बॉम्बे हाईकोर्ट में PIL: 'गॉडमैन' अशोक खरात केस के बाद अंधविश्वास विरोधी कानून के तहत नियमों की मांग

Shahadat

9 April 2026 7:34 PM IST

  • बॉम्बे हाईकोर्ट में PIL: गॉडमैन अशोक खरात केस के बाद अंधविश्वास विरोधी कानून के तहत नियमों की मांग

    महिलाओं का यौन शोषण करने के आरोपी खुद को 'गॉडमैन' कहने वाले अशोक खरात के खिलाफ FIR दर्ज होने के बाद बॉम्बे हाईकोर्ट की कोल्हापुर बेंच में PIL दायर की गई। इस PIL में दावा किया गया कि 'महाराष्ट्र मानव बलि और अन्य अमानवीय, बुराई और अघोरी प्रथाओं और काला जादू रोकथाम और उन्मूलन अधिनियम, 2013' का क्रियान्वयन 'असरदार नहीं' है।

    इस अधिनियम को 'अंधविश्वास विरोधी कानून' के नाम से भी जाना जाता है।

    यह याचिका 'महाराष्ट्र अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति' के 11 सदस्यों द्वारा वकील असीम सरोदे के माध्यम से दायर की गई।

    याचिका में हाल ही में गिरफ्तार किए गए खुद को 'गॉडमैन' कहने वाले खरात के मामले पर प्रकाश डाला गया। खरात पर बलात्कार, धोखाधड़ी और काला जादू करने के आरोप में कई FIR दर्ज हैं। इसलिए याचिका में कहा गया कि इस घटना से 2013 के अधिनियम के तहत 'नियमों' को प्रभावी ढंग से लागू करने की मांग और भी ज़रूरी और ज़ोरदार हो गई, ताकि कमज़ोर नागरिकों को यौन और आर्थिक शोषण से बचाया जा सके।

    याचिका में यह भी बताया गया कि ऐसे 'गॉडमैन' और 'गॉडवुमन' की प्रथाएं केवल हिंदू धर्म तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि इस्लाम और यहां तक ​​कि ईसाई धर्म में भी शामिल हैं, जहां मुल्ला, मौलवी और 'फादर' पूरे महाराष्ट्र में अंधविश्वास फैला रहे हैं।

    याचिका में कहा गया,

    "ऐसे कई धोखेबाज़ 'बाबाओं' से लगातार गंभीर खतरा बना हुआ है। याचिकाकर्ताओं का स्पष्ट मत है कि ऐसे बाबा, मुल्ला, फादर मौजूद हैं। ऐसी शोषणकारी प्रवृत्तियां भारत के सभी धर्मों में हैं। डॉ. नरेंद्र दाभोलकर की विरासत तब तक अधूरी रहेगी, जब तक 2013 का यह अधिनियम केवल कागज़ों पर ही रहेगा और इसे प्रशासनिक नियमों के रूप में ज़रूरी ताकत नहीं मिलेगी। और अधिक त्रासदियों को रोकने के लिए नियमों को बनाना ज़रूरी है, क्योंकि यह राज्य और उसके अन्य अधिकारियों की ज़िम्मेदारी का एक अभिन्न अंग है।"

    इसलिए याचिका में राज्य सरकार को निर्देश देने की मांग की गई कि वह उक्त अधिनियम को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए 2013 के अधिनियम के तहत अनिवार्य नियमों को तत्काल तैयार करे।

    याचिका में कहा गया,

    "यह मुद्दा हर धर्म के सभी बाबाओं से जुड़ा है। दिसंबर 2013 में अंधविश्वास विरोधी कानून पास होने के बावजूद, राज्य सरकार इसे लागू करने के लिए ज़रूरी कानूनी नियम बनाने में नाकाम रही है। इन नियमों के बिना पीड़ितों के पुनर्वास के लिए कोई आधिकारिक रोडमैप नहीं है, जांच के लिए कोई तय प्रक्रिया नहीं है और दुर्व्यवहार की शिकायत करने के लिए आगे आने वालों की सुरक्षा के लिए कोई साफ गाइडलाइन नहीं है। एक मज़बूत लागू करने वाले ढांचे की कमी ने धोखेबाज़ों को आम लोगों के डर और आस्था का फायदा उठाकर फलने-फूलने का मौका दिया।"

    भारत के मामले का ज़िक्र करते हुए याचिका में कहा गया कि यह एक "चौंकाने वाला उदाहरण" है, क्योंकि जांच से पता चला है कि इसमें गहरे और लगातार इंसानी शोषण, आर्थिक धोखाधड़ी, अमानवीय और बुरी प्रथाओं, काला जादू, नशीले पदार्थों और जादुई उपायों वगैरह के तत्व शामिल हैं। हालांकि पुलिस का मुख्य ध्यान अब तक डर और धमकाने, यौन और आर्थिक शोषण पर ही रहा है।

