गिरफ्तारी के कारण नहीं बताए, मोबाइल भी बिना जब्ती पंचनामा रखा; बॉम्बे हाईकोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार को 2 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश
Praveen Mishra
7 Sept 2026 5:39 PM IST

बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर बेंच ने एक 26 वर्षीय युवक की गिरफ्तारी को कानून की तय प्रक्रिया के खिलाफ मानते हुए महाराष्ट्र सरकार को उसे 2 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया है। युवक को पुलिस ने गिरफ्तार करते समय न तो गिरफ्तारी के आधार बताए थे और न ही उसे कानून के अनुसार उचित नोटिस दिया गया था।
जस्टिस उर्मिला जोशी-फल्के और जस्टिस राज डी. वाकोडे की डिवीजन बेंच ने कहा कि राज्य के अधिकारियों द्वारा किसी व्यक्ति के अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन किए जाने पर हाईकोर्ट को संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत मौद्रिक मुआवजा देने का अधिकार है।
मामला एक होटल में घरेलू गैस सिलेंडर के कथित व्यावसायिक इस्तेमाल से जुड़ा था। पुलिस ने युवक के होटल पर छापा मारकर उसे हिरासत में लिया और थाने ले गई। हालांकि, रिकॉर्ड से यह सामने आया कि उसे यह नहीं बताया गया कि आखिर उसे किस आधार पर गिरफ्तार किया जा रहा है।
कोर्ट ने पाया कि पुलिस की जनरल डायरी में न तो गिरफ्तारी के कारण युवक को बताए जाने का उल्लेख था और न ही उस कथित "गुप्त सूचना" का कोई रिकॉर्ड था, जिसके आधार पर होटल पर छापा मारने का दावा किया गया था।
बेंच ने सुप्रीम कोर्ट के सतेंद्र कुमार अंतिल बनाम CBI (2022) फैसले का हवाला देते हुए कहा कि सात साल तक की सजा वाले संज्ञेय अपराधों में गिरफ्तारी करते समय पुलिस अधिकारी को गिरफ्तारी के कारण लिखित रूप में दर्ज करना जरूरी है। पुराने CrPC की धारा 41 और 41-A के तहत गिरफ्तारी और नोटिस की प्रक्रिया का पालन किया जाना चाहिए था, लेकिन इस मामले में ऐसा नहीं किया गया।
कोर्ट ने एक और गंभीर तथ्य पर ध्यान दिया। पुलिस अधिकारियों ने हाईकोर्ट के सामने पहले यह कहा था कि युवक का मोबाइल फोन जब्त नहीं किया गया। बाद में विभागीय जांच में यह साबित हुआ कि पुलिस ने मोबाइल अपने पास रखा था, लेकिन उसकी कोई जब्ती पंचनामा (seizure panchanama) तैयार नहीं की गई थी।
विभागीय जांच के बाद संबंधित पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई भी की गई। एक अधिकारी की एक साल की वेतन वृद्धि रोक दी गई, जबकि दूसरे से दो साल तक पेंशन से राशि काटने की सजा दी गई।
हाईकोर्ट ने कहा कि जांच अधिकारी ने भी माना था कि युवक को गिरफ्तारी के आधार नहीं बताए गए, जो सीधे तौर पर उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता का उल्लंघन है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि पुलिस का कर्तव्य केवल आरोपी को पकड़ना नहीं, बल्कि कानून का पालन करना और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करना भी है। इस मामले में पुलिस अधिकारियों ने न सिर्फ कानूनी प्रक्रिया का उल्लंघन किया, बल्कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा गिरफ्तारी को लेकर तय दिशानिर्देशों का भी पालन नहीं किया।
नीलाबती बेहरा बनाम स्टेट ऑफ ओडिशा और रुदुल साह बनाम स्टेट ऑफ बिहार जैसे सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने माना कि युवक के अनुच्छेद 21 के अधिकार का उल्लंघन हुआ है।
इसी आधार पर कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार को निर्देश दिया कि वह आठ सप्ताह के भीतर युवक को 2 लाख रुपये का मुआवजा अदा करे।


