आज़ादी का अधिकार असीमित नहीं, गंभीर आपराधिक इतिहास वाले आरोपी को ज़मानत नहीं दी जा सकती: बॉम्बे हाईकोर्ट
Shahadat
12 Jun 2026 9:59 PM IST

बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गारंटीकृत आज़ादी का मौलिक अधिकार असीमित नहीं है और गंभीर आपराधिक इतिहास वाले व्यक्ति को केवल लंबे समय तक जेल में रहने के आधार पर ज़मानत नहीं दी जा सकती।
नागपुर बेंच में सुनवाई करते हुए जस्टिस महेंद्र नेरलिकर ने स्वप्निल काशीकर की ज़मानत याचिका खारिज की। काशीकर पर लोन पर खरीदी गई बाइक की EMI के भुगतान को लेकर हुए विवाद में एक पूर्व कर्मचारी की हत्या का आरोप है।
काशीकर ने यह कहते हुए ज़मानत मांगी कि वह 26 जनवरी, 2024 से जेल में है, लेकिन अभियोजन पक्ष ने कोर्ट के सामने चार्ट पेश किया, जिसमें कम-से-कम 10 मामलों का ज़िक्र है। इन मामलों में उस पर हत्या, हत्या की कोशिश, डकैती, अपहरण आदि जैसे गंभीर आरोप लगे।
जस्टिस नेरलिकर ने गौर किया कि काशीकर 26 जनवरी, 2024 से जेल में है और आज तक उस पर आरोप तय नहीं हुए। जज ने ज़ोर दिया कि आरोपी के अधिकारों को संतुलित करते समय आपराधिक इतिहास जैसे अन्य पहलुओं पर भी विचार करना ज़रूरी है, क्योंकि यह अच्छी तरह से माना जाता है कि आरोपी के आचरण और इतिहास जैसे प्रासंगिक कारकों पर उचित विचार किए बिना दी गई ज़मानत मनमानी होती है।
जस्टिस नेरलिकर ने 11 जून को पारित आदेश में कहा,
"आपराधिक इतिहास का चार्ट दिखाता है कि आवेदक हत्या की कोशिश, अपहरण, गंभीर चोट, डकैती आदि जैसे विभिन्न शारीरिक अपराधों में शामिल रहा है, जो प्रकृति में गंभीर हैं। भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गारंटीकृत अधिकार असीमित अधिकार नहीं है। जब आवेदक गंभीर आपराधिक इतिहास वाला हिस्ट्रीशीटर हो तो ऐसी परिस्थितियों में अनुच्छेद 21 ऐसे आरोपी के बचाव में नहीं आएगा। हालांकि, व्यक्तिगत आज़ादी एक महत्वपूर्ण संवैधानिक मूल्य है, लेकिन यह असीमित नहीं है। जब आज़ादी समाज के सामूहिक हितों के लिए खतरा बनती है तो उसे पीछे हटना पड़ता है। कोई भी व्यक्ति ऐसी आज़ादी का दावा नहीं कर सकता जो दूसरों की जान या आज़ादी को खतरे में डाले।"
जज ने राय दी कि काशीकर के लंबे आपराधिक इतिहास और गंभीर अपराधों में उसकी संलिप्तता को देखते हुए भारत के संविधान का अनुच्छेद 21 उसके बचाव में नहीं आएगा।
जस्टिस नेरलिकर ने कहा,
"हालांकि ऊपर दिए गए चार्ट को देखने से पता चलता है कि आवेदक को चार अपराधों में बरी कर दिया गया, लेकिन सच यह भी है कि बाकी छह अपराध भी गंभीर शारीरिक अपराध हैं। इतना ही नहीं, आवेदक को बार-बार ज़मानत दी गई, फिर भी उसने लगातार अपराध किए। इसलिए उसने कोर्ट से मिली आज़ादी का गलत इस्तेमाल किया, जिससे पता चलता है कि वह कानून का पालन करने वाला व्यक्ति नहीं है। मुझे सुप्रीम कोर्ट के उन कई फैसलों की जानकारी है, जिनमें ट्रायल में देरी के आधार पर ज़मानत दी गई, लेकिन मैं आवेदक के गंभीर आपराधिक इतिहास के कारण इस अर्ज़ी को खारिज कर रहा हूं, क्योंकि आवेदक समाज के लिए खतरा है। इसलिए इस मामले को देखते हुए अर्ज़ी खारिज की जाती है।"
इन बातों को ध्यान में रखते हुए जज ने काशीकर को ज़मानत देने से इनकार किया और उसकी ज़मानत अर्ज़ी खारिज की।
Case Title: Swapnil Chandrakant Kashikar vs State of Maharashtra (Criminal Application 581 of 2026)

