अवैध गिरफ्तारी के लिए 5 लाख का मुआवजा: बॉम्बे हाईकोर्ट ने पुलिस और मजिस्ट्रेट के खिलाफ दिए कार्रवाई के निर्देश
Shahadat
23 Oct 2026 9:30 AM IST

बॉम्बे हाईकोर्ट ने गुरुवार (22 अक्टूबर) को महाराष्ट्र सरकार को एक व्यक्ति को 5 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया। इस व्यक्ति को मुंबई पुलिस ने अवैध रूप से गिरफ्तार किया और लगभग 26 दिनों तक हिरासत में रखा।
कोर्ट ने गिरफ्तारी को अवैध करार देते हुए राज्य सरकार को उन अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई करने का आदेश दिया, जिन्होंने याचिकाकर्ता को 'वसूली करने वाला' (Extortionist) बताकर गिरफ्तार किया। इसके अलावा, उस मजिस्ट्रेट के खिलाफ भी कार्रवाई का आदेश दिया गया, जिसने याचिकाकर्ता को पुलिस और न्यायिक हिरासत में भेजने का रिमांड आदेश दिया।
जस्टिस अजय गडकरी और जस्टिस कमल खाता की खंडपीठ ने कहा कि पुलिस यह साबित करने में विफल रही कि याचिकाकर्ता - बिपिन अग्रवाल - को गिरफ्तार करना क्यों जरूरी था।
खंडपीठ ने आदेश दिया,
"राज्य सरकार याचिकाकर्ता को अवैध गिरफ्तारी और हिरासत (6 दिन पुलिस हिरासत और 20 दिन न्यायिक हिरासत) के लिए 5,00,000 रुपये का मुआवजा दो सप्ताह के भीतर दे। राज्य सरकार को निर्देश दिया जाता है कि वह सभी संबंधित पुलिस अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करे, जिसमें उन्हें तुरंत निलंबित करना भी शामिल है। साथ ही यदि उचित लगे तो उनके वेतन से मुआवजे की राशि की वसूली भी की जाए। हम रजिस्ट्री को निर्देश देते हैं कि वे इस फैसले को हाईकोर्ट की प्रशासनिक समिति के सामने रखें, ताकि मुंबई की 64वीं अदालत के उस मजिस्ट्रेट (या मजिस्ट्रेटों) के खिलाफ उचित कार्रवाई की जा सके, जिन्होंने 5, 8 और 10 अगस्त 2017 को याचिकाकर्ता की रिमांड अर्जी पर सुनवाई की थी। इन मजिस्ट्रेटों ने मामले की ठीक से जांच-पड़ताल किए बिना और बिना कोई कारण दर्ज किए ही याचिकाकर्ता को पुलिस और न्यायिक हिरासत में भेजने की अनुमति दे दी थी।"
याचिका के अनुसार, दक्षिण मुंबई के पॉश इलाके वालकेश्वर के रहने वाले अग्रवाल को उनकी सास ने अपने फ्लैट के पुनर्विकास (Redevelopment) से जुड़े सौदे के लिए अपना 'कॉन्स्टिट्यूटेड अटॉर्नी' (अधिकृत प्रतिनिधि) नियुक्त किया। हालांकि, फ्लैट की बिक्री की रकम को लेकर डेवलपर और याचिकाकर्ता के बीच कुछ असहमति थी। डेवलपर, फ्लैट बेचने के लिए याचिकाकर्ता द्वारा मांगी गई 1.64 करोड़ रुपये की रकम पर सहमत नहीं था। हालांकि, उसने उसे एडवांस के तौर पर 2 लाख रुपये दिए। जैसे ही उसने पैसे लिए पुलिस कमरे (डेवलपर के ऑफिस) में आ गई, उसे हथकड़ी लगाई और गिरफ्तार कर लिया।
इसके बाद डेवलपर ने अग्रवाल के खिलाफ यह आरोप लगाते हुए केस दर्ज कराया कि वह जबरन वसूली (Extortion) करने वाला व्यक्ति है। जजों ने रिकॉर्ड से पाया कि इस मामले से जुड़े कई दस्तावेज सिर्फ इसलिए फर्जी तरीके से तैयार किए गए ताकि याचिकाकर्ता को एक पुराना अपराधी (History-Sheeter) और जबरन वसूली करने वाला दिखाया जा सके।
बेंच ने कहा,
