पति-पत्नी के बीच 'सिविल विवाद' का परिवार के खिलाफ आपराधिक मामले में बदलना, सख्त न्यायिक जांच की मांग करता है: कलकत्ता हाईकोर्ट
Shahadat
28 Aug 2026 9:20 PM IST

कलकत्ता हाईकोर्ट ने कहा कि वैवाहिक विवाद कभी-कभी उस "नाजुक सीमा को पार कर सकते हैं, जो सिविल विवाद को परेशान करने वाले आपराधिक मुकदमों से अलग करती है"। एक जीवनसाथी द्वारा सिविल कानूनी उपाय अपनाने के बाद पूरे विस्तारित परिवार के खिलाफ गंभीर सजा वाले आपराधिक मामले शुरू करने के लिए "सख्त न्यायिक जांच" की आवश्यकता होती है।
जस्टिस उदय कुमार ने यह टिप्पणी तब की, जब उन्होंने पति और उसके विस्तारित परिवार के कई सदस्यों के खिलाफ बलात्कार, क्रूरता, मारपीट, आपराधिक विश्वासघात, आपराधिक धमकी और दहेज से जुड़े अपराधों के आरोपों वाली आपराधिक कार्यवाही रद्द करने से इनकार किया।
हालांकि, कोर्ट ने कहा कि ऐसी जांच हाईकोर्ट को CrPC की धारा 482 के तहत अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करते हुए 'मिनी-ट्रायल' करने या तथ्यों से जुड़े विवादित सवालों का आकलन करने की अनुमति नहीं देती है।
कोर्ट पति और उसके परिवार के सदस्यों द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें इको पार्क पुलिस स्टेशन के केस नंबर 168/2023 से जुड़ी चार्जशीट नंबर 214/2023 रद्द करने की मांग की गई। चार्जशीट में IPC की धारा 498A, 323, 376, 406, 506, 109 और 34 तथा दहेज निषेध अधिनियम की धारा 3 और 4 लगाई गईं।
याचिकाकर्ता-पति और शिकायतकर्ता-पत्नी की शादी 17 अप्रैल, 2022 को हुई थी और बाद में 12 मई, 2022 को मैरिज रजिस्ट्रार के पास इसका रजिस्ट्रेशन कराया गया।
पति के अनुसार, पत्नी 15 मई, 2022 को अपनी बीमार बहन से मिलने के बहाने ससुराल से चली गई और उसके बाद अलग होने की मांग करते हुए लौटने से इनकार किया।
हालांकि, पत्नी ने आरोप लगाया कि उसे शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना का शिकार बनाया गया और 10 मई, 2022 को उसके जीजा ने उसका यौन उत्पीड़न किया। उसने दावा किया कि इन्हीं हालात के कारण आखिरकार उसे ससुराल छोड़ना पड़ा।
इसके बाद पति ने क्रूरता और साथ छोड़कर चले जाने (डेजर्शन) के आधार पर शादी खत्म करने के लिए वैवाहिक कार्यवाही शुरू की। उन्होंने 30 मई, 2023 को बारासात के ज़िला जज के सामने MAT केस नंबर 1153/2023 दायर किया।
इसके बाद पत्नी ने 18 जुलाई, 2023 को इको पार्क पुलिस स्टेशन में लिखित शिकायत दर्ज कराई, जिसके आधार पर आपराधिक मामला दर्ज किया गया।
जांच के बाद पुलिस ने पति और उसके परिवार के कई सदस्यों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की।
हाईकोर्ट में याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि आपराधिक कार्यवाही वैवाहिक मामले के जवाब में दुर्भावनापूर्ण तरीके से शुरू की गई और इसका मकसद पति और उसके परिवार को परेशान करना था।
यह बताया गया कि जीजा द्वारा कथित यौन उत्पीड़न 10 मई, 2022 को हुआ, जबकि शिकायतकर्ता ने ठीक दो दिन बाद, 12 मई को पति के साथ अपनी शादी के औपचारिक पंजीकरण में हिस्सा लिया था।
याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि इस स्थिति के कारण अभियोजन पक्ष का मामला स्वाभाविक रूप से अविश्वसनीय हो जाता है।
उन्होंने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि आपराधिक शिकायत पत्नी को वैवाहिक मामले में समन मिलने के बाद ही दर्ज कराई गई।
'हरियाणा राज्य बनाम भजन लाल' मामले का हवाला देते हुए याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि कार्यवाही स्पष्ट रूप से दुर्भावनापूर्ण थी और बदला लेने के गलत मकसद से शुरू की गई।
हाईकोर्ट ने इस तर्क को खारिज किया कि याचिकाकर्ताओं द्वारा बताई गई घटनाओं का क्रम कार्यवाही को शुरुआती चरण में ही रद्द करने का आधार बनता है।
कोर्ट ने देखा कि पुलिस ने जांच की थी और आरोपी के खिलाफ कई सबूतों के साथ चार्जशीट दाखिल की थी।
इनमें CrPC की धारा 164 के तहत दर्ज पीड़िता का बयान, CrPC की धारा 161 के तहत गवाहों के बयान, ज़ब्ती की लिस्ट और मेडिकल दस्तावेज़ शामिल है।
कप्तान सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का ज़िक्र करते हुए कोर्ट ने कहा कि एक बार जब जांच के बाद चार्जशीट दाखिल हो जाती है तो हाईकोर्ट अपनी इनहेरेंट ज्यूरिस्डिक्शन (अंतर्निहित अधिकार क्षेत्र) का इस्तेमाल करते हुए सबूतों को तौल नहीं सकता या मिनी-ट्रायल नहीं कर सकता।
कोर्ट ने माना कि यौन उत्पीड़न और शादी के रजिस्ट्रेशन के बीच कथित 48 घंटे का अंतर, जिन हालात में पत्नी ने ससुराल छोड़ा और तलाक की कार्यवाही के मुकाबले आपराधिक शिकायत का समय - ये सभी सबूतों के मूल्यांकन (एविडेंशियरी एप्रिसिएशन) के मामले हैं।
कोर्ट ने कहा,
"बचाव पक्ष का अलीबाई (घटना के समय कहीं और होने का दावा), तारीखों में विसंगतियां... और सिविल वैवाहिक मुकदमे के मुकाबले आपराधिक शिकायत का समय - ये सभी सबूतों के मूल्यांकन के मुख्य मामले हैं।"
कोर्ट ने कहा कि ऐसे सवालों की जांच पूरी तरह से ट्रायल के दौरान क्रॉस-एग्जामिनेशन (जिरह) के ज़रिए की जानी चाहिए।
कोर्ट ने माना कि यह मामला भजन लाल मामले की सातवीं कैटेगरी के तहत आने वाले हालात से अलग था, जो ऐसी आपराधिक कार्यवाही से संबंधित है जिसमें साफ तौर पर दुर्भावना (Mala Fides) हो और जो बदले की भावना से गलत मकसद के साथ शुरू की गई हो।
कोर्ट ने देखा कि ऐसे मामलों के विपरीत, जहां आरोपों को ऊपर-ऊपर से मानने पर भी कोई कॉग्निज़ेबल अपराध (संज्ञेय अपराध) नहीं बनता, इस मामले की जांच के बाद ऐसी चार्जशीट दाखिल हुई, जिसे शुरुआती सबूतों (Prima Facie Material) का समर्थन हासिल था।
इसलिए कोर्ट को शुरुआती चरण में ही आपराधिक कार्यवाही में दखल देने का कोई उचित कारण नहीं मिला।
कोर्ट ने साफ किया कि याचिकाकर्ताओं द्वारा उठाए गए तथ्यों और बचाव के तर्कों को ट्रायल के सही चरण में पेश किया जा सकता है और ट्रायल कोर्ट को हाई कोर्ट के फैसले में की गई टिप्पणियों से प्रभावित नहीं होना चाहिए।
Case Title: Husband of Victim Girl & Ors. v. State of West Bengal & Anr.


