Begin typing your search above and press return to search.
ताजा खबरें

सभी अदालतों को विकलांग वकीलों के लिए सक्रिय वातावरण बनाने की दिशा में प्रयास करना चाहिएः जस्टिस चंद्रचूड़

LiveLaw News Network
5 Dec 2020 11:02 AM GMT
सभी अदालतों को विकलांग वकीलों के लिए सक्रिय वातावरण बनाने की दिशा में प्रयास करना चाहिएः जस्टिस चंद्रचूड़
x

जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने गुरुवार को कहा, "सभी अदालतों को विकलांग वकीलों के लिए एक सक्रिय वातावरण बनाने की दिशा में भी प्रयास करना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट और देश के सभी उच्च न्यायालयों में समान अवसर कक्ष होने चा‌‌हिए... हमारे बेंचमार्क परिणाम को दर्शाते हैं।"

वह विकलांग विधिक पेशेवरों के तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय शिखर सम्मेलन के समापन सत्र में बोल रहे थे। कानूनी पेशे में विकलांगों को पेश आने वाली चुनौतियों से निपटने के उपायों पर, उन्होंने सुझाव दिया, "सबसे पहले, सबमिशन की छपाई और स्कैनिंग की आवश्यकता के बजाय, डिफ़ॉल्ट स्थिति यह होनी चाहिए कि वकील पीडीएफ दस्तावेजों को फाइल करने में सक्षम रहें। दस्तावेजों की स्कैनिंग और छपाई निरर्थक और समय लेने वाली है। इसके अलावा, उन्होंने डिजिटल हस्ताक्षरों के उपयोग की सिफारिश की और हस्ताक्षर केवल पेपर बुक के अंतिम पेज पर करने की आवश्यकता है।"

उन्होंने कहा, "दूसरी बात यह है कि अंधे वकीलों को लिखित सबमिशन दाखिल करना सौ फीसदी सुलभ हो, मुझे यह कहते हुए खुशी हो रही है कि मेरे कोर्ट रूम में ऐसा है। अब उद्देश्य यह है कि सभी प्रकार की फालिंग को इसमें शामिल किया जाए और सभी अदालतों तक इसका विस्तार किया जाए।"

जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि तीसरी बात यह है कि जिन दस्तावेजों को स्कैन करने की आवश्यकता है, उन्हें स्‍केन करने के लिए बहुत उच्च गुणवत्ता के 300 डॉट्स प्रति इंच स्कैन का उपयोग किया जाना चाहिए। और स्टांप और वॉटरमार्क को पन्‍नों पर इस प्रकार रखा जाना चाहिए कि, वे दस्तावेजों को पढ़ने में बाधा न उत्पन्न करें।

उन्होंने आगे कहा कि चौथा मुद्दा यह कि फाइलिंग को सुलभ बनाने की जिम्‍मेदारी को विकलांग वकीलों पर नहीं रखी जा सकती है- "यह ऐसी है कि विदेशी भाषा में एक फ़ाइल देने में सक्षम वकील को अंग्रेजी में अनुवाद के लिए दी जााए। हमें इसकी आवश्यकता है। इसके बजाय यह सुनिश्चित करने के लिए कि संस्थागत सिस्टम हो जो पहुंच को सुनिश्चित करे।"

इसके अलावा, विकलांग वकीलों के लिए केस हस्तक्षेप द्वारा केस की तलाश के लिए या उनके लिए पूरी तरह से एक अलग प्रणाली होने के बजाय, जज ने सुझाव दिया कि मौजूदा फाइलिंग प्रथाओं को उनकी जरूरतों पर विचार करने की जरूरत है। "मैंने राहुल (उनके लॉ क्लर्क) और बॉम्बे में एक अन्य वकील से नेशनल इंफॉर्मेटिक्स सेंटर के साथ जुड़ने का अनुरोध किया। उन्होंने हर शुक्रवार को बैठक के लिए मीटिंग शेड्यूल तैयार किया है ताकि वे उन मुद्दों की पहचान कर सकें, जिनका वह सामना करते हैं, जिससे भविष्य के लिए एक स्‍थायी समाधान निकाला जा सके....

जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि अदालत की वेबसाइटों को और अधिक सुलभ बनाने की आवश्यकता है।

"डिजिटल प्रौद्योगिकी के प्रयोग से वास्तव में बाराबरी नहीं होगी, वास्तव में, यह असमानता को और अधिक बढ़ा सकता है, यदि इसे पहुंच को ध्यान में रखकर नहीं बनाया गया। कभी-कभी विकलांगों के लिए कोर्ट की वेबसाइटों तक पहुंच बनाना ऐसे होता है, जैसे वे एक पैर और एक हाथ से तैराकी कर रहे हों।", उन्होंने सुझाव दिया कि जो वेबसाइटें जानकारी तक पहुंचने के लिए दृश्य कैप्चा का उपयोग करती हैं, उन्हें पाठ-आधारित कैप्चा का उपयोग करना चाहिए। निर्णयों और आदेशों के प्रत्येक पन्ने पर वॉटरमार्क का उपयोग करने का चलन समाप्त किया जाना चाहिए। सभी वेबसाइटों में तारीखों का चयन करने के लिए स्पष्ट रूप से लेबल वाले बटन और कैलेंडर होने चाहिए।"

ऑनलाइन डेटाबेस को अधिक सुलभ और विकलांग-अनुकूल बनाने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा‌, कोर्टरूम को माइक और स्पीकर्स से लैस करने की जरूरत है, इसके अलावा साज-सज्जा भी ऐसी होनी चाहिए ताकि गूंज खत्म हो सके।

उन्होंने कहा, "अदालतों को विकलांग व्यक्तियों के अधिकारों की धारा 21 के साथ अधिनियम 2016 का पालन करना चाहिए और समान अवसर नीति तैयार करनी चाहिए, इसके अलावा धारा 23 के अनुपालन में शिकायत निवारण अधिकारियों की नियुक्ति और विकलांग वकीलों और कर्मचारियों के सदस्यों के सामने आने वाली चुनौतियों पर संवेदीकरण सत्र आयोजित करना चाहिए।"

जस्टिस चंद्रचूड़ ने इस दिशा में सर्वोच्च न्यायालय की ई-समिति द्वारा उठाए गए विभिन्न कदमों की चर्चा करते हुए अपनी बात की शुरूआत की, जिसमें ऑनलाइन फैसले का विकल्प भी शामिल है, जो विकलांग-केंद्रित और समावेशी है। उन्होंने कहा, "भले ही यह मुफ़्त है, लेकिन यह किसी भी तरह से इसकी गुणवत्ता को कम नहीं करता है।"

उन्होंने हर सरकारी विभाग में 2016 के अधिनियम के अनुसार 3% आरक्षण के कार्यान्वयन की बात की और यह सुनिश्चित करने के लिए कहा कि कि इन सभी विभागों द्वारा एक आदर्श पहचान प्रक्रिया शुरू की जाती है। इसके बाद, उन्होंने मोबिलिटी उपकरणों पर जीएसटी लगाने के संबंध में एक मामले को हरी झंडी दिखाने की मांग की।

जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि विकलांग व्यक्तियों की आवश्यकताओं के लिए संविधान में एकमात्र स्पष्ट संदर्भ अनुच्छेद 41 में है- "राज्य अपनी आर्थिक क्षमता और विकास की सीमा के भीतर, बेरोजगारीख्‍ वृद्धावस्था, बीमारी और विकलांगता के मामलों में काम पाने, शिक्षा और सार्वजनिक सहायता पाने के अधिकार को सुनिश्‍चित करने के लिए प्रभावी प्रावधान करेगा।"

उन्होंने कहा कि तथ्य यह है कि इसे इस सूची में रखना, यह दर्शाता है कि संविधान एक सामाजिक समस्या से अधिक स्वास्थ्य और कल्याण के मुद्दे के रूप में इसे लागू करता है। अनुच्छेद 15 (1) में विकलांगता को नहीं शामिल करना, आलोचना के घेरे में था, यह दर्शाता है कि संविधान इसे इसका वैध बकाया नहीं देता है।

अनुच्छेद 19 में छह स्वतंत्रताओं की बात करते हुए, उन्होंने समझाया कि विकलांग व्यक्ति को स्वतंत्र रूप से आने जाने में सक्षम होने के लिए, "हमें सुगम ट्रांसपोर्ट सुव‌िधाओं और रेलेव स्टेशन, रैंप, ब्रेल साइनेज की आवश्यकता है। व्यापार और पेशे की स्वतंत्रता का आनंद लेने में सक्षम होने के लिए बराबरी की आवश्यकता है, जहां कोई बुनियादी ढांचा और अन्य बाधाएं नहीं हो और रूढ़ियों को चुनौती देने में सक्षम हों ताकि हर कोई उत्पादक योगदान दे सके।"

जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा, "प्रकृति जो छीनती है, उसका मुआवजा अनूठे तरीके से देती है।"

Next Story