    याचिका में बताया गया,

    "अशोक खरात मामले से जुड़ी पुलिस जांच में ये बातें सामने आई हैं - यौन शोषण: हाल की जानकारी के मुताबिक, 10 से ज़्यादा FIR दर्ज की गईं, जिनमें से आठ 'आध्यात्मिक अनुष्ठानों' की आड़ में महिलाओं के साथ कथित यौन हमले और बलात्कार के मामले हैं। और भी FIR दर्ज होने की उम्मीद है। डर और धमकाना: खरात पर आरोप है कि उसने अपने पीड़ितों को चुप कराने के लिए दैवीय शक्तियों का दावा किया और 'परिवार वालों की जान को खतरा' होने की धमकी दी। आर्थिक धोखाधड़ी: खबरों के मुताबिक, उसने ज्योतिष और 'चमत्कारी' इलाज के लिए बहुत ज़्यादा फीस लेकर 100 करोड़ रुपये का साम्राज्य खड़ा कर लिया।"

    याचिका में खरात से जुड़े कई वीडियो फुटेज पर भी रोशनी डाली गई, जिनमें वह महिलाओं के साथ यौन हरकतें करते हुए दिख रहा है और ऐसे वीडियो पूरे इंटरनेट पर मौजूद हैं।

    याचिका में इस बात पर ज़ोर दिया गया,

    "इस तरह के वीडियो महिलाओं और लड़कियों के लिए गरिमा के साथ जीना मुश्किल बना रहे हैं और उनकी छवि खराब हो रही है। इसी पृष्ठभूमि में उन लोगों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज किए जा रहे हैं, जो सोशल मीडिया पर ये वीडियो पोस्ट और सर्कुलेट कर रहे हैं। हालांकि, उन्हें अपराधी ठहराने के बजाय इस तरह के अश्लील वीडियो फुटेज को सभी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से हटाए जाने की ज़रूरत है। हालांकि, दुर्भाग्य से, प्रतिवादी (Respondents) ऐसी पीड़ित महिलाओं के उत्पीड़न को रोकने के लिए कोई कदम नहीं उठा रहे हैं।"

    याचिका में यह कहा गया,

    "अधिकारियों को उक्त 'अंधविश्वास विरोधी कानून' (Anti-Superstition Law) पर गंभीरता से प्रतिक्रिया देनी चाहिए और महाराष्ट्र के हर पुलिस स्टेशन में 'कार्यशील अंधविश्वास विरोधी प्रकोष्ठ' (Anti-Superstition Cells) स्थापित करने चाहिए। ताकि राज्य के लोगों को ऐसे अधिकारी मिल सकें, जो इस तरह के संवेदनशील मामलों को संभालने के लिए प्रशिक्षित हों, जिससे मामलों का प्रभावी ढंग से निपटारा हो सके और सभी को एक सुरक्षित, भय-मुक्त जीवन मिल सके।"

    इसलिए याचिका में हर ज़िले में तुरंत 'सतर्कता अधिकारियों' (Vigilance Officers) की नियुक्ति और प्रशिक्षण की मांग की गई; ये अधिकारी विशेष रूप से उन मामलों को संभालने के लिए प्रशिक्षित हों, जिनमें आध्यात्मिक अनुष्ठानों की आड़ में महिलाओं का यौन शोषण किया जाता है। याचिका में नियमों के तहत 'पीड़ित सुरक्षा प्रोटोकॉल' (Victim Protection Protocol) की भी मांग की गई, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि 'खरत मामले' जैसे मामलों में 'स्वयंभू बाबाओं' के हाथों पीड़ित महिलाओं को तुरंत मनोवैज्ञानिक परामर्श, कानूनी सहायता और किसी भी तरह की धमकी या दबाव से सुरक्षा मिल सके।

    इसके अलावा, एक और निर्देश की मांग की गई कि खरत के साथ महिलाओं और लड़कियों के वीडियो सभी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से हटा दिए जाएं। साथ ही याचिका में यह भी मांग की गई कि 'अंधविश्वास विरोधी कानून' के तहत आने वाले मामलों की सुनवाई 'विशेष अदालतों' (Special Courts) में की जाए।

    अंत में याचिका में राज्य सरकार को एक निर्देश देने की मांग की गई कि वह पूरे राज्य में एक 'जागरूकता अभियान' (जैसा कि उक्त 'अंधविश्वास विरोधी कानून' की प्रस्तावना में परिकल्पित है) चलाए। इस अभियान का उद्देश्य जनता को उन धोखाधड़ी भरे हथकंडों के बारे में जागरूक करना है, जिनका इस्तेमाल 'स्वयंभू बाबा' करते हैं, ताकि भविष्य में होने वाले सामाजिक और आर्थिक शोषण को रोका जा सके।

    इस मामले की सुनवाई उचित समय पर की जाएगी।

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