गिराने से पहले वैकल्पिक जगह दें

  • सरकारी दस्तावेजों पर भरोसा करने वाले फ्लैट खरीदारों को दंडित नहीं किया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट का निर्देश - गिराने से पहले वैकल्पिक जगह दें

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जिन लोगों ने सरकारी अनुमति और आधिकारिक राजस्व रिकॉर्ड पर भरोसा करके फ्लैट खरीदे हैं, उन्हें सरकारी अधिकारियों की गलतियों का खामियाजा नहीं भुगतना पड़ना चाहिए। कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार को निर्देश दिया है कि 'जल निकाय' (Water Body) के रूप में वर्गीकृत जमीन पर बने 20 फ्लैटों को गिराने से पहले, उनके मालिकों को कोई वैकल्पिक जगह दी जाए।

    जस्टिस एसवीएन भट्टी और जस्टिस एनवी अंजारिया की बेंच ने तमिलनाडु के मुख्य सचिव और तिरुवल्लुर के जिला कलेक्टर को निर्देश दिया है कि वे विवादित जमीन (0.22 एकड़) पर बने इन फ्लैटों को गिराने की प्रक्रिया शुरू करने से पहले, फ्लैट मालिकों की सोसाइटी को उतनी ही कीमत की कोई खाली जमीन आवंटित करें। यह काम छह महीने के भीतर हो जाना चाहिए।

    कोर्ट ने पाया कि अधिकारियों ने इस तरह से निर्माण की अनुमति दी और राजस्व रिकॉर्ड में बदलाव किए, जिससे खरीदारों को यह विश्वास हो गया कि यह संपत्ति कानूनी रूप से खरीदने के लिए उपलब्ध है।

    कोर्ट ने कहा,

    "इन अनुमतियों/आदेशों की वजह से खरीदार को यह भरोसा हो गया कि संपत्ति खरीदने के लिए उपलब्ध है और इस पर कोई आपत्तिजनक उपयोग नहीं हो रहा है।"

    बेंच ने आगे कहा कि संपत्ति खरीदते समय ईमानदार खरीदार आमतौर पर राजस्व रिकॉर्ड और टाउन सर्वे रिकॉर्ड में दी गई जानकारी पर भरोसा करता है।

    कोर्ट ने कहा,

    "सरकार अपनी सुविधा के हिसाब से जमीन की प्रकृति बदल देती है।"

    कोर्ट एक फ्लैट मालिक और तमिलनाडु मर्केंटाइल बैंक लिमिटेड द्वारा दायर अपीलों पर सुनवाई कर रहा था। इन अपीलों में मद्रास हाई कोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी गई, जिसमें विवादित जमीन पर दिए गए 'रयोतवारी पट्टा' (Ryotwari Patta) रद्द करने और वहां बने अवैध निर्माणों को गिराने के आदेश को सही ठहराया गया।

    मामले की पृष्ठभूमि

    यह विवाद तिरुवल्लुर जिले के तिरुमुलैवोयल गांव में सर्वे नंबर 572 की 0.72 एकड़ जमीन से जुड़ा है। 1911 के पुनर्सर्वेक्षण और पुनर्वास रजिस्टर (Resurvey and Resettlement Register) में इस जमीन को "सरकारी पोरामबोके - कनकन कुट्टई" (Government Poramboke - Kanakkan Kuttai) के रूप में वर्गीकृत किया गया था। 2011 में, तिरुवल्लुर के जिला राजस्व अधिकारी ने पी. रामादोस को 0.72 एकड़ जमीन का 'रयोतवारी पट्टा' (Ryotwari Patta) दे दिया। उन्होंने इस जमीन को जल निकाय (Water Body) के बजाय 'रयोती' (खेती योग्य) जमीन मान लिया था।

    इसके बाद रामादोस ने 3.40 करोड़ रुपये का कर्ज लेने के लिए इस जमीन को तमिलनाडु मर्केंटाइल बैंक के पास गिरवी रख दिया। जमीन के 0.22 एकड़ हिस्से को उनकी पत्नी के नाम कर दिया गया, जिन्होंने एक बिल्डर के पक्ष में 'पावर ऑफ अटॉर्नी' (Power of Attorney) जारी की।

    बिल्डर ने इस जमीन पर 20 आवासीय फ्लैट बनाए और उन्हें अलग-अलग खरीदारों को बेच दिया। साथ ही, जमीन में उनका हिस्सा भी उन्हें दे दिया गया।

    2014 में एक तीसरे पक्ष ने 'लैंड एडमिनिस्ट्रेशन कमिश्नर' (Commissioner of Land Administration) के सामने इस पट्टे को चुनौती दी। दिसंबर 2019 में, कमिश्नर ने पट्टा रद्द कर दिया। उन्होंने पाया कि यह जमीन सरकारी जल निकाय के रूप में दर्ज थी, इसलिए इसे पट्टे पर देना गैर-कानूनी था।

    बाद में मद्रास हाईकोर्ट ने भी पट्टा रद्द करने का फैसला सही ठहराया। कोर्ट ने 1.68 एकड़ के पूरे इलाके से अवैध निर्माण हटाने और जल निकाय को उसकी पुरानी स्थिति में बहाल करने का आदेश दिया।

    फ्लैट मालिकों और बैंक ने हाई कोर्ट के इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।

    सरकारी अधिकारियों ने निर्माण को मंजूरी दी

    सुप्रीम कोर्ट ने गौर किया कि नगर निगम (Municipal Authorities) ने अपार्टमेंट के बिल्डिंग प्लान को मंजूरी दी थी। वहीं, राजस्व विभाग ने 'टाउन सर्वे लैंड रजिस्टर' में बदलाव किया था और विवादित जमीन के बंटवारे (Subdivision) को भी मंजूरी दे दी थी।

