बॉम्बे हाईकोर्ट ने 6 साल की पड़ोसी बच्ची के साथ यौन शोषण के आरोपी व्यक्ति की ज़मानत याचिका खारिज की

  • बॉम्बे हाईकोर्ट ने 6 साल की पड़ोसी बच्ची के साथ यौन शोषण के आरोपी व्यक्ति की ज़मानत याचिका खारिज की

    बॉम्बे हाईकोर्ट ने हाल ही में अपने पड़ोस की एक नाबालिग बच्ची के साथ यौन शोषण के आरोपी व्यक्ति की ज़मानत याचिका खारिज करते हुए कहा कि उसे ज़मानत देने से समाज में गलत संदेश जाएगा। कोर्ट ने कहा कि उसने 'पड़ोस के अंकल' और नाबालिग बच्ची के बीच के पवित्र रिश्ते (जो पिता-पुत्री जैसा होता है) की गरिमा को खत्म किया।

    सिंगल-जज जस्टिस मिलिंद जाधव ने कहा कि हालांकि उन्होंने कई अन्य आपराधिक मामलों में लंबे समय तक जेल में रहने के आधार पर ज़मानत दी, लेकिन यह मामला एक अपवाद है।

    जस्टिस जाधव ने कहा,

    "हालांकि इस कोर्ट ने कई मामलों में विचाराधीन कैदियों (आरोपियों) के लंबे समय तक जेल में रहने के कारण भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत उन्हें मिले त्वरित सुनवाई और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार को ध्यान में रखते हुए ज़मानत दी- खासकर तब जब निकट भविष्य में सुनवाई पूरी होने की कोई संभावना न हो - लेकिन मेरी राय में यह मामला एक अपवाद है। आरोपी पर किया गया भरोसा और विश्वास पूरी तरह से खत्म और टूट चुका है। इस मामले में अपराध के आरोप इतने गंभीर हैं कि ज़मानत देने से समाज में गलत संदेश जाएगा। आरोपी ने एक पवित्र और मासूम रिश्ते की गरिमा को खत्म कर दिया है; 6 साल की पीड़िता उसे बहुत मानती थी और 'अतुल नाना' कहकर बुलाती थी, जिसका मतलब पिता के समान व्यक्ति होता है।"

    यह बेंच पुणे के एक निवासी की याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसने पिछले 3 साल और 3 महीने से जेल में रहने के आधार पर ज़मानत मांगी।

    हालांकि, जज ने गौर किया कि आरोपी की हरकत तब सामने आई, जब पीड़िता अपने घर में पड़ोस की एक दूसरी बच्ची के साथ खेल रही थी और उसने अंदर से दरवाज़ा बंद किया। जब उसकी माँ ने अंदर से दरवाज़ा बंद करने के लिए उसे डांटा तो बच्ची ने बताया कि आरोपी अक्सर उसे अपने घर बुलाता था और यह देखने के बहाने कि उसकी जांघों पर कोई चोट तो नहीं लगी है, उसके प्राइवेट पार्ट्स को छूता था। इसलिए माँ ने अपने पति और परिवार के दूसरे सदस्यों को इस बारे में बताया और कानूनी कार्रवाई शुरू करवाई। हालांकि, आरोपी ने अपनी ज़मानत अर्ज़ी में दलील दी कि उसे झूठे मामले में फंसाया गया, क्योंकि दोनों पड़ोसी परिवारों (आरोपी और शिकायतकर्ता) के बीच कुछ अनबन थी और बदला लेने के लिए शिकायतकर्ता ने उसके खिलाफ़ झूठा केस दर्ज कराया।

    हालांकि, रिकॉर्ड पर मौजूद सबूतों को देखने के बाद जस्टिस जाधव ने माना कि आरोप इतने गंभीर हैं कि उन्होंने कोर्ट की अंतरात्मा को झकझोर दिया।

    जज ने कहा,

    "पीड़िता की माँ (जो पहली सूचना देने वाली थीं) के बयान से पता चलता है कि दोनों परिवारों के बीच भरोसे के कारण उनके पड़ोसी के तौर पर रिश्ते बहुत अच्छे थे। पीड़िता सिर्फ़ 6 साल की है, जबकि आरोपी 40 साल का है। ऐसे रिश्तों की वजह से पीड़िता आरोपी के घर पर समय बिताती थी। आरोपी पर उसके परिवार का भरोसा आज के समय में पड़ोसी के तौर पर भाईचारे की मिसाल कायम करने जैसा था। दुख की बात है कि आरोपी के व्यवहार ने परिवारों के बीच के भरोसे को खत्म किया।"

    जज ने आरोपी के खिलाफ़ प्रथम दृष्टया मज़बूत मामला पाया। जज ने कहा कि आरोपी पीड़िता के लिए पिता समान था, लेकिन उसने ऐसा हमला किया, जिससे पीड़िता के कोमल मन पर गहरा असर पड़ा होगा, जैसा कि उसकी माँ ने उसके व्यवहार के बारे में बताया है।

    ज़मानत अर्ज़ी खारिज करते हुए जज ने कहा,

    "बल्कि ऐसी हरकत पूरे समाज के खिलाफ़ है, क्योंकि POCSO Act का मुख्य मकसद यह सुनिश्चित करना है कि बच्चे की कम उम्र का गलत फायदा न उठाया जाए और उनके बचपन को शोषण से बचाया जाए।"

    Case Title: A vs State of Maharashtra (Bail Application 3403 of 2026)

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