"यह सोचकर ही बहुत दुख होता है कि उसे किन हालात से गुजरना पड़ा होगा। साफ तौर पर यह डेवलपर और पुलिस की मिलीभगत से कानूनी प्रक्रिया के घोर दुरुपयोग का मामला है। रिकॉर्ड में रखे गए दस्तावेजों से यह बात स्पष्ट है। यह एक ऐसा मामला है, जहां एक पुलिस सब-इंस्पेक्टर ने अपने आधिकारिक पद का गलत फायदा उठाया और पुलिस तंत्र का इस्तेमाल डेवलपर के फायदे के लिए किया। उसने याचिकाकर्ता की जिंदगी बर्बाद करने की कोशिश की, क्योंकि याचिकाकर्ता ने उनके दबाव में आकर वह डील नहीं मानी। साथ ही उसने सोसाइटी के कुछ सदस्यों के साथ मिलकर उनके गलत कामों का पर्दाफाश करने की धमकी दी थी। इसके पीछे की वजह साफ है और इसे समझने के लिए ज्यादा दूर जाने की जरूरत नहीं है।"
मामले के तथ्यों पर गौर करते हुए बेंच ने कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कुछ भी नहीं है, जिससे यह साबित हो कि याचिकाकर्ता डेवलपर के लिए कोई अनजान व्यक्ति था। असल में, वह अपनी सास के लिए 'पावर ऑफ अटॉर्नी' धारक था, जो उस सोसाइटी में एक फ्लैट की मालकिन थीं, जिसे शिकायतकर्ता (डेवलपर) विकसित कर रहा था। जजों ने कहा कि अगर यह मान भी लिया जाए कि याचिकाकर्ता को किसी गलतफहमी की वजह से गिरफ्तार किया गया और पुलिस को 'ऐसा मानने का कारण' था कि वह जबरन वसूली करने वाला है, तो भी याचिकाकर्ता से शुरुआती पूछताछ करने पर ही सही तथ्य सामने आ जाते।
जजों ने कहा,
"पुलिस ने जानबूझकर यह पता लगाने की कोई कोशिश नहीं की कि नकद रकम क्यों दी गई। यह रकम एडवांस किराए बिक्री के भुगतान या किसी अन्य अनुबंध के तहत जमा राशि के रूप में हो सकती थी। पुलिस सब-इंस्पेक्टर ने नकद मिलने के पीछे की सच्चाई जानने के लिए कोई प्रयास नहीं किया। पुलिस यह नहीं दिखा पाई कि उन्होंने CrPC की धारा 41-A की शर्तों का पालन कैसे किया, खासकर तब जब यह अपराध IPC की धारा 384 के तहत आता है, जिसमें अधिकतम 3 साल की सजा हो सकती है। रिकॉर्ड में ऐसा कोई सबूत नहीं है, जिससे पता चले कि पुलिस के पास कोई संतोषजनक जवाब था। इसलिए हमारा निष्कर्ष है कि गिरफ्तारी और रिमांड मनमानीपूर्ण थे, बिना सोचे-समझे किए गए और कानून के बुनियादी प्रावधानों का पालन किए बिना किए गए।"
मामले के रिकॉर्ड की जांच करने के बाद बेंच ने निष्कर्ष निकाला कि पुलिस ने याचिकाकर्ता को किसी गैंगस्टर, हिस्ट्री-शीटर या जबरन वसूली करने वाले (Extortionist) के रूप में पेश करने की कोशिश की, जबकि उनके पास इसका कोई सबूत नहीं था और न ही उन्होंने शिकायत की सच्चाई की कोई जांच की थी।
जजों ने कहा,
"हमें साफ तौर पर लगता है कि पुलिस सब-इंस्पेक्टर ने डेवलपर के साथ मिलीभगत करके, याचिकाकर्ता को उसके कानूनी अधिकारों का इस्तेमाल करने से रोकने के लिए, उसे इस अपराध में झूठा फंसाया है। उन्होंने जबरन वसूली की एक मनगढ़ंत कहानी रची है।"
बेंच ने कहा,
"हम पाते हैं कि 64वीं अदालत के मजिस्ट्रेट भी याचिकाकर्ता को गलत तरीके से हिरासत में रखने के लिए जिम्मेदार हैं। याचिकाकर्ता की रिमांड जारी रखने के लिए कोई कारण नहीं बताया गया। मजिस्ट्रेट ने अपने विवेक का इस्तेमाल नहीं किया और बहुत ही लापरवाही भरा रवैया अपनाया, जिससे याचिकाकर्ता को भारी नुकसान उठाना पड़ा, क्योंकि उसे पूरी तरह से गैर-कानूनी तरीके से गिरफ्तार करके हिरासत में रखा गया। हम मानते हैं कि इस गैर-कानूनी गिरफ्तारी के कारण याचिकाकर्ता को न केवल बड़ा आर्थिक नुकसान हुआ है, बल्कि उसकी प्रतिष्ठा को भी अपूरणीय क्षति पहुंची है और उसकी विश्वसनीयता पर हमेशा के लिए दाग लग गया।"
इन टिप्पणियों के साथ बेंच ने याचिका का निपटारा किया।
Case Title : Bipin Satish Chandra Agrwal vs State of Maharashtra
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