'प्रथम दृष्टया सबूत दिखाते हैं कि भारतीयों की विदेश में तस्करी की गई': बॉम्बे हाईकोर्ट ने नौकरी रैकेट मामले में कथित 'मास्टरमाइंड' को ज़मानत देने से किया इनकार

Shahadat

13 March 2026 6:11 PM IST

  • प्रथम दृष्टया सबूत दिखाते हैं कि भारतीयों की विदेश में तस्करी की गई: बॉम्बे हाईकोर्ट ने नौकरी रैकेट मामले में कथित मास्टरमाइंड को ज़मानत देने से किया इनकार

    बॉम्बे हाईकोर्ट ने हाल ही में 46 वर्षीय एक व्यक्ति को ज़मानत पर रिहा करने से इनकार किया। इस व्यक्ति पर राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) ने एक अंतरराष्ट्रीय नौकरी रैकेट का 'मास्टरमाइंड' होने का आरोप लगाया। इस रैकेट के तहत भारत के शिक्षित युवाओं की विदेश में 'तस्करी' की जाती थी और फिर उन्हें लाओस में नकली कॉल सेंटरों में काम करने के लिए मजबूर किया जाता था, जहां वे अमेरिकियों और ब्रिटिश नागरिकों को क्रिप्टोकरेंसी में निवेश करने के लिए मनाकर ठगी करते थे।

    जस्टिस अजय गडकरी और जस्टिस श्याम चंदक की खंडपीठ ने कहा कि रैकेट के कथित मास्टरमाइंड जेरी फिलिप्स जैकब के खिलाफ 'प्रथम दृष्टया' मामला बनता है। जैकब ने कई अन्य आरोपियों के साथ मिलकर एक सिंडिकेट बनाया और एक 'आपराधिक साज़िश' रची, जिसके तहत उसने भारत के बेरोज़गार लेकिन अच्छी-खासी शिक्षा प्राप्त युवाओं को विदेशी कंपनियों में वैध रोज़गार दिलाने का झांसा देकर उनकी तस्करी की।

    जजों ने 10 मार्च को पारित आदेश में कहा,

    "उनकी तस्करी करने के बाद उन्हें अवैध लाभ कमाने के लिए दूसरे देशों के लोगों को धोखा देने वाले कामों में शामिल होने के लिए मजबूर किया गया। जब भी भर्ती किए गए पीड़ित/नौकरी चाहने वाले कंपनी के लिए अवैध ऑनलाइन धोखाधड़ी का काम करने से इनकार करते थे और काम जारी रखने में अनिच्छा दिखाते थे, तो गिरफ्तार और वांछित आरोपी उन्हें मुनाफ़ा कमाने के लिए काम जारी रखने के लिए मनाते थे और वादा करते थे कि उन्हें 'लॉन्गशेंग कंपनी' में 'टीम लीडर' के पद पर प्रमोट किया जाएगा। यदि पीड़ित फिर भी अवैध काम जारी रखने में अपनी अनिच्छा दिखाते थे तो उन्हें गंभीर परिणामों की धमकी दी जाती थी। पीड़ितों को कार्यस्थल से रिहा करवाने और भारत वापसी की सुविधा के लिए उनसे ज़बरन वसूली की जाती थी। IPC की धारा 371 के तहत कथित अपराध के लिए आजीवन कारावास तक की सज़ा हो सकती है। यह अपराध गंभीर प्रकृति का है। ऐसा प्रतीत होता है कि ज़मानत पर रिहा होने के बाद अपीलकर्ता के फरार होने और अभियोजन पक्ष के सबूतों के साथ छेड़छाड़ करने की संभावना है। इसलिए हम उसे ज़मानत देने के पक्ष में नहीं हैं।"

    अभियोजन पक्ष के अनुसार, मुंबई निवासी जैकब ने अन्य सह-आरोपियों के साथ मिलकर शिक्षित भारतीय युवाओं को लुभाया और उन्हें विदेश में अच्छी-खासी तनख्वाह का वादा किया। वह उन्हें बैंकॉक ले गया, जहां चीनी नागरिकों की मदद से इन भर्ती किए गए युवाओं को नाव के ज़रिए लाओस ले जाया जाता था। जैसे ही भर्ती किए गए लोग अपनी मंज़िल पर पहुंचे, आरोपी ने अपने साथियों के साथ मिलकर उनसे उनके पासपोर्ट और दूसरे दस्तावेज़ छीन लिए और उन्हें विदेश 'ट्रैफ़िक' कर दिया; उन्हें लाओस के एक कॉल सेंटर में काम करके विदेशियों को ठगने के लिए मजबूर किया गया।

    अगर भर्ती किए गए लोग काम करने से मना करते थे तो उन्हें अक्सर बुरे अंजाम की धमकियां दी जाती थीं और जब वे भारत लौटने की गुज़ारिश करते थे तो आरोपी भारत वापसी का इंतज़ाम करने के बदले में उनसे भारी रकम की मांग करता था।

    मुंबई पुलिस के मुताबिक, उन्हें जैकब और उसके साथियों के ख़िलाफ़ 50 से ज़्यादा शिकायतें मिली थीं। इसलिए जब वे मार्च, 2024 में लाओस से मुंबई पहुंचे तो उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया और तब से वे जेल में ही हैं।

    जैकब ने ज़मानत के लिए स्पेशल NIA कोर्ट में अर्ज़ी दी थी। 6 दिसंबर 2024 को स्पेशल कोर्ट ने उसकी अर्ज़ी ख़ारिज की। इसलिए उसने स्पेशल कोर्ट के फ़ैसले को चुनौती देते हुए जस्टिस गाडकरी की बेंच के सामने याचिका दायर की। हालांकि, बेंच को इस अर्ज़ी में कोई दम नहीं लगा। इसलिए उसने जैकब की याचिका ख़ारिज करते हुए उसे ज़मानत देने से मना किया।

    Case Title: Jerry Philips Jacob vs National Investigation Agency (Criminal Appeal 558 of 2025)

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