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महिला अधिकारों के बारे में जागरूकता तभी सार्थक हो सकती है, जब यह जागरूकता युवा पुरुषों के बीच पैदा होः जस्टिस चंद्रचूड़

LiveLaw News Network
1 Nov 2021 7:11 AM GMT
महिला अधिकारों के बारे में जागरूकता तभी सार्थक हो सकती है, जब यह जागरूकता युवा पुरुषों के बीच पैदा होः जस्टिस चंद्रचूड़
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जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने नालसा द्वारा आयोजित कानूनी जागरूकता कार्यक्रमों के राष्ट्रव्यापी शुभारंभ के अवसर पर कहा, "महिलाओं की एक समूह या वर्ग के रूप में पहचान नहीं है। एक वर्ग के रूप में महिलाओं के भीतर कई पहचान हैं...। हमारे लिए यह महत्वपूर्ण है कि जिस भेदभाव और हिंसा का सामना महिलाएं करती हैं, उसे समझने के लिए एक इंटरसेक्‍शनल अप्रोच होना चाहिए।"

नालसा ने राष्ट्रीय महिला आयोग के सहयोग से कानूनी जागरूकता कार्यक्रमों का आयोजन किया है, मौजूदा कार्यक्रम का विषय 'कानूनी जागरूकता के माध्यम से महिलाओं का सशक्तिकरण' था।

ज‌स्टिस चंद्रचूड़ ने हाल में ‌दिए एक फैसले का उल्‍लेख किया, जिसमें उन्होंने अनुसूचित जाति की महिलाओं के खिलाफ हो रहे भेदभाव को देखा था। उन्होंने कहा कि जब एक महिला से उसकी पहचान के साथ ही जाति, वर्ग, धर्म, विकलांगता और यौन ओरिएंटेशन जैसी पहचान जुड़ती हैं तो उसे दो या अधिक कारणों से हिंसा और भेदभाव का सामना करना पड़ सकता है। उदाहरण के लिए ट्रांसवुमन को उनकी विषमलैंगिक पहचान के कारण हिंसा का सामना करना पड़ सकता है।

जस्टिस चंद्रचूड ने कहा, "हमारा संविधान एक परिवर्तनकारी दस्तावेज है, जो पितृसत्ता में निहित संरचनात्मक असमानताओं को दूर करने का प्रयास करता है। यह महिलाओं के भौतिक अधिकारों को सुरक्षित करने, उनकी गरिमा और समानता की सार्वजनिक पुष्टि करने का एक शक्तिशाली उपकरण बन गया है। महिलाओं के संवैधानिक अधिकारों को पूरा करने के लक्ष्य को पाने के लिए घरेलू हिंसा अधिनियम, कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न की रोकथाम अधिनियम जैसे कानून बनाए गए हैं। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों के रूप में अपने जीवन में हम हर दिन महिलाओं के खिलाफ अन्याय को देखते हैं। वास्तविक जीवन की स्थितियां दिखाती हैं कि कानून के आदर्शों और समाज की वास्तविक स्थिति के बीच विशाल अंतर है।"

जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि महिलाओं के लिए ऐसे कानून है, जो महिलाओं के लिए अधिकार का निर्माण करते हैं, जिन्हें संविधान मान्यता देता है और जो संपत्ति और उत्तराधिकार के मामलों तक विस्तारित होते हैं, कार्यस्थल तक विस्तारित होते हैं, कार्यस्थल में प्रवेश करने और कार्यस्थल में महिलाओं की रक्षा करने के लिए विस्तारित होते हैं। लेकिन महिलाओं के लिए कानूनी जागरूकता फैलाना महत्वपूर्ण है कि वे कार्यस्थल पर कैसे पहुंच सकती हैं।

उन्होंने कहा, "वे सेना में कैसे शामिल हो सकती हैं? सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में महिलाओं के लिए सशस्त्र बलों में शामिल होने का दरवाजा खोल दिया है। लेकिन एक महिला सशस्त्र बलों तक कैसे पहुंचती है? वह सशस्त्र बलों की सदस्य कैसे बनती है? वह कैसे एक न्यायिक अधिकारी बन जाती है? इसलिए महिलाओं के कार्यस्थल में प्रवेश करने के इन रास्तों के बारे में कानूनी जागरूकता फैलानी होगी।"

उन्होंने बताया कि खाद्य सुरक्षा अधिनियम महिला को घर के मुखिया के रूप में मान्यता देता है- "खाद्य सुरक्षा के अधिकार को सुविधाजनक बनाने के लिए एक महिला घर की मुखिया हो सकती है। जब मैं इलाहाबाद हाईकोर्ट का चीफ जस्टिस था, हमने माना था कि यह अधिकार एक ट्रांसजेंडर महिला तक विस्तारित होना चाहिए, जिसे खाद्य सुरक्षा अधिनियम के उद्देश्य के लिए घर के मुखिया के रूप में भी पहचाना जाना चाहिए।"

जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि महिलाओं के लिए कानून ने जो अधिकार बनाए हैं, उन्हें पुरुषों के वर्चस्व को कायम रखने का बहाना नहीं बनना चाहिए- "इसलिए जब महिलाओं को देश भर की विधानसभाओं में राजनीतिक प्रतिनिधित्व दिया गया है तो यह एक पुरुष के लिए बहाना नहीं बनना चाहिए जो एक महिला के पीछे खड़ा है और वास्तव में बड़े पैमाने पर लोगों का प्रतिनिधि होने के महिला के अधिकार पर पितृसत्तात्मक प्रभुत्व का दावा कर रहा है!"

उन्होंने जोर देकर कहा कि महिलाओं के अधिकारों के बारे में कानूनी जागरूकता केवल महिलाओं के लिए एक मामला नहीं है- "जागरूकता केवल एक महिला का मुद्दा नहीं है। महिलाओं के अधिकारों के बारे में जागरूकता वास्तव में तभी सार्थक हो सकती है, जब हमारे देश में पुरुषों की युवा पीढ़ी के बीच जागरूकता पैदा की जाए। क्योंकि मेरा मानना ​​है कि महिलाओं के अधिकारों से वंचित रखे जाने का अगर हमें जवाब हल खोजना है तो पुरुषों और महिलाओं दोनों की मानसिकता में बदलाव करना होगा।"

जस्टिस चंद्रचूड़ ने स्वीकार किया कि हमारा समाज पुरुषों और महिलाओं के बीच श्रम के यौन विभाजन द्वारा चिह्नित है, और श्रम का यह यौन विभाजन हमारे समाज में पितृसत्तात्मक व्यवस्था का आधार है।

"श्रम के इस विभाजन को स्वाभाविक माना जाता है- महिलाओं को अपने परिवारों में प्यार से अवैतनिक घरेलू श्रम करना पड़ता है! एक बहुत ही प्रतिष्ठित विद्वान निवेदिता मेनन ने कहा है कि श्रम का यौन विभाजन केवल काम को विभाजित करने की एक तकनीक नहीं है बल्कि यह इस तथ्य को छुपाता है कि पुरुषों के काम को मानवीय माना जाता है ,जबकि महिलाओं के काम को प्रकृति द्वारा निर्धारित माना जाता है।"

जस्टिस चंद्रचूड़ ने बताया कि उनके अपने निजी जीवन पर तीन महिलाओं का प्रभाव है- "सबसे पहले, मेरी मां प्रभा चंद्रचूड़ जी हैं। मेरी मां का जन्म 1924 में हुआ था। हालांकि मैं उन्हें आज के संदर्भ में एक नारीवादी के रूप में वर्णित नहीं कर सकता, मुझे याद है कि बचपन में , हम एक मराठी नाटक देखने गए थे जिसका शीर्षक था 'आइ रिटायर होटे', जिसमें दर्शाया गया था कि अगर मां सेवानिवृत्त हो जाती है, तो परिवार को किन परिस्थितियों का सामना करना पड़ता। मेरी मां ने मुझे तब बताया था कि एक मां सेवानिवृत्त होती है और इसमें जो सच्चाई है, मुझे कभी नहीं भूलना चाहिए ... दूसरी महिला जिसने मेरे जीवन को बहुत प्रभावित किया है, वह थी, जिसने हमारे घर में 40 से अधिक वर्षों तक सेवा की। वह एक बहुत छोटे परिवार से आई थी। वह शायद अनपढ़ थी। लेकिन उसकी सोचने की प्रक्रिया, उसके विचार, उसकी राय एक शिक्षित व्यक्ति से कम नहीं थी। 1960, 1965 में, वह पूछती थी कि 'भले ही हम घर पर काम करते हैं, क्या हमारे लिए भविष्य निधि नहीं होनी चाहिए? क्या हमारे लिए कर्मचारियों का बीमा नहीं होना चाहिए? '...तीसरी महिला मेरी पत्नी कल्पना दास जी हैं, जो एक नारीवादी हैं सही अर्थों में और जो सुप्रीम कोर्ट के जज के रूप में मेरे काम में महत्वपूर्ण योगदान देता है। मेरी उनसे कई बार कई विषयों पर बातचीत हुई है; उनकी सोच, उनके विचारों ने कई मौकों पर मेरे निजी जीवन को प्रभावित किया है।"

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