    कोर्ट ने कहा कि इन सरकारी कदमों की वजह से खरीदारों को यह मानने का पूरा अधिकार था कि यह जमीन किसी भी कानूनी अड़चन से मुक्त है।

    बेंच ने जोर देकर कहा कि जल निकायों की रक्षा करना सरकार की जिम्मेदारी है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि सरकार अपने ही अधिकारियों की गलतियों से बेकसूर खरीदारों को होने वाली परेशानी को अनदेखा कर दे।

    कोर्ट ने कहा कि अगर फ्लैट मालिकों की परेशानियों और जमीन मालिक या डेवलपर के खिलाफ उनके कानूनी विकल्पों पर विचार किए बिना ही तोड़फोड़ (Demolition) का आदेश दे दिया जाए तो इससे उन्हें भारी आर्थिक नुकसान होगा और कई परिवार बेघर हो जाएंगे।

    इसलिए पट्टा रद्द करने के फैसले में दखल देने से इनकार करते हुए कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि तोड़फोड़ की कार्रवाई शुरू करने से पहले वे प्रभावित लोगों को कोई दूसरी जगह (Alternative Site) उपलब्ध कराएं।

    कोर्ट ने कहा,

    “फ्लैट मालिकों को यह विश्वास दिलाया गया कि 1948 के अधिनियम की धारा 14-A के तहत सरकार की इसमें कोई दिलचस्पी नहीं है। इसलिए, फ्लैट मालिकों की कठिनाइयों और जमीन के मालिक तथा अपार्टमेंट डेवलपर के खिलाफ कानून में उन्हें उपलब्ध विकल्पों पर विचार किए बिना फ्लैटों को गिराने का आदेश देना उन्हें भारी आर्थिक नुकसान पहुंचाएगा और परिवारों को सड़क पर ला देगा। इस मामले की परिस्थितियों को देखते हुए संभावित कठिनाइयों को कम करने और 1948 के अधिनियम की धारा 14-A का उल्लंघन किए बिना, हम तमिलनाडु राज्य के मुख्य सचिव और तिरुवल्लुर के जिला कलेक्टर को निर्देश देते हैं कि वे सोसाइटी द्वारा प्रतिनिधित्व किए जा रहे फ्लैट मालिकों को कोई खाली और उपयुक्त जगह आवंटित करें (कोशिश करें कि यह आज से 6 महीने के भीतर हो जाए)। इसके बाद 0.22 एकड़ क्षेत्र में बने निर्माण को गिराने की कार्रवाई की जाए।”

    जल निकायों (Water Bodies) पर कोई पट्टा नहीं दिया जा सकता

    हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने पट्टा रद्द किए जाने के खिलाफ अपीलकर्ताओं की चुनौती को खारिज कर दिया।

    कोर्ट ने माना कि पुराने राजस्व और बंदोबस्त रिकॉर्ड से पता चलता है कि विवादित जमीन को सरकारी जल निकाय के रूप में वर्गीकृत किया गया। अपीलकर्ता यह साबित नहीं कर पाए कि यह 'रयोती' (Ryoti) जमीन थी, जिस पर 'रयोतवारी' (Ryotwari) पट्टा दिया जा सकता हो।

    खंडपीठ ने 'तमिलनाडु एस्टेट्स (एबोलिशन एंड कन्वर्जन इनटू रयोतवारी) एक्ट, 1948' की धारा 14-A का हवाला दिया। यह धारा निजी तालाबों या 'ऊरानी' (Ooranis) पर रयोतवारी पट्टा देने से रोकती है और ऐसी जमीनों पर दिए गए पट्टों को रद्द करने का प्रावधान करती है।

    कोर्ट ने इस तर्क को भी खारिज किया कि शहरी विकास योजना के तहत जमीन को 'मिश्रित आवासीय क्षेत्र' (Mixed Residential Zone) घोषित करने से उसकी कानूनी स्थिति बदल गई।

    कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आवासीय विकास की अनुमति देने वाले ज़ोनिंग नियम, 'पोराम्बोके' (Poramboke - सरकारी) जमीनों या जल निकायों पर सरकार के अधिकारों को खत्म नहीं करते हैं।

    कोर्ट ने अपीलों को खारिज किया और तमिलनाडु सरकार को निर्देश दिया कि अपार्टमेंट गिराने से पहले फ्लैट मालिकों को कोई वैकल्पिक जगह आवंटित की जाए (कोशिश करें कि यह छह महीने के भीतर हो जाए)। इसमें यह भी स्पष्ट किया गया कि फ्लैट मालिक और बैंक, डेवलपर, ज़मीन मालिक या बंधक रखने वाले (मॉर्गेजर) के खिलाफ उचित कानूनी कार्रवाई कर सकते हैं।

    इसके अलावा, कोर्ट ने राज्य सरकार को यह छूट दी कि वह रिकॉर्ड और जल निकायों (Water Bodies) को बनाए रखने में विफल रहने वाले दोषी अधिकारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू कर सकती है या उसे पूरा कर सकती है।

    इस प्रकार, कोर्ट ने पट्टा रद्द करने के फैसले को बरकरार रखते हुए अपीलों को खारिज किया।

    Case Title : S. GURURAJ VERSUS THE ADDITIONAL CHIEF SECRETARY/ COMMISSIONER OF LAND ADMINISTRATION AND OTHERS (with connected cases